BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
 
मंगलवार, 20 जुलाई, 2004 को 20:53 GMT तक के समाचार
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
एक अमर आत्महंता प्रतिभा
 

 
 
गुरुदत्त
खुदकुशी करके गुरुदत्त ने निजी मुक्ति तो पा ली लेकिन दक्षिण एशियाई सिनेमा को कई कृतियों से वंचित कर दिया
कोई बड़ा सर्जक जब युवावस्था में ही आत्महत्या कर लेता है तो उसके साथ कई रूमानी कहानियाँ जुड़ जाती हैं और उसके प्रशंसकों का एक बड़ा संप्रदाय सा बन जाता है.

लेकिन यह रूमानियत की आस्था हवाई नहीं होती. चालीस बरस पहले सिर्फ 39 बरस की उम्र में ख़ुदकुशी कर लेने वाले गुरुदत्त की वैसी मौत अब सिर्फ़ एक दर्दनाक ब्यौरा बनकर रह गई है, लेकिन उनकी 'प्यासा', 'काग़ज़ के फूल' और 'साहब, बीबी और ग़ुलाम' सरीखी फ़िल्में दक्षिण एशियाई सिनेमा के इतिहास में अमर हैं.

बेशक़ ये तीनों बड़ी फिल्में हैं लेकिन गुरुदत्त की प्रारंभिक फिल्मों को भुला देना उनके और भारतीय सिने-दर्शकों के जटिल संबंधों को नकारना होगा.

दक्षिण एशिया में जो एक साफ़-सुथरा, लोकप्रिय और मनोरंजन सिनेमा 1950 के दशक में उभरा उसमें गुरुदत्त का केन्द्रीय योगदान है.

गुरुदत्त यूँ तो बैंग्लोर में जन्मे थे, हिन्दी या उर्दू उनकी मातृभाषा नहीं थी, लेकिन उनकी शिक्षा देश की तत्कालीन सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता में हुई, वहीं उनमें कलाओं में रूचि जागी, नृत्य सीखने की इच्छा उन्हें नृत्य-विश्वगुरु उदय शंकर के पास ले गई जो उस वक्त भारत की पहली नृत्य-फ़िल्म 'कल्पना' की योजना बना रहे थे.

इस संयोग से गुरुदत्त का रुझान सिनेमा की ओर गया और मुंबई में बन रही 1945 की फ़िल्म 'बरखारानी' में उन्होंने नृत्य निर्देशन किया साथ ही नायिका के छोटे भाई की एक मामूली भूमिका भी की.

देव आनंद की पहली फिल्म 'हम एक हैं' (1946) में भी वे नृत्य-निर्देशक थे. अमित चक्रवर्ती की फिल्म 'गर्ल्स स्कूल' (1949) और ज्ञान मुखर्जी की अपराध फिल्म 'संग्राम' में वे सहायक निर्देशक रहे.

मित्र देव आनंद ने अपनी संस्था नवकेतन की दूसरी फ़िल्म 'बाज़ी' (1951) का सम्पूर्ण निर्देशन 26 वर्षीय गुरुदत्त को सौंप दिया.

गुरुदत्त और वहीदा रहमान
वहीदा रहमान को गुरुदत्त की ही खोज माना जाता है

इस फ़िल्म की हिरोइन थी सुपरिचित पार्श्वगायिका गीता रॉय, जो बाद में गुरुदत्त से शादी करके गीता दत्त हो गईं.

उसकी कामयाबी से गुरुदत्त, देव आनंद, संगीतकार सचिन देव बर्मन और गीतकार साहिर लुधियानवी को स्थाई अखिल भारतीय ख्याति मिली.

अगली फ़िल्म 'जाल' में इस टीम के साथ गुरुदत्त ने जॉनी वॉकर को भी जोड़ लिया जो दक्षिण एशिया के सबसे साफ-सुथरे और मकबूल हास्य अभिनेता के रूप में स्वीकृत हुए.

