'अवार्ड्स से ज़्यादा ज़रूरी हैं काउन्सिलिंग सेंटर'

  • 4 मई 2016
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सफ़लता पाने के बावजूद कुछ ऐसे हालात हुए कि अभिनेत्री प्रत्युषा बैनर्जी ने अपने आप को ख़त्म कर लिया.

जिया ख़ान, नफ़ीसा जोसेफ़, विवेका बाबाजी, कुलजीत रंधावा और कुणाल सिंह जैसे कलाकार और मॉडल्स की आत्महत्या आज भी सवालों के घेरे में है.

उनसे पहले परवीन बॉबी, दिव्या भारती, गुरु दत्त और सिल्क स्मिता जैसी हस्तिओं ने भी मौत को गले लगाया.

ग्लैमर की चकाचौंध के पीछे का यह अंधेरा शायद बहुत सारे कलाकारों को कभी ना कभी, अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है.

लेकिन कुछ लोग हैं जिन्होंने अपने आप को ऐसे हालात में संभाला है.

बीबीसी हिन्दी ने बात की ऐसे कुछ कलाकारों से जिन्होंने ऐसे दौर में मौत और निराशा को मात दी थी.

‘उतरन’ धारावाहिक से जाना माना चहेरा बनी टीना दत्ता ने कहा, “बड़े शहर में जब आप अकेले रहकर काम कर रहे होते हैं और करियर मे उतार चढ़ाव आते हैं, तब ख़ुद को संभालना आसान नहीं होता. जब मुझे लगा की मैं डिप्रेशन की ओर खिंची जा रही हूं, तब मैंने हमेशा ऐसे मित्रों के साथ वक़्त बिताया जो सकारात्मक हो."

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वो बताती हैं, "सबसे ज़रुरी है ऐसे सपोर्ट की जो आपकी भावनाओं को समझे और आप का प्रोत्साहन रहे. ज़िंदगी में जो भी हो उसे स्वीकार करना चाहिए, ज़रुरी नहीं कि सब वैसा ही हो जैसा आपने चाहा है.”

बॉलीवुड अभिनेता गोविंदा के भांजे और एक्ट्रेस रागिनी खन्ना के भाई अमित खन्ना पांच साल पहले टीवी पर अपनी जगह बना चुके थे.

लेकिन हालात कुछ ऐसे हुए की उन्होंने अभिनय छोड़ कर एक बीपीओ में नौकरी शुरू कर दी. अब वो फ़िर से टीवी पर दिखने लगे हैं और ‘विषकन्या’ धारावाहिक में अहम किरदार निभा रहे हैं.

उन्होंने बताया, “एक ऐसा वक्त़ था, जब घर में परेशानियां चल रही थीं. पिताजी के पैसे एक फ़िल्म में डूब गए, नानी का देहांत हो गया. चेक बाउन्स होने की वजह से पिताजी को जेल हो गई और तनाव बहुत बढ़ गया. फिर मम्मी और पिताजी अलग हो गए".

वो कहते हैं, "वैसे तब मैं छोटा नहीं था, लेकिन मुझ पर इन सब बातों का बहुत असर हुआ. मैं फ़ोकस नहीं कर पाता था और काम मिलना बंद हो गया.”

वो आगे बताते हैं, “अगर मैं सिर्फ़ ख़ुद के बारे में सोचता तो शायद कुछ ग़लत कर बैठता, लेकिन मैंने अपनी गलतियों को सुधारना शुरु किया. ज़िंदगी ने छोटी उम्र में बहुत कुछ सिखा दिया., लेकिन मैंने अपने लिए ज़िंदगी का सही रास्ता ढूंढने की कोशिश की. मैं समझ गया था कि जो सोचते हैं, वही नहीं होता, लेकिन आप को आगे बढ़ना ज़रुरी है.”

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रामायण में लक्ष्मण का किरदार निभा रहे अंकित अरोड़ा ने संघर्ष के दिनों मे वेटर का काम भी किया है और अख़बार डालने की नौकरी भी की है.

अंकित कहते हैं कि, “जब घर में पहली बार बताया कि मैं गायक बनना चाहता हूं, तो सभी ने मेरी बात नकार दी. मुझे बहुत अकेला महसूस होने लगा, सोचता था मर जाऊं. लेकिन फ़िर लगा कि हालात से हार गया तो मेरे सपने कैसे पूरे होंगे? अगर मैं कुछ कर बैठता तो मेरे माता-पिता ख़ुद को कैसे संभालते?"

उनका मानना है, "जब बुरे ख़याल आएं तब हमें उनके बारे में सोचना चाहिए, जो हमें प्यार करते हैं. मैं खुश हूं कि मैंने आज जो भी किया है वह अपने दम पर किया है. जहां पहुंचना था वहां शायद नहीं पहुंचा, लेकिन हारा नहीं और कम से कम अच्छी शुरुआत तो की. एक समय पर मुझसे बात न करने वाले मेरे माता-पिता आज मुझ पर गर्व करते हैं.”

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अभिनेत्री श्रद्धा शर्मा का कहना है, “कई बार लगता है की अकेली हूं, अंदर से टूटा हुआ महसूस करती हूं. मुंबई में और ख़ास कर इन्डस्ट्री में सच्चे दोस्त मिलना मुश्क़िल है. आपका अच्छा सोचने वाले दोस्तों को पहचान कर, उनके साथ ही वक्त़ बिताएं. मैं बहुत मुंहफट हूं. जो दिल के साफ़ नहीं होते हैं, उन्हें बुरा लग जाता है, लेकिन सच्चे दोस्त हमेशा साथ देते हैं.”

मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी का मानना है, “पुरस्कार समारोह से ज़्यादा ज़रूरी है कि सिने कलाकारों और टीवी कलाकारों के संगठन, युवा कलाकारों के लिए काउन्सिलिंग सेंटर शुरु करें. छोटे शहरों से यहां बड़े सपने लेकर आने वाले युवा अपना नाम बनाने के बाद भी असुरक्षा महसुस करते हैं".

वो कहते हैं, "डिप्रेशन एक सामान्य मनोरोग बन चुका है, लेकिन हर मन की व्यथा अलग होती है. ‘स्ट्रॉंग मांइन्ड’ एक मिथक है. जिनके पास ख़ुद का सपोर्ट सिस्टम नहीं होता, वो ख़ुद को मुश्क़िल वक़्त में नहीं संभाल पाते हैं. ग्लैमर की भूलभुलैया में आने से पहले 'प्लान बी' होना ज़रुरी है. अगर सफल नहीं हुए, तो क्या करेंगे यह सोच कर ही आगे बढ़ना चाहिए.”

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