अब यादें ही नहीं 'जिस्म' भी साथ है

  • 7 जुलाई 2016
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तीन साल दस महीने के ‘ब्रूनो’ की एक दिन अचानक दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. लेकिन मल्लिक परिवार का यह पालतू कुत्ता मौत के बाद भी उनके साथ है.

अपने कुत्ते को मौत के बाद भी पास रखने के लिए सुष्मिता मल्लिक ने उसकी 'टैक्सिडर्मी' कराई. 'टैक्सिडर्मी' यानी चर्मसंस्कार.

मल्लिक परिवार की ही तरह और भी कई परिवार हैं, जो अपने पालतू जानवरों को हमेशा के लिए ख़ुद के पास रखने के लिए उनकी टैक्सिडर्मी करवा रहे हैं.

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टैक्सीडर्मी की मदद से पालतू जीव-जानवरों को 'नई ज़िंदगी' देने का काम मुंबई के टैक्सीडर्मिस्ट संतोष गाईकवाड कर रहे हैं.

गाईकवाड ने बीबीसी को बताया कि टैक्सिडर्मी एक ऐसी कला है, जिसमें जानवरों की खाल निकालकर उनकी सजीव उपस्थिति का आभास दिया जाता है. टैक्सिडर्मी होने के बाद जो ममी बनती है उसे लंबे समय तक संरक्षित रखा जा सकता है.

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संतोष बताते हैं, "टैक्सिडर्मी में पांच तरह की कलाओं का इस्तेमाल होता है. इसमें शिल्पकला, रंगकला, शारीरिक रचना, चर्म कला और सुतार कला शामिल हैं."

टैक्सिडर्मी के बारे में वो बताते हैं, "सबसे पहले वैज्ञानिक तरीक़े से मृत जानवर की खाल को शरीर से अलग किया जाता है. फिर उस खाल को विशेष रसायन का इस्तेमाल कर खाल के बाल को सख्त किया जाता है, जिसे टैनिंग कहते हैं."

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उन्होंने आगे बताया, "अब खाल निकाले हुए शरीर का माप लिया जाता है. फिर इसी माप के क्ले और फाइबर का ढांचा बनाया जाता है. यही ढांचा जानवर के मांस की जगह लेता है."

संतोष कहते हैं कि हड्डी के ढांचे को बिना खाल के शरीर से अलग किया जाता है. बड़े जानवरों के इस प्रक्रिया मे लगभग 7-8 घंटे लग जाते हैं. उसके बाद हड्डी के ढांचे को अंतिम पोज़ के हिसाब से सेट किया जाता है और फ़ाइबर डाला जाता है.

वो कहते हैं, "फ़ाइबर डालने के बाद खाल को ऊपर से सिल दिया जाता है. बड़े जानवरों के लिए फ़ाइबर का इस्तेमाल किया जाता है. वहीं छोटे जानवर और पक्षियों के लिए नासिक से आए विशेष प्रकार के ऊन का इस्तेमाल होता है."

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फ़िनिशिंग के बारे में संतोष ने कहा कि आख़िर में जानवर को कांच से बनीं आंखें, मोम से बनी जीभ और नकली दांत लगाए जाते हैं.

वेटनरी के प्रोफेसर रहे संतोष टैक्सिडर्मिस्ट बनने की कहानी बताते हुए कहते हैं, "मैं साल 2003 में छत्रपति शिवाजी संग्रालय गया, तो वहां कई जानवरों और पक्षियों की सजीव टैक्सिडर्मी हुई देखी, जो अंग्रेज़ो के ज़माने में किया गया था."

संतोष ने बताया, "इसके बाद मुझे इस कला को सीखने की इच्छा हुई, लेकिन साल 1972 के वन्य जीव संरक्षण के अधिनयम के तहत शिकार पर रोक लगी और टैक्सिडर्मी भी विलुप्त होने लगी."

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लेकिन वो ख़ुद को धुन का पक्का बताते हुए कहते हैं, "मैंने टैक्सिडर्मी में माहिर कुछ लोगों को खोज निकाला और यह कला सीख ली."

भारत के इकलौते टैक्सिडर्मिस्ट माने जाने वाले संतोष ने बीते दस सालों में कई वन्य प्राणी, पक्षी, मछली आदि की टैक्सिडर्मी की है.

पालतू जानवरों की टैक्सिडर्मी के बारे में संतोष कहते हैं, "पालतू जानवर परिवार का हिस्सा होते हैं. ऐसे में उनकी मृत्यु के बाद वो टैक्सिडर्मी कराने आते हैं. पालतू जानवरों में अधिकतर कुत्ते, विदेशी पक्षी, खरगोश, गिलहरी और मछली शामिल हैं."

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वो कहते हैं, "कुत्तों की टैक्सीडर्मी में 12 से लेकर 25 हज़ार का खर्च आता है. वहीं पक्षियों के लिए 2 हज़ार से 10 हज़ार तक ख़र्च होता है."

महाराष्ट्र के अकोला के प्रकाश पोहारे ने अपने अफ़्रीकन ग्रे तोते ‘वॉल्टर’ की मौत के बाद उसकी टैक्सिडर्मी कराई.

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प्रकाश की पत्नी साधना पोहारे कहती हैं, "वॉल्टर हमारे साथ 8 साल तक रहा. वो नकलची था. हमारी नकल के साथ फ़ोन के रिंगटोन भी गाता था. हमें संतोष गाईकवाड के बारे में पता चला, तो हमने वॉल्टर के शव को मुंबई भेजा और आज वॉल्टर हमारे साथ है."

वहीं मुंबई की एक सिक्योरिटी एजेंसी के मालिक कैप्टन संतोष शर्मा के पास कई कुत्ते हैं, लेकिन उनको सबसे ज़्यादा प्रिय थी ‘शेरी.’

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संतोष बताते हैं, "मेरी पत्नी शेरी से जलती थी क्योंकि शेरी किसी को मेरे पास आने नहीं देती थी. उम्र बढ़ने के कारण साल 2014 मे उसकी मृत्यु हो गई."

वो कहते हैं, "लेकिन मैंने उसकी टैक्सिडर्मी करवा कर उसे हमेशा के लिए अपने पास रख लिया है. बस फ़र्क़ यह है कि वो अब बोलती नहीं है."

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