आठ आने की कॉमिक्स अब लाख की

नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, बांकेलाल, डोगा, राम-रहीम, चाचा चौधरी और साबू, बिल्लू, पिंकी, फैंटम जैसे चरित्रों के नाम अभी भी हिंदी कॉमिक्स पढ़ने वालों के ज़ेहन में ज़िंदा हैं.

भारत में हिंदी कॉमिक्स का सफ़र साल 1964 में इंद्रजाल कॉमिक्स के साथ शुरू हुआ और इस पब्लिकेशन ने अमरीकी कॉमिक निर्माता ली फ़ॉल्क के कालजयी किरदारों मैंड्रेक और फ़ैंटम की कहानियों को छापना शुरू किया.

इनकी लोकप्रियता को देखकर साल 1979 में भारत में डायमंड कॉमिक्स का सफ़र शुरू हुआ और उसके बाद इस इंडस्ट्री में कई नाम जुड़ने लगे.

लेकिन शुरुआत में आठ आने में मिलने वाली कॉमिक्स की कीमत आज नीलामी में एक लाख़ हो जाना एक रोचक बात है.

बीबीसी से बात करते हुए भारत में कॉमिक्स संग्रहकर्ताओं को एकसूत्र में जोड़ने वाले हसन ज़हीर बताते हैं कि इंद्रजाल और डायमंड के बाद कॉमिक्स प्रकाशनों की बाढ़ सी आ गई.

राज, मनोज, तुलसी, गोयल, किंग जैसी कई कंपनिया कॉमिक्स निकालने लगीं.

वो कहते हैं, “लेकिन यहीं समस्या शुरू हुई, ये सभी कहानियां हिंदी में आती थीं और ऐसे में ‘हिंदी बेल्ट’ में एक ही समय पर कई कॉमिक्स प्रकाशन उभर आए और प्रतियोगिता के चलते छोटे प्रकाशन बंद होने लगे.”

हसन बताते हैं कि काग़ज़ और छपाई की बढ़ती कीमतों के चलते भी कई लोकप्रिय प्रकाशकों को अपनी प्रेस बंद करनी पड़ी और धीरे-धीरे रद्दी में चली जाने वाली प्रिंट्स दुर्लभ बन गईं.

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बीते साल हुई नीलामी में इंद्रजाल कॉमिक्स की पहली कॉमिक्स फ़ैंटम 1, 2, 3 की बोली कुल एक लाख रुपए लगी लेकिन इस तरह की नीलामी में इन कॉमिक्सों के मालिक हसन न तो हिस्सा लेते हैं न ही इन्हें बेचने का ख़्याल रखते हैं.

वह कहते हैं, “मैं जानता हूं कि कॉमिक्स की कीमत और बढ़ती जाएगी लेकिन बेचना या नीलामी करना मेरा काम नहीं मैं तो इन्हें धरोहर के तौर पर संभालना चाहता हूं.”

आठ हज़ार से ज्यादा कॉमिक्सों का संकलन रखने वाले हसन भारत में दूसरे कॉमिक्स के संग्रहकर्ताओं के बारे में भी बताते हैं, जिनमें से एक हैं राहुल शशांक.

पेशे से पत्रकार और सिविल सेवा की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे राहुल के पास लगभग दो हज़ार कॉमिक्स मौजूद हैं और वह इस संकलन को बढ़ा रहे हैं.

राहुल कहते हैं, “मैंने राज कॉमिक्स के साथ काम किया है और मैं जानता हूं कि कॉमिक्स बनाना काफ़ी महंगा हो गया है. नागराज, ध्रुव, डोगा और बांकेलाल जैसे किरदारों को छोड़ दें, तो और किसी किरदार की कॉमिक्स नहीं बिकती है.”

राहुल बताते हैं कि उनके पास तुलसी कॉमिक्स की कुछ दुर्लभ कॉमिक्स हैं और राज कॉमिक्स के 90 के दशक में छपे मौलिक प्रिंट हैं, जिनकी कीमत आज लगभग 40 हज़ार के आसपास लगाई गई थी.

राहुल हंसते हुए बताते हैं, “मेरी पत्नी ने इन्हें एक बार 7 रुपए किलो के भाव से रद्दी में बेच दिया होता मैं बाहर था लेकिन संयोग से उस दिन कबाड़ी आया ही नहीं और आज मेरी पत्नी ही मेरा इस संकलन का ध्यान रखती है.”

लेकिन जहां पुरानी कॉमिक्सों की कीमत लाखों रुपए तक पहुंच रही है वहीं नई कॉमिक्स के ख़रीददार मौजूद नहीं है.

मुंबई के चर्चगेट स्टेशन पर कॉमिक्स बेचने वाले वाली ताहिरा कहती हैं कि हिंदी कॉमिक्स की मांग बहुत कम है और 25 से 35 साल के लोग ही इन्हें ख़रीदने आते हैं.

बच्चे इन्हें नहीं खरीद रहे ऐसे में हमें मालूम है कि कुछ समय बाद यह बेकार हो जाएंगी.

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म नंबर 16 पर किताबें बेचने वाले मुकेश कहते हैं, “हम खुद कॉमिक्स पढ़ते थे और आज भी हमें इनका क्रेज़ है, लेकिन ख़रीदने वाले ग्राहक नहीं मिलते. आप जैसे लोग आते हैं तो खुशी होती है.”

कॉमिक्स के सामने एक बड़ी दुविधा पायरेसी की भी है और हसन बताते हैं कि बैंगलोर से चलने वाली एक वेबसाइट प्यारेटून्स ने सभी कॉमिक्स को स्कैन कर ऑनलाइन देना शुरू कर दिया था.

प्यारेटून्स के ख़िलाफ़ डायमंड कॉमिक्स और राज कॉमिक्स की शिकायत के बाद इस वेबसाइट से इन प्रकाशनों की कॉमिक्स को हटा लिया गया क्योंकि यह प्रकाशन अभी सक्रिय हैं.

कॉमिक्स बेचने वाले व ख़रीदने वाले भले ही कम हो रहे हों लेकिन राहुल और हसन जैसे संग्रहकर्ताओं को उम्मीद है कि हिंदी कॉमिक्स जल्द ही वापिस लौटेगी.

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अब तो फ़िल्म निर्माता अनुराग कश्यप भी कॉमिक किरदार डोगा पर फ़िल्म बनाने का घोषणा कर चुके हैं.

राहुल जो राज कॉमिक्स में काम कर चुके हैं बताते हैं, “साल 2000 में ‘नागराज’ पर एक धारावाहिक बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन निर्माण के खर्चे को देखकर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.''

आगे कहते हैं कि अब बस डोगा के किरदार और कहानी के राइट्स पर निर्माता और राज कॉमिक्स के बीच बात अटकी है, जिसके सुलझते ही यह फ़िल्म सामने आएगी.”

फ़िल्म तो जब आएगी तब आएगी लेकिन अब आप भी अपने घर की पुरानी रद्दी खंगालिए क्या पता किसी पुरानी कॉमिक्स की शक्ल में आपके लाख़ रुपये धूल खा रहे हों!

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