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सोमवार, 29 दिसंबर, 2003 को 03:52 GMT तक के समाचार
 
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अदीबों की अदालत है 'कितने पाकिस्तान'
 
साहित्य अकादमी
साहित्य अकादमी पुरस्कार हर वर्ष दिए जाते हैं

भारतीय साहित्य अकादमी ने वर्ष 2003 के लिए कमलेश्वर के हिंदी उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' को सम्मानित किया है. यह उपन्यास भारत-पाकिस्तान के बँटवारे और हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर आधारित है. यहाँ प्रस्तुत है इस उपन्यास की समीक्षा सुधीश पचौरी की क़लम से:

'कितने पाकिस्तान' उपन्यास एक बड़ा और नए ढंग का उपन्यास है. उसमें एक ज़बर्दस्त जिरह छिड़ी है जो हर एक धर्मतावादी को हिलाकर रख सकती है.

उपन्यास हिंदू, मुसलमान, सिख सबकी तरफ़ लगातार सवाल खड़े करता है कि मित्रता बड़ी है या शत्रुता? प्रेम बड़ा है या घृणा?

अपने असाधारण इतिहास बोध के सहारे कमलेश्वर भारत की पाँच हजार साल लंबी परंपरा में इतिहास के उन तमाम विभाजनकारी रक्तरंजित और असह्य प्रसंगों को एक दूसरे में अपनी क़लम की करामात से इस क़दर मिलाकर रख देते हैं कि समग्र मानतावादी विमर्श उठ खड़ा होता है.

दरअसल यह साधारण कहानी भर नहीं है. यह साहित्यकार की एक लोक अदालत है जिसमें हर उस मृत व्यक्ति पर मुक़दमा चलता है जिसने इस महान सभ्यता को तार-तार करने की कोशिश में घृणा के बीज बोए हैं.

यह क़ब्रिस्तान और श्मशानों के बीच जीवन की जिरह है. कोई साहित्यकार यही कर सकता है और फ़ैसला पाठक पर छोड़ दिया जाता है.

इस तरह हिंदी के एक सतत लिबरल लेखक ने लिबरलिज़्म की ताक़त को स्थापित किया है.

वक़्त की रवानी
 उपन्यास के असल नायक वक़्त की रवानी में एक दूसरे में इस क़दर पिरो दिए गए हैं कि हिंदू मुस्लिम का अलगाव ठहर नहीं पाता.
 

यहाँ गिलगमेश, एकिंदू, अशोक, बाबर, औरंगज़ेब से लेकर अशोक सिंघल, गाँधी, जिन्ना और इतिहास के ढेर सारे खलनायक और नायक अदालत में पेश होते हैं.

उपन्यास के असल नायक वक़्त की रवानी में एक दूसरे में इस क़दर पिरो दिए गए हैं कि हिंदू मुस्लिम का अलगाव ठहर नहीं पाता.

एक अनमोल साझापन निखर आता है, कमलेश्वर इसी साझेपन को तलाशते रहते हैं.

इस नज़र से यह उपन्यास हिंदी लेखन से भी एक जिरह है.

उस पर भी एक तरह से अभियोग है कि उसने अपना सही काम क्यों नहीं किया.

कमलेश्वर की लेखकीय व्यथा इस उपन्यास की हर लाइन में सिसकती नज़र आती है.

भारत यहाँ मिश्रित संस्कृतियों का एक विराट कोलाज है जिसमें लेखक कोई विभक्ति नहीं चाहता और विभाजनकारी इन दिनों में अपनी जिरहवादी जादुई शैली से जवाब देता है कि अगर अब भी कहीं कोई रौशनी बची है और बच सकती हो तो साहित्य और साहित्यकार के लोक में ही बच जाती है.

उपन्यास हिंदी लेखन और लेखक के आगे एक नई एकता क़ायम करने का मानवतावादी एजेंडा रखता है.

 
 
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