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सोमवार, 14 फ़रवरी, 2005 को 13:50 GMT तक के समाचार

शालिनी जोशी
देहरादून

रस्किन बांड लिंडग्रेन अवॉर्ड के लिए नामित

मशहूर लेखक रस्किन बांड को इस साल के लिंडग्रेन मेमोरियल अवार्ड के लिये मनोनीत किया गया है. राशि के हिसाब से ये पुरस्कार नोबेल के बाद दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार है.

इस पुरस्कार की घोषणा इस महीने के अंत तक होगी

ज़ाहिर है रस्किन के लिये ये रोमांच के दिन हैं.वो कहते हैं कि ये उनके लिये गर्व की बात है कि बच्चों के लिये उन्होंने जो लिखा उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिल रही है.

स्वीडन सरकार द्वारा तीन साल पहले शुरू किये गये इस पुरस्कार की राशि करीब सात लाख अमरीकी डॉलर है यानी लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपए. पुरस्कार के लिये इस साल दुनिया भर से 87 लेखकों को मनोनीत किए गए हैं.

ये पूछे जाने पर कि अगर ये पुरस्कार उन्हें हासिल हो जाता है तो इतनी बड़ी रक़म का वो क्या करेंगे, रस्किन कहते हैं कि इसके एक हिस्से से वो बाल लेखन के क्षेत्र में एक पुरस्कार शुरू करना चाहेंगे.

हांलाकि रस्किन बच्चों के लेखक के रुप में मशहूर हैं लेकिन मूल रूप से वो मानवीय रिश्तों और प्रकृति के लेखक हैं.

अब तक उनकी 500 से ज्यादा कहानियां और अनगिनत लेख प्रकाशित हो चुके हैं. उनके कई उपन्यास भी प्रकाशित हुए हैं.

उनकी कुछ चर्चित किताबें हैं – ए फ्लाइट ऑफ पिजन्स, घोस्ट स्टोरीज फ्रॉम राज, डेल्ही इज नॉट फॉर, इंडिया आई लव, पैंथर्स मून ऐंड अदर स्टोरीज.

रस्किन अंग्रेज़ी में लिखते हैं लेकिन कमोबेश सभी महत्त्वपूर्ण भाषाओं में उनकी किताबों का अनुवाद हो चुका है और बच्चे-बड़े सभी उन्हे बड़े चाव से पढ़ते हैं.

देहरादून की एक किताब दुकान में काम करनेवाले ताराचंद उनकी लोकप्रियता के बारे में बताते हैं, "उनकी किताबों की बहुत मांग है और जो भी आता है उनके बारे में पूछता है कहां रहते हैं कैसे दिखते हैं और यहां तक कि लोग उनसे मिलने मसूरी तक चले जाते हैं".

बांड साहब के नाम से मशहूर रस्किन पिछले क़रीब चालीस सालों से मसूरी में रह रहे हैं.

इस पुरस्कार के लिये मनोनीत किए जाने पर उत्तरांचल के साहित्यिक हलकों में काफी हलचल है. उनके समकालीन साहित्यकार ऐलन सोली कहते हैं,"रस्किन के लेखन में ब्रिटिश राज के समय के भारतीय समाज को करीब से देखा जा सकता है".

रस्किन के चाहने वालों के लिये ये एक बड़ी ख़बर है.

19 साल की दिव्या अरोड़ा जो कमोबेश उनकी हर नई किताब पढ़ती हैं कहती हैं, "उन्हें पुरस्कार चाहे न भी मिले लेकिन मनोनीत होना ही अपने-आप में बहुत बड़ी बात है.”

पिछले कुछ सालों में अरूंधती रॉय, झुम्पा लाहिड़ी, विक्रम सेठ और उपमन्यु चटर्जी जैसे भारतीय लेखकों ने अंग्रेज़ी साहित्य के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपना दबदबा बनाया है और हो सकता है कि इसी कड़ी में अब एक नाम रस्किन बाँड का भी लिया जाएगा.