1953 की अपने नायकत्व वाली फ़िल्म 'बाज़' इतनी सफल नहीं हुई लेकिन उसके बाद 'आर-पार', 'सीआईडी' और 'मिस्टर एंड मिसेज 55', ओ.पी. नय्यर के संगीत सहित, जो आज भी रिलीज हो रहा है, ज़बरदस्त हिट रही.

गुरुदत्त को अब बच्चा-बच्चा जानता था, फ़िल्म-उद्योग में निर्माता-निर्देशक-अभिनेता के रूप में वे स्थापित हो चुके थे. ये वो दशक था जब मोतीलाल, अशोर कुमार, बलराज साहनी, दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद सरीखी प्रतिभाएं अपने उत्कर्ष पर थीं.

1945-55 के दस वर्ष गुरुदत्त की उस बहुमुखी तैयारी के वर्ष थे जिसका अंतिम लक्ष्य कुछ बड़ी फिल्में बनाना था.

जब दिलीप कुमार वादा करके भी सेट पर नहीं आए तो गुरुदत्त ने स्वयं 'प्यासा' के भावुक, आदर्शवादी, पूंजी-विरोधी कवि की भूमिका संभाल ली.

'प्यासा' का नायक हर तरह के अन्याय, पाखंड और शोषण के विरुद्ध है. उसे किन्हीं जीवन-मूल्यों की प्यास है. एक अवसरवादी, बुर्जुआ प्रेमिका को छोड़कर वह एक वेश्या को चाहने लगता है.

अपने धनपिशाच भाइयों से उसे नफ़रत है जो उसकी कथित मौत का फ़ायदा उठाना चाहते हैं. निर्देशक गुरुदत्त की दुलर्भ विशेषता यह है कि उनकी फिल्मों में किसी भी पात्र का अभिनय दोयम दर्जे का नहीं होता.

गुरुदत्त की प्रमुख फ़िल्में
साहब बीवी और ग़ुलाम
प्यासा
काग़ज़ के फूल

'प्यासा' में गुरुदत्त, वहीदा रहमान (जो गुरुदत्त की ही खोज थीं और कहा जाता है कि उनकी मौत का कारण वही बनीं), रहमान, माला सिन्हा और जॉनी वॉकर की बेजोड़ अदाकारी है.

लेकिन फिल्म का जो संदेश था उसे सिर्फ साहिर लुधियानवी के गीतों ने सचिन देव बर्मन की धुनों से संप्रेषित किया.

'प्यासा' सरीखे गीत संसार की किसी भी दूसरी फिल्म में नहीं है. साहिर सिर्फ़ फ़िल्म के नायक ही नहीं, उस युग के करोड़ों भारतीयों की भावनाओं को व्यक्त कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं.

'प्यासा' की आशातीत सफलता ने शायद गुरुदत्त को दुस्साहसी बना दिया और उनकी अगली और दक्षिण एशिया की पहली सिनेमास्कोप फ़िल्म 'काग़ज के फूल' में वे आत्मकथा में जाते हुए एक ऐसे फिल्म-निर्देशन की कहानी दिखाते हैं जो प्रेम, परिवार और पेशे तीनों मोर्चों पर असफल रहता हुआ मुत्यु को प्राप्त होता है.

यह विषय अपने वक्त से बहुत आगे का है- वह फ्रांस की 'नूवेल बाग' और 'आत्यँय' फिल्मों के नजदीक़ था.

यह इतनी निजी और फ़िल्म की दुनिया को उघाड़ने वाली फिल्म थी कि दर्शकों को बेहद असुविधाजनक लगी. अभिनय अच्छा था, लेकिन साहिर के साथ मतभेद हो जाने के बाद एसडी बर्मन, कैफी आज़मी के साथ 'प्यासा' जैसा जादू कर न सके.

'काग़ज के फूल' में गुरुदत्त व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों मोर्चों पर मायूस हुए और उन्होंने यह लिखा भी है कि जनता की रुचि पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता, लेकिन आज वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सबसे कलात्मक फ़िल्म मानी जाती है.

