फ़िल्म स्टार को चमकाने वाले ख़ुद अंधेरे में

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हिंदी फ़िल्मों के कलाकार, चाहे वो शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा या आलिया भट्ट हों, ये सभी कलाकार बड़े पर्दे पर बेहद ख़ूबसूरत और बेदाग़ दिखते हैं.

इनके बेहद ख़ूबसूरत दिखने की वजह सिर्फ़ मेकअप नहीं, बल्कि वे तमाम लाइटमैन भी हैं जो घंटों लाइट पकड़कर सिर्फ़ इसलिए खड़े रहते हैं ताकि कलाकार पर्दे पर ख़ूबसूरत और बेदाग़ दिख सकें.

पिछले साल की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फ़िल्म बाजीराव मस्तानी अपने एक-एक सीन की ख़ूबसूरती के लिए मशहूर है.

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फ़िल्म में लाइटमैन संभालने वाले गेफर शब्बीर कहते हैं, "संजय लीला भंसाली के साथ मैंने राम लीला में बतौर लाइटमैन काम किया था और बाजीराव मस्तानी में भी मुझे काम उनके साथ काम करने का मौक़ा मिला. उनके एक सेट पर करीबन 30 से 40 लाइटमैन काम करते हैं और जब तक उन्हें शॉट पसंद ना आए वो ओके नहीं कहते."

फ़िल्मों में इस्तेमाल होने वाली लाइट्स की जानकारी देते हुए शब्बीर कहते हैं, "फ़िल्मों में सीन के हिसाब से एचएमआई लाइट्स, डिनोलाइट, टंगस्टन लाइट का इस्तेमाल होता है."

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1972 से बॉलीवुड में लाइटमैन का काम कर रहे अब्दुल गाणी हुज़ूर बताते हैं, "एक लाइटमैन का काम लाइट के सभी चीजों को लाइट वेंडर से फ़िल्म सेट पर ले जाना और सिनेमेटोग्राफर के हिसाब से लाइट की सेटिंग करना होता है. लेकिन लाइटमैन की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होती है कि सीन के दौरान कलाकार का चेहरा साफ़ दिखे, अगर लाइट में थोड़ा भी उन्नीस बीस होता है तो आर्टिस्ट का चेहरा बुरा दिखता है."

लाइटमैन के काम को बेहद ख़तरनाक बताते हुए अब्दुल गाणी हज़ूर कहते हैं, "हमें 30-35 फुट की ऊंचाई पर तक़रीबन 30 किलो भारी लाइट उठाकर जाना होता है. सीन के दौरान कई बार इन गर्म लाइट को एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म ले जाना पड़ता है सिर्फ़ एक हाथ से रस्सी पकड़े हुए. ये बहुत ही ख़तरनाक़ काम है जिसमें जान का ख़तरा भी होता है."

चकाचौंध की दुनिया में कलाकारों को चमकाने वाले इन लाइटमैन की ज़िंदगी अंधकार में ही रह जाती है.

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फेडरशन ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया सिने इंप्लॉय (एफडब्ल्यूआईसीआई) के अंतर्गत आने वाले फ़िल्म स्टूडियो सेटिंग और मज़दूर यूनियन के लीडर प्रेम सिंह ठाकुर ने बताया कि आज लाइटमैन का हर जगह शोषण हो रहा है फिर चाहे वो फ़िल्म हो या टीवी सीरियल का सेट. ये 12 घंटे से ज्यादा काम करते हैं और उन्हें उसकी क़ीमत बहुत कम मिलती है. आज इतने लाइटमैन हैं और काम की मारा मारी में लोग मजबूरी में 500 रुपए प्रति दिन काम करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं.

अनिल कपूर की फ़िल्म 'मोहब्बत' से लाइटमैन का काम शुरू करने वाले इक़बाल ने सलमान ख़ान की फ़िल्म 'प्रेम रतन धन पायो' में भी काम किया है.

इक़बाल कहते हैं,"कमाई तो अच्छी हुई है. प्रतिदिन 15 रुपए से अब 1200-1400 मिलते हैं पर उन पैसों के लिए भी दो से तीन महीने इंतज़ार करना पड़ता है."

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वहीं अब्दुल गाणी हज़ूर की शिकायत है कि आज फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसे लाइटमैन हैं जिन्हें लाइट की जानकारी नहीं है और वो कम क़ीमत पर काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं जिससे काबिल लाइटमैन बेरोज़गार रह जाते हैं.

अब्दुल गाणी ये भी कहते हैं कि चंद बड़े फ़िल्म प्रोडक्शन को छोड़कर कोई भी लाइटमैन के जोख़िम भरे काम को सुरक्षा प्रदान नहीं करता है और ना ही हमारा कोई बीमा होता है. कितने लाइटमैन ऊंचाई से गिर कर मरे हैं, तो कितनों को बिजली का झटका लगा है. ना ही हमें हैंड ग्लब्स मुहैया करवाया गया है और ना ही शॉक प्रूफ जूते.

वो बताते हैं, "ब्लैक" फ़िल्म के सेट पर भयंकर आग लगी थी. आश्वासन दिया गया पर उन लाइटमैन का क्या हुआ? सुभाष घई को छोड़कर इस फ़िल्म इंडस्ट्री में हमारा कोई बीमा नहीं करवाता. बड़े प्रोडक्शन हाउस पैसे देते हैं, पर सुरक्षा नहीं. हम गरीबों की कौन सुनता है ?

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लाइटमैन इक़बाल ने बताया, "संजय दत्त की फ़िल्म 'तेज़ा' की शूटिंग के दौरान करंट लगने से मैं ऊपर से गिरकर तड़पने लगा तब संजय दत्त मेरे पास भाग कर आए और मेरे हाथ पैर मलने लगे और मुझे हल्दी दूध भी पिलाया."

वहीं अब्दुल गाणी ने बताया, "ऋषि कपूर ने अपने लिफ्टमैन को नौकरी से इसलिए निकाल दिया क्योंकि उसने मुझको लिफ्ट में लाइट के साथ घुसने नहीं दिया और कहा कि ये लाइट लेकर 5 माले तक सीढ़ियों से जाओ. पहले के कलाकार हमें दादा कहकर पुकारते थे फिर वो दिलीप साहब हों या अमिताभ बच्चन. वो हमें इज़्ज़त देते थे और आज की पीढ़ी के आर्टिस्ट अपने आप को सुरमा समझते हैं और अपने घमंड में ही रहते हैं."

लाइटमैन इक़बाल कहते हैं कि आज पैसा तो मिलता है पर इज़्ज़त नहीं मिलती और ना ही किसी को हमारे काम की अहमियत का पता है और ना परवाह.

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