दलित होना मुश्किल, दलित फ़िल्ममेकर होना आसान

  • 22 जून 2016
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सेट पर लगी चोट के कारण वो थोड़ा लंगड़ा कर चल रहे थे, उनसे किसी विदेशी परफ़्यूम की ख़ुशबू नहीं आ रही थी और वो दफ़्तर में मौजूद हर उस आदमी से हाथ मिला रहे थे जो उनसे हाथ मिला रहा था.

बिना किसी बाउंसर, बिना महंगे स्मार्टफ़ोन और बिना तीन चार असिस्टेंट के हमारे स्टूडियो में अंदर आते हैं मराठी भाषा की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म 'सैराट' के निर्देशक नागराज मंजुले.

"माफ़ कीजिएगा, मैं थोड़ा लेट हो गया, मुंबई के रास्ते ज़्यादा मालूम नहीं है और पैर में भी चोट है थोड़ा टाइम लग जाता है."

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आपके मन में पहली आवाज़ आती है कि क्या यह वही निर्देशक है जिसकी फ़िल्म अभी तक 100 करोड़ से ज़्यादा का कारोबार कर चुकी है और फ़िल्म की अभिनेत्री को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है?

नागराज मंजुले की फ़िल्म इस वक़्त महाराष्ट्र के तक़रीबन हर एक सिनेमा घर में लगी है और अमरीका में लगी 'सैराट' की अंग्रेज़ी डब प्रति ने भी 15 लाख़ डॉलर से ज़्यादा का कारोबार कर लिया है.

फ़िल्म की सफलता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि चार करोड़ में बनी मराठी भाषा की इस फ़िल्म ने कमाई के मामले में बॉलीवुड के सुपरस्टार शाहरुख़ ख़ान की 'फ़ैन' को भी पीछे छोड़ दिया है.

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नागराज कहते हैं, "आप जो बात मुझे बता रहे हैं वो किसी सपने से कम नहीं है. शाहरुख़, आमिर ये कुछ ऐसे नाम हैं जिनके आप सपने देखते हो और आज एक ही वाक्य में मेरा और उनका नाम आता है तो मेरे लिए यह किसी सपने से कम नहीं है."

नागराज को नहीं जानने वाले या उन्हें फ़िल्म इंडस्ट्री में नया मानने वालों के लिए यह जानना भी ज़रूरी है कि उनकी फ़िल्मों को तीन बार नेशनल अवॉर्ड मिले हैं.

बतौर निर्देशक साल 2010 में उन्हें अपनी लघु फ़िल्म 'पिसतुल्या' के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला, फिर दलितों के जीवन पर आधारित 2013 में बनी उनकी पहली फीचर फ़िल्म 'फ़ैंड्री' के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.

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अब तीन साल बाद 'सैराट' की अभिनेत्री रिंकू राजगुरू को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और फ़िल्म मराठी सिनेमा की सबसे बड़ी हिट के रूप में सामने आई है और ऐसे में लोग उन्हें फ़िल्म का जादूगर मानने लगे हैं.

लेकिन महाराष्ट्र के शोलापुर में एक दलित परिवार के घर में पैदा हुए 39 वर्षीय नागराज ने इस सफलता की कल्पना भी नहीं की थी.

वो कहते हैं, "भारत में दलित होना मुश्किल काम है. लेकिन आप एक दलित फ़िल्ममेकर हैं तो कोई बात नहीं क्योंकि फ़िल्म इंडस्ट्री काफ़ी सेक्युलर है और यहां धर्म, जाति, भाषा का भेदभाव जल्दी सामने नहीं आता, लेकिन ज़िंदगी ने मुझे कई बार अनुभव करवाया है कि मैं एक दलित समाज से आता हूं."

नागराज एक किस्सा बताते हैं, "ऐसे बहुत से मौके आए जब हमें गांव में अहसास हुआ कि हम छोटी जाति के हैं लेकिन बच्चों के साथ एक अच्छी बात होती है कि वो एक दिन का कड़वा अनुभव अगले दिन भूल जाते हैं."

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वो बताते हैं, "कई बार हमने वर्जित जगहों पर जाने के लिए डांट खाई, कई बार नीचे बैठने की जगह ऊपर बैठने पर मार खाई, लेकिन एक किस्सा जिसने मेरे अंदर 'दलित' होने का कड़वा अहसास छोड़ा और मुझे 'फ़ैंड्री' बनाने पर मजबूर किया वो मुझे याद रहता है."

