लुप्त होते भारतीय वाद्य यंत्र

  • 28 जून 2016
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तेज़ी से डिजीटल होते समय में संगीत भी डिजीटल हो चला है.

बड़े बड़े ऑर्केस्ट्रा समूहों की जगह किसी कंप्यूटर, कीबोर्ड और सिंथेसाईज़र जैसी मशीनों ने ले ली है और इन संगीतज्ञों के पास मौजूद वाद्य यंत्रो की भी जगह मशीनों ने ली है

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एक ही मशीन से सितार, संतूर, तबला और हज़ारों अन्य वाद्य यंत्रो की धुन निकल सकती है तो ज़ाहिर है कि अलग अलग वाद्य यंत्रो का इस्तेमाल हिन्दी फ़िल्म या टीवी संगीत बनाने में कम हो गया है और ऐसे में इन वाद्य यंत्रो की मांग और उपलब्धता काफ़ी कम हुई है.

‘विश्व संगीत दिवस’ पर बीबीसी ने कुछ ऐसे ही अनोखे और अब कम इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्रो को ढूंढने की कोशिश की और भारत की सबसे बड़ी शास्त्रीय वाद्य यंत्र बनाने वाली कंपनी ‘फ़र्टाडोज़’ के विशेषज्ञों से जाना कि क्या ख़ास है इन वाद्य यंत्रो में.

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फ़र्टाडोज़ के मालिक जोसेफ़ गोम्स कहते हैं कि भारतीय युवाओं को अब पाश्चात्य संगीत के वाद्य यंत्र जैसे गिटार, कीबोर्ड और ड्रम्स ज़्यादा आकर्षित करते हैं लेकिन शास्त्रीय वाद्य यंत्रो की भी अपनी एक अलग बात होती है.

भारतीय शास्त्रीय वाद्यों की उपलब्धता कम इसलिए भी हुई है क्योंकि मांग कम होने से इनका उत्पादन घटा है. इन वाद्यों का उत्पादन करने में काफ़ी समय और लागत लगती है जो कि वापिस नहीं मिल पाती और इन्हें बनाने वाले कारीगरों को इसमें फ़ायदा नहीं दिखता.

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ऐसे ही कुछ अदभुत लेकिन अब कम इस्तेमाल में लाए जाने वाले वाद्य यंत्रों में से एक है हारमोनियम.

हारमोनियम लकड़ी और रीड यानी पीतल की एक ख़ास पट्टी से बनता है. किसी ज़माने में किसी धुन को कंपोज़ करने के लिए संगीतकार हारमोनियम को ही सबसे उचित वाद्य यंत्र मानते थे, लेकिन भारत के संगीत जगत में अब कीबोर्ड ने हारमोनियम की जगह ले ली है.

एक अच्छे हारमोनियम की कीमत लगभग 14,500 रुपये होती है वहीं हारमोनियम के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होने वाले कीबोर्ड से न सिर्फ़ हारमोनियम बल्कि दूसरे कई वाद्यों की धुनें निकाली जा सकती हैं, बाज़ार में 15000 रुपए की शुरूआती कीमत से कीबोर्ड उपलब्ध हैं.

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सितार एक कमाल का लेकिन बजाने में मुश्किल वाद्य यंत्र है. इसे अपने हाथों पर ट्यून करने यानि इसकी सही धुन को साधने में ही करीब डेढ़ साल लग जाते हैं.

ग्वालियर में सितार की शिक्षा ग्रहण करने वाली फ़िल्म समीक्षक गीतम श्रीवास्तव बताती हैं, “सितार सीखने के दिनों में पहली धुन सही निकालने में ही मुझे एक महीना लग गया था और यकीन मानिए मैं एक अच्छी शिष्या थी.”

जोसेफ़ गोम्स के अनुसार भारत की एक जानी मानी संगीत अकादमी के मालिक ने उन्हें बताया था कि आजकल सितार सीखने गिने चुने लोग ही आते हैं जबकि पहले हज़ार से भी ज़्यादा छात्र सितार सीखने के लिए आते थे.

इसका एक कारण है कि अब सितार की जगह एक छोटे से कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर ‘वीएसटी’ ने ले ली है. कद्दू के पौधे की छाल से बनाया जाने वाला सितार बहुत भारी होता है जबकि वीएसटी आपके लैपटॉप में आ सकता है. जहां किसी सितार की कीमत 11 हज़ार से 30 हज़ार तक हो सकती है, वहीं इस सॉफ़्टवेयर की पायरेटेड कॉपी को लोग मुफ़्त में ही डॉउनलोड कर लेते हैं.

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हिन्दी फिल्मों का वाद्य यंत्रो की बिक्री पर काफ़ी फ़र्क पड़ता है और यह इस बात से ज़ाहिर होता है कि फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' के बाद शाहरूख़ ख़ान द्वारा बजाए गए मैंडोलिन की बिक्री में काफ़ी बढ़ोतरी हुई थी.

फ़र्टाडोज़ के आंकड़ो के अनुसार फ़िल्म की रीलीज़ के बाद रातों रात मैंडोलिन की बिक्री बढ़ गई, लेकिन 6 महीने बाद वो इसे वापिस करने भी आए.

लकड़ी और धातु दोनों ही डिज़ाईन में आने वाले मैंडोलिन की कीमत 4 हज़ार से शुरू होती है लेकिन अब इसकी धुन को कीबोर्ड की कुछ 'की-काँबिनेशन' की सहायता से बजाया जा सकता है.

ऐसे में सिर्फ़ मैंडोलिन ख़रीदना फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया है.

