बॉलीवुड को 'तगड़ा जवाब' है ये मराठी फ़िल्म

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फ़िल्मों के दीवाने भारत में अब भी कड़े सामाजिक रिवाज़ों के बीच ख़ुशी तलाशते युवा जोड़ों की प्रेम कहानियां कामयाब होती हैं.

ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रेमी जोड़े प्रेम करने के उन क़ानूनों को तोड़ते हैं, जिन्हें बुकर पुरस्कार विजेता और 'द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स' की मशहूर लेखिका अरुंधती रॉय ने 'लव लॉज़' कहा है, जो 'तय करते हैं कि किसको प्यार करना चाहिए, कैसे...और कितना.'

भारत में मोहब्बत करने के भयावह नतीजों पर बनी छोटे बजट वाली मराठी फ़िल्म 'सैराट' बिना शोर शराबे के इस साल की सबसे कामयाब फिल्मों में जगह बना चुकी है.

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'सैराट' बॉलीवुड से एकदम उलट है: इसे एक दलित फ़िल्मकार ने बनाया है और इसका बजट बेहद कम यानी लगभग चार करोड़ रुपए था. इसमें नए चेहरों को लिया गया है, जिनमें दो प्रमुख किरदार बिल्कुल अनजान हैं.

यह फ़िल्म बॉलीवुड की फार्मूला फ़िल्मों की छुट्टी कर देती है: 'सैराट' में एक ऊंची जाति की लड़की को एक निचली जाति के लड़के से प्रेम हो जाता है, रिश्ते की शुरुआत लड़की की तरफ से होती है, जो बिंदास है. लेकिन इसका अंत बेहद दुखद है.

ये सब भी 'सैराट' को मराठी सिनेमा इतिहास की सबसे अधिक कमाई करने वाली फ़िल्म बनने से नहीं रोक पाया.

अप्रैल में जब से यह फ़िल्म रिलीज़ हुई है, पूरे महाराष्ट्र में क़रीब 450 सिनेमा घर हाउसफ़ुल रहे हैं.

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छोटे क़स्बों और गांवों के सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमाघरों में उमड़ रही भीड़ को देखते हुए रात और सुबह को अलग से शो दिखाए जा रहे हैं.

हालांकि मुख्य शहरों में कम लोग ही इसे देखने जा रहे हैं. फ़िल्म अब तक लगभग 81 करोड़ रुपये की कमाई कर चुकी है. फ़िल्म समीक्षक इसकी तारीफ़ में कसीदे पढ़ रहे हैं.

बर्लिन इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में जब इस फ़िल्म को दिखाया गया, तो वहां दर्शकों ने खड़े होकर तालियों के साथ इसकी सराहना की. बर्लिन फ़िल्म मेले में भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर 'सैराट' को भेजा गया था.

इस फ़िल्म के निर्देशक 38 वर्षीय नागराज मंजुले ने बीबीसी को बताया, "फ़ेस्टिवल में अंतराष्ट्रीय दर्शकों की ओर से गर्मजोशी भरी तारीफ़ बहुत उत्साहजनक और विशेष लगी."

'सैराट' की हीरोइन अर्चना या आर्ची पाटिल है, जो महाराष्ट्र के एक गांव में रहती है और कॉलेज छात्रा है. हीरो युवा पार्शया है. वो गांव की क्रिकेट टीम का कप्तान है और आर्ची के साथ ही पढ़ता है.

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आर्ची पाटिल गांव के एक राजनीतिक रसूख वाले धनी बाप की बिगड़ैल बेटी है. वो मोटरसाइकिल से कॉलेज जाती है और अपने गन्ने के खेतों तक ख़ुद ट्रैक्टर चलाकर जाती है.

वहीं पार्शया एक मछुआरे का बेटा है, जो गांव के बाहर दलित बस्ती में रहता है.

इन दोनों को अलग करने के मुद्दे पर गांव में हिंसा भड़क उठती है और इसके बाद दोनों एक साथ रहने के लिए शहर भाग जाते हैं.