वो बताते हैं, "हमारे स्कूल के दिनों में बास्केटबॉल के खेल के दौरान एक सवर्ण जाति की लड़की से मेरा हाथ ग़लती से टकरा गया, उस लड़की ने पलट कर बेहद हिकारत से मुझे कहा, 'ऐ फ़ैंड्री! हाथ लगाने की हिम्मत कैसे हुई?"

मराठी में निचली जातियों को संबोधित करने के लिए चलने वाले अपमानजनक संबोधनों में से एक 'फ़ैंड्री' है.

नागराज बताते हैं, "जब अपने लिए ये शब्द सुना तो लगा कि मैं अलग हूं और यह लोग जो इस वक़्त मेरे आसपास हैं, ये अलग हैं."

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नागराज कहते हैं, "उस दिन के बाद वो शब्द मेरे कानों में गूंजता रहा और फिर मैंने उन अनुभवों की सूची बनानी शुरू की जो एक दलित होने के तौर पर मेरे साथ या मेरे दूसरे साथियों के साथ हुए और उसी एक शब्द से प्रेरित होकर मैंने अपनी पहली फ़िल्म 'फ़ैंड्री' बनाई."

नागराज कहते हैं कि जब तक आपको अहसास नहीं करवाया जाता कि आप दलित हैं, उस समय तक सभी कुछ सामान्य रहता है लेकिन जिस दिन आपके साथ 'दलितों' वाला व्यवहार हो जाता है यकीन मानिए दुनिया ही बदल जाती है.

नागराज ख़ुद को ख़ुशकिस्मत मानते हैं कि वो फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े हैं क्योंकि यही एक जगह हैं जहां आपकी जाति से आपको अलग नहीं माना जाता.

वो कहते हैं, "मैं पुलिस में कांस्टेबल रहा लेकिन वहां टिक नहीं सका, स्टेशनरी की दुकान चलाई लेकिन मेरी दुकान से सामान ख़रीदने वाले कम ही थे. फिर टेलिफ़ोन बूथ खोला, ड्राईवर भी रहा और काफ़ी परेशानी में ज़िंदगी चली."

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लेकिन फ़िल्म मेकर बन जाने के बाद यह सब पीछे छूट जाता है, 'फ़ैंड्री' की कहानी पर पैसा लगाने वाले भी एक स्वर्ण निर्माता थे और उन्हें बिल्कुल परेशानी नहीं थी कि दलितों की कहानी दिखाई जा रही है, या निर्देशक दलित है.

'सैराट' के 100 करोड़ के क्लब में आ जाने के बाद नागराज को बॉलीवुड के कई लोग अप्रोच करने की कोशिश कर रहे है लेकिन नागराज को बॉलीवुड सुहाता नहीं है.

वो सीधे शब्दों में कहते हैं कि यहां कहानियों को असल ज़िंदगी से दूर दिखाया जाता है और कई बार वो बोझिल, तो कई बार हास्यास्पद हो जाता है.

वो कहते हैं, "मैं कमर्शियल फ़िल्मों के हीरो को देखकर हंसने लगता हूं, वो न बूढ़ा होता है, न मार खाता है, न चोटिल होता है, ऐसा कौन होता है ?"

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नागराज मानते हैं कि फ़िल्में समाज का आईना हैं तो उन्हें सच्चाई भी दिखानी चाहिए और इसी सिलसिले में एक परेशानी उन्हें फ़िल्मों में महिलाओं के चित्रण से भी है.

वो कहते हैं, "हमारी फ़िल्मों में महिलाओं को बस सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह दिखाया जाता है जो ग़लत है. असल ज़िंदगी में कई बार महिलाएं शारीरिक और मानसिक तौर पर पुरुषों से ज़्यादा ताकतवर होती हैं लेकिन हमारी फ़िल्मों में वो बिकिनी में ही नज़र आती हैं."

नागराज का कहा है, "मेरे सिनेमा में ऐसा नहीं है, मेरी हीरोइन की एक आईडेंटिटी, एक पहचान, एक चरित्र होता है और मुझे कोई गुरेज़ नहीं अगर वो मेरे हीरो पर भारी पड़ जाती है. क्या असल ज़िंदगी में ऐसी महिलाएं नहीं होती जो अपने पति/ब्वॉयफ़्रेंड पर भारी पड़ती हैं ?"

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वो साफ़ करते हैं कि उन्हें फिल्मों के कमर्शियल हो जाने से ऐतराज़ नहीं है, "हम फ़िल्म पैसा कमाने के लिए ही बनाते हैं और फ़िल्म को मनोरंजक होना चाहिए लेकिन आम आदमी को आम आदमी की तरह ही दिखाया जाए, सुपरमैन की तरह नहीं और महिलाओं के साथ इज़्ज़त से पेश आए यही मेरी कोशिश होती है."

