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भारत की एकमात्र कार्टून की पत्रिका

अख़बार के कोने में छपा एक कार्टून अक्सर ऐसे गुदगुदा जाता है कि पूरे दिन रह-रहकर हँसी आती रहती है.

लेकिन अगर कार्टून की पूरी पत्रिका ही मिल जाए तो?

ऐसी एक पत्रिका प्रकाशित होती है और लगातार आठ साल से निकल रही है.

इसके प्रकाशक संपादक त्र्यम्बक शर्मा का दावा है कि 'कार्टून वॉच' देश की एकमात्र कार्टून पत्रिका है.

इस पत्रिका की सराहना आरके लक्ष्मण, आबिद सुरती और सुधीर तैलंग जैसे कार्टूनिस्ट भी कर चुके हैं.

वे इस पत्रिका में व्यंग्य लेख भी प्रकाशित करते हैं और अक्सर हिंदी अंग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं में लेख होते हैं ताकि इसकी स्वीकार्यता व्यापक हो.

त्र्यम्बक शर्मा बताते हैं कि 1996 में अख़बार का नियमित काम छोड़कर कार्टून पर पत्रिका निकालने का जब उन्होंने मन बनाया तो लोगों ने कहा था कि जब साप्ताहिक हिंदुस्तान और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएँ नहीं चल पाईं तो कार्टून की पत्रिका कैसे चल पाएगी लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी.

आज पत्रिका लाभ अर्जित न कर रही हो लेकिन 100 रुपए वार्षिक शुल्क वाली यह पत्रिका अब अपने दम पर निकल रही है. त्र्यम्बक शर्मा बताते हैं कि हर महीने वे पाँच हज़ार प्रतियाँ प्रकाशित करते हैं.

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "इस पत्रिका में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल, बिहार और उत्तर प्रदेश के कार्टूनिस्ट नियमित रुप से अपने कार्टून भेज रहे हैं."

शुरुआत

वे मानते हैं कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से यह पत्रिका निकालना एक चुनौती है.

त्र्यम्बक शर्मा बताते हैं कि उन्हें कार्टून से लगाव तो बचपन से था लेकिन भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत उनके पिता ने उनका मनोबल बढ़ाया और वे कार्टून बनाने लगे और फिर परिवार के प्रोत्साहन से ही पत्रिका भी निकलने लगी.

उस पत्रिका की प्रेरणा उन्होंने शंकर्स वीकली से भी ली थी.

अब वे वार्षिक आयोजन भी करने लगे हैं जिसमें पत्रिका की ओर से देश के मशहूर कार्टूनिस्टों को रायपुर बुलवाया जाता है.

कार्टून वॉच की ओर से बड़े कार्टूनिस्टों को लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी दिया जा रहा है.

जैसा कि त्र्यम्बक शर्मा बताते हैं, "मुख्य अतिथि को समारोह की शुरुआत कार्टून बनाकर ही करनी होती है चाहे वे मुख्यमंत्री हों या राज्यपाल या फिर कोई और."

है ना 34 पृष्ठों की इस पत्रिका में कोई बात.