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भारी भरकम वाद्य यंत्रो में से एक है तानपुरा, सितार की तरह कद्दू से ही इसका भी बेस बनता है और इसे उठा कर लाना ले जाना एक मुश्किल काम है.

तानपुरे की जगह अब लगभग पूरी तरह से रेडियोनुमा दिखने वाले इलेक्ट्रानिक तानपुरा ने ले ली है, जो मात्र कुछ हजार में मिल जाता है, वहीं तानपुरा की क़ीमत 15 हज़ार से ज़्यादा है और यह ऑर्डर पर ही बनता है.

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ज़ाकिर हुसैन को मिली लोकप्रियता के बाद से तबला भारतीय शास्त्रीय वाद्य यंत्रो में सबसे जल्दी पहचाना जाने वाला वाद्या यंत्र है.

शास्त्रीय संगीत नहीं भी समझने वाला व्यक्ति तबले की एक आधी धुन जैसे ‘ना तिन तिन धा’ तो समझ ही लेता है.

तबला आघात-वाद्ययंत्र का राजा माना जाता है और इसकी शुरूआती कीमत करीब 11,500 रूपए है, हालांकि इसका इस्तेमाल बंद नहीं हुआ है. लेकिन आजकल तबला का विकल्प तबला मशीन या ताल मशीन है जिसमें पहले से ही सारे ताल भरे होते हैं.

बहुत छोटे से इस टेप-रिकॉर्डरनुमा यंत्र की कीमत कुछ हज़ारों में होती है, वहीं 11 हज़ार से शुरू होने वाला तबला लकड़ी, पीतल और ख़ाल से बनता है और इसकी क़ीमत 60 हज़ार तक जा सकती है.

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लकड़ी और ख़ाल से बना यंत्र कोंगो अफ़्रीकी संगीत में काफ़ी इस्तेमाल होता है और तबले से बेहद अलग है.

जोसेफ़ मानते हैं कि तबले से निकलने वाली ‘द्यूत’ ध्वनि कोंगो से नहीं निकाली जा सकती वहीं कांगों की पिच तबले से काफ़ी नीचे जा सकती है

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कोंगो की ही तरह डबल बेस और यूफ़ोनियम जैसे वाद्य यंत्र हैं जिन्हें अब स्कूलों या चर्च ही खरीदता है क्योंकि वहां म्यूज़िक एक अहम विषय के रूप में पढ़ाया जाता है.

जहां कोंगो की क़ीमत करीब 11,500 रुपए के आस-पास शुरू होती है, वहीं डबल बेस 1 लाख़ और यूफ़ोनियम की कीमत 18 हज़ार है.

लेकिन आजकल संगीत जगत में वीएसटी सॉफ़्टवेयर के माध्यम से डबल बेस और यूफ़ोनियम के लिए डिजिटल फ्लूट का इस्तेमाल किया जाता है, जो बजाने में यूफ़ोनियम से काफ़ी सरल है और यूफ़ोनियम के साथ साथ बांसुरी का भी काम करती है.

कोंगो के विकल्प के तौर पर कीबोर्ड का इस्तेमाल आम बात है और यह काफ़ी कम समय में हो जाता है.

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फ़र्टाडोज़ के देशभर से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार संतूर, सारंगी, पंजाबी ढोल और पखावज जैसे खालिस भारतीय वाद्य यंत्रों के ख़रीददार भी कम हुए हैं.

क़रीब 7500 रुपए में मिलने वाले पखावज की सही धुन को सेट करने के लिए उस पर चमड़े से बनी रस्सियों को खींचना पड़ता है जो बहुत ही मुश्किल काम है.

वहीं संतूर की कीमत करीब 13,250 रुपए, सारंगी की 16,000 और पंजाबी ढोल की कीमत 4,650 रुपए से शुरू होती है.

इन वाद्य यंत्रो पर अलग अलग पैसा लगाने की बजाए संगीतकार आजकल थोड़े महंगे कीबोर्ड खरीदना पसंद करते हैं जिनसे इन सभी वाद्य यंत्रो के अलावा अन्य कई धुनें भी निकाली जा सकती हैं.

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पुरानी फ़िल्मों में अक्सर पार्टियों के दौरान हीरो पियानो पर बैठ कर गीत गाते दिखाई देते थे.

लेकिन हैरानी की बात है कि कभी एक स्टेटस सिंबल माने जाने वाले पियानो को लोग अब खरीदते नहीं है.

फ़र्टाडोज़ के आधिकारिक आंकड़ो के अनुसार कई बिना बिके रह गए या पुराने हो चले पियानो को कबाड़ के भाव बेचा गया है क्योंकि इस विशाल वाद्य यंत्र को आजकल के छोटे होते स्टूडियो और घरों में रखना संभव नही हो पाता.

हाथी दांत, शीशम की लकड़ी और कई बार धातु से भी इसे बनाया जाता है और इसकी कीमत ढाई लाख़ से शुरू होकर 7 लाख़ तक हो सकती है.

पियानो के विकल्प के तौर पर संगीतकार इलैक्ट्रॉनिक पियानो इस्तेमाल करते हैं जो किसी छोटे खिलौने वाले पियानो की तरह दिखता है और 35 हज़ार की शुरूआती कीमत में उपलब्ध है.

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फ़र्टाडोज़ के मालिक जोसेफ़ गोम्स मानते हैं कि वाद्य यंत्रों को वापिस लोकप्रिय बनाने में बॉलीवुड अहम भूमिका निभा सकता है क्योंकि युवा अपने हीरो को जिस यंत्र को बजाते देखते हैं वो उसे सीखने के लिए उत्साहित होते हैं.

(फ़र्टाडोज़ भारत की वाद्य यंत्र बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी है जिसका मुख्यालय मुंबई में है)

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