गुरुदत्त
'प्यासा' का नायक हर तरह के अन्याय, पाखंड और शोषण के विरुद्ध है

'साहब, बीवी और गुलाम' के निर्देशन का श्रेय अबरार अलवी को दिया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे कि चौदहवीं का चाँद का एम सादिक़ को, लेकिन दोनों फिल्मों में अलवी और सादिक़ के असंदिग्ध योगदान के बावजूद हर फ्रेम पर गुरुदत्त की मुहर लगी साफ दिखती है.

और सच तो यह है कि अभिनय, विषय, संगीत, फोटोग्राफी और सांस्कृतिक रचाव-बसाव के मामलों में 'साहब, बीबी और गुलाम' गुरुदत्त की सर्वगुणसम्पन्न फिल्म लगती है.

मीना कुमारी का अभिनय देखकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं- वह पाक़ीज़ा की तैयारी की उड़ान थी.

रहमान की प्रतिभा को जितना गुरुदत्त पहचानते थे उतने को और नहीं, वह बेहतरीन साहब तो हैं ही, 'चौदहवीं का चाँद', में खुदकुशी से पहले रहमान की जो अदाकारी है वह सिनेमा में लासानी है- यह गुरुदत्त की पारखी, दरियादिली ही थी कि पूरी फिल्म में उन्होंने रहमान के किरदार को खुद पर हावी होने दिया.

'चौदहवीं का चाँद' बेशक़ एक लोकप्रिय मुस्लिम सोशल फ़िल्म है लेकिन उस हिस्से में भी वह बड़ी फिल्म है. 'मेरे महबूब' उसके आसपास नहीं फटकती, 'साहब, बीबी और गुलाम' अपनी पूर्णता में कालजयी है और बताती है कि एक जटिल, विस्तीर्ण साहित्यिक कृति पर फ़िल्म कैसे बनाई जाती है.

अफ़सोस यह है कि निर्देशक गुरुदत्त ने अभिनेता गुरुदत्त पर ग्रहण सा लगा दिया है वे दरअसल संजीव कुमार के अधिक स्वभाविक और वास्तविक पूर्वगामी थे.

उनमें ग्लैमर नहीं था और उन्हें अपनी फिल्मों से बाहर हमेशा बलराज साहनी और भारत भूषण जैसी भली भूमिकाएँ दी जाती रहीं लेकिन उनके किसी भी किरदार को दोयम दर्जे की अदायगी नहीं कहा जा सकता.

दूसरों के लिए अभिनीत उनकी अंतिम चार फिल्में बहूरानी (1963), भरोसा (1963) सांझ और सबेरा(1964) तथा सुहागन (1964) नाकामयाब नहीं रहीं.

वे तब चालीस बरस में कदम रख रहे थे. 'साहब, बीबी और गुलाम' की कलात्मक और व्यावसायिक सफलता ने उन्हें बल दिया होता.

वे अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी पर एक उत्तर-आधुनिक निर्वाह वाली फिल्म बनाना चाहते थे. लेकिन उनकी आत्मा को अनजान हादसों और मायूसियों ने घेर लिया था.

खुदकुशी करके गुरुदत्त ने निजी मुक्ति तो पा ली लेकिन दक्षिण एशियाई और शायद विश्व-सिनेमा को कई कृतियों से हमेशा के लिए वंचित कर दिया.

(दिल्ली में जारी एशियाई फ़िल्म समारोह में गुरुदत्त की फ़िल्मों की एक विशिष्ट श्रेणी है).

 
 
इससे जुड़ी ख़बरें
 
 
इंटरनेट लिंक्स
 
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
 
सुर्ख़ियो में
 
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
 
  मौसम |हम कौन हैं | हमारा पता | गोपनीयता | मदद चाहिए
 
BBC Copyright Logo ^^ वापस ऊपर चलें
 
  पहला पन्ना | भारत और पड़ोस | खेल की दुनिया | मनोरंजन एक्सप्रेस | आपकी राय | कुछ और जानिए
 
  BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>