वो साफ़ करते हैं, "मैंने अपने जीवन में कई मज़बूत महिलाओं को देखा है जिन्होंने अपने घर को संभाला है, अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी है और प्यार किया है. यही अगर मैं अपनी फ़िल्मों में दिखाता हूं तो लोग ख़ुद को उससे जोड़ पाते हैं. आप मेरी फ़िल्म की किरदार 'आर्ची' को शायद अपने आसपास ढूंढ लें लेकिन बिकिनी वाली महिला आपको ढूंढने से भी नहीं मिलेगी क्योंकि वो आम नहीं है."

अक्सर क्षेत्रीय भाषाओं की अच्छी और सफल फ़िल्मों को भुनाने के लिए उन फ़िल्मों का बॉलीवुड संस्करण यानी रीमेक भी बनता है जिसमें किसी मेगा स्टार को लिया जाता है.

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लेकिन नागराज अपनी फ़िल्म के रीमेक को भी किसी नए चेहरे के साथ ही बनाना चाहेंगे, "किसी बड़े स्टार के साथ समस्या यह होती है कि लोग उस स्टार को देखने आते हैं, आपके किरदार को नहीं. मैं चाहकर भी एक स्टार को एक आम आदमी नहीं बना सकता क्योंकि लोग जानते हैं वो कौन है."

वो आगे कहते हैं, "कोई बड़ा स्टार अपनी फ़िल्म का निर्देशन करने को कहेगा तो ज़रूर मैं उनके लिए फ़िल्म बनाऊंगा लेकिन मेरी अपनी फ़िल्म की किसी कहानी में अभी तक मैं किसी स्टार को रख नहीं पाया हूं और शायद रखूंगा भी नहीं."

नागराज मंजुले सेंसर, देश और सरकार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी बेबाकी से राय रखते हैं.

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सरकार के बारे में पूछे गए सवाल पर वो कहते हैं, "देखिए राजनीति से बाहर निकलिए, मैं एक दलित परिवार से हूं और मेरी दादी से जब एक बार मैंने पूछा था कि क्या तुमने अंग्रेज़ों को देखा था? क्या वो बुरे थे? इसके जवाब में वो पूछती है कि अंग्रेज़ कौन थे?"

वो आगे कहते हैं, "उसे समझाने पर कि अंग्रेज़ों ने हमे लूटा, हम पर राज किया तो उसका कहना था कि हो सकता है कि कोई ज़मींदार होंगे. इस उदाहरण से मैं यह समझाना चाहता हूं कि ऊपर शासन प्रशासन किसी का भी बदले लेकिन ज़मीनी दिक्कतें लोगों की कुछ और होती हैं. मेरी दादी के लिए अंग्रेज़, आज़ादी, कोहिनूर से बड़ा उसके गांव, कस्बे का वो ज़मींदार था जिसने वहां आंतक मचा रखा था. ऐसे में इंटॉलेरेंस, धर्म, बीफ़ इन सब मुद्दों से बड़ा है कि सरकार ज़मीनी स्तर पर क्या कर रही है? क्या वो सिर्फ़ शहरी सरकार है या फिर वो गांव की भी सरकार है क्योंकि आज हो या पांच या पचास साल पहले की बात, हमारे लोगों की समस्याएं जस की तस हैं."

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बातचीत का दौर लंबा खिंचता जा रहा था और नागराज की मैनेजर इंटरव्यू ख़त्म किए जाने की सिफ़ारिश कर रही थी.

ऐसे में जाते-जाते नागराज ने सेंसर की बात पर ख़ुद ही कहा, "आपका सवाल मुझे याद है और सेंसर पर बस इतना ही कहना है कि उन्हें समय के साथ बदलना चाहिए. फ़िल्ममेकर को कुछ छूट दी जानी चाहिए क्योंकि वो किसी नई समस्या को बनाने कि कोशिश नहीं कर रहा बल्कि एक पुरानी समस्या को सामने लाना चाह रहा है."

स्टूडियो के बाहर कुछ और 'सैराट' फ़ैन एक फ़ोटो के इंतज़ार में थे, हमारे एक मराठी सहयोगी मेरे कान में कह रहे थे, "सर, ये मंजुले साहब नए लोगों को बहुत काम देते हैं, इनसे बात करवाओ न मेरा बहुत स्ट्रांग फ़ील है एक्टिंग का."

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