मुख्य भूमिकाओं के लिए मंजुले ने मंझे हुए कलाकारों की जगह छात्रों को लिया, जिन्होंने इससे पहले कभी अभिनय नहीं किया था.

डॉक्टर बनने की चाहत रखने वाली चौदह साल की हीरोइन रिंकु राजगुरु एक बिंदास महिला लीड रोल के लिए आदर्श बन गई हैं.

वहीं क्रिकेट पसंद करने वाले 20 साल के हीरो आकाश थोसार एक ग्रेजुएट स्टूडेंट हैं जो पुलिस की नौकरी करना चाहते हैं.

निर्देशक मंजुले जहां काम कर रहे थे, उस गांव में फ़िल्म शूटिंग की जगह रिंकु अपनी मां के साथ गई थीं.

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एक सरसरी मुलाक़ात के बाद निर्देशक ने उनका ऑडिशन लिया और उन्हें लीड रोल के लिए चुन लिया गया.

थोसार की फ़ोटो मंजुले के भाई के दोस्त ने व्हाट्स ऐप पर भेजी थी. उनका भी बहुत कम समय में ऑडिशन लिया गया और रोल के लिए चुन लिया गया.

मंजुले कहते हैं, "किरदार की बारीक़ियां समझाने के लिए मैंने उनके साथ महीने भर काम किया."

वो बड़े गर्व से बताते हैं कि बहुत ही भावुक क्षणों के लिए भी "उन दोनों ने ग्लीसरीन का सहारा नहीं लिया."

आज वो दोनों स्टार हैं और भीड़ से बचने के लिए पुणे में मंजुले के साथ अनजान जगह पर रह रहे हैं.

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मंजुले हंसते हुए बताते हैं, "हम लापरवाही से दरवाज़ा नहीं खोल सकते क्योंकि प्रशंसकों की भीड़ उन दोनों पर टूट पड़ सकती है. मकान के सामने अक्सर प्रशंसकों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है और लोग ख़ुशी में इस फ़िल्म के गानों पर नाचते हैं."

रिंकू थोड़ी निराश हैं क्योंकि वो अपनी पसंदीदा पानी पुरी खाने नहीं जा सकती क्योंकि भीड़ लग जाने का डर है.

रोमांस से भरपूर कहानियों वाला बॉलीवुड एक ऐसे राज्य में आकर ठिठक गया है, जहां मराठी क्षेत्रीय फ़िल्म इंडस्ट्री बजट में तो बहुत कम है लेकिन कला में उच्च स्तरीय है.

मंजुले कहते हैं, "सैराट, बॉलीवुड को मेरा जवाब है."

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दोस्तेवस्की को पसंद करने वाले इस फ़िल्मकार का कहना है, "मैं ऐसी पुरुष प्रधान व्यवस्था से थक गया था जहां महिलाएं केवल संपत्ति हैं और मैं इसे बदलना चाहता था. मैंने मुख्य महिला किरदार की प्रेरणा गांव में मेरे आस पास की आज़ाद ख़्याल और मजबूत महिलाओं से ली."

समीक्षकों ने एक मज़बूत महिला किरदार दिखाने के लिए उनकी तारीफ़ की है.

मंजुले जाति के अभिशाप की बात कहते हैं, 'जो इंसानों को बराबरी का अधिकार नहीं देती है.'

वो 'दलित के रूप में अपनी पहचान' और 'आत्मविश्वास और स्वाभिमान को पाने के लिए किए गए संघर्षों' की बात करते हैं.

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वो कहते हैं, "इस फ़िल्म में कोशिश रही है कि प्रेम, जाति और हिंसा को उसके जाने पहचाने अंदाज़ में ही दिखाया जाए और संवेदना और इंसानी हमदर्दी का संदेश दिया जाए."

सैराट को मिली अपार सफलता साबित करती है कि प्रेम के प्रति युवा भारत का संघर्ष कितना वास्तविक है.

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