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शुक्रवार, 22 अप्रैल, 2005 को 06:34 GMT तक के समाचार
 
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ब्रिक लेन, बांग्लादेश और ब्रिटेन
 

 
 
लेखक टॉरक्विन हॉल
पुस्तक की रिलीज़ के अवसर पर प्रतियों पर हस्ताक्षर करते लेखक
ब्रिटेन में चुनावों से पहले एक बार फिर दूसरे देशों से आकर ब्रिटेन में बसने वालों के मुद्दे ने तूल पकड़ना शुरु कर दिया है और इसे लेकर अच्छी खासी बहस हो रही है.

केवल लंदन ही नहीं ब्रिटेन के कई शहरों में विकासशील और ग़रीब देशों से भारी संख्या में लोग आकर रह रहे हैं जिसके नुक़सान के साथ साथ फायदे भी हो रहे है.

इसे मुद्दे से जुड़ी एक क़िताब पिछले दिनों प्रकाशित हुई है जिसका नाम है सलाम ब्रिक लेन.

किताब प्रकाशित करने की जगह भी थी वहीं यानी ब्रिक लेन में ही.

ब्रिक लेन, लंदन का एक ऐसा इलाक़ा है जहां भारी संख्या में बांग्लादेशी लोग आकर बसे हैं.

इसी इलाक़े में ढाई साल से अधिक समय रहने के बाद टॉरक्विन हॉल ने ये क़िताब लिखी है. टॉरक्विन अंग्रेज़ हैं लेकिन भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में घूम फिर कर काम कर चुके हैं.

आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई अंग्रेज़ी भाषा की यह पुस्तक इमीग्रेशन या दूसरे देशों से लोगों के बसने संबंधी समस्या पर सीधे बात नहीं करती बल्कि कहीं न कहीं समस्या से दो चार कराती ज़रुर है.

 मैं कभी पंजाबी खाना खाता हूं. कभी दक्षिण भारतीय, कभी उत्तर भारतीय, कभी अफगानी. सोचिए सिर्फ इंग्लिश भोजन करना कितना बोरिंग हो सकता है.
 
टॉरक्विन हॉल

पिछले दिनों पुस्तक की रिलीज़ के अवसर पर लेखक से मुलाक़ात के दौरान मैंने उनसे यही पूछा कि क्या यह क़िताब इसी समस्या को ध्यान में रख कर लिखी गई है तो उनका कहना था " मैं इसे समस्या नहीं मानता लेकिन ये ज़रुर है कि अब लोग ये सवाल उठाने लगे हैं कि कितने लोग आने चाहिए. ब्रिटेन को भी ऐसे लोगों की ज़रुरत है लेकिन अगर संख्या बहुत अधिक हो जाए तो समस्या वाज़िब है."

सवाल ही सवाल

ये जवाब लेखक का शायद अपना न भी हो क्योंकि पुस्तक का एक चरित्र चार्ली भी लेखक से यही सवाल करता है.

और ऐसे ही कई बांग्लादेशियों, यहूदियों, अफगानियों और कोसोवो के विस्थापितों के सवालों से भी लेखक को दो चार होना पड़ता है. चाहे वह लेखक का मकान मालिक अली हो या फिर दूसरे अफ़गानी किराएदार या फिर दुकान में बैठा भारतीय नागरिक.

हां इनके सवाल लेखक से अलग होते हैं. दूकान पर बैठा भारतीय कहता है, मैं इमीग्रेशन के मामले में ऐसी पार्टी के साथ हूं जो बाहरी ( भारतीय, बांग्लादेशी और अन्य ) का आना बंद करा दे.

दूसरी तरफ़ मकान मालिक अली के सवाल लेखक से कुछ और होते हैं.

इन्हीं सवालों और जवाबों के भंवर में कहीं खोकर लेखक अपनी अलग तकरीर बनाता है जिसे उन्होंने मेरे सामने भी रखा.

लेखक मानते हैं कि लंदन में अगर दूसरे देशों के लोग आकर नहीं बसते तो शायद लंदन, लंदन नहीं होता. एक बहुत ही मनहूस सा शहर होता लेकिन विदेशियों के कारण इसे कॉस्मोपॉलिटन कहा जाता है जहां सैकड़ों भाषाओं के लोग मिल जाते हैं.

ब्रिक लेन
ब्रिक लेन में सड़कों के संकेत बांग्ला में भी लिखे हुए हैं

टॉरक्विन कहते हैं " मैं कभी पंजाबी खाना खाता हूं. कभी दक्षिण भारतीय, कभी उत्तर भारतीय, कभी अफगानी. ये सिर्फ इसलिए क्योंकि यहां सब मिलता है. नहीं तो सोचिए, सिर्फ इंग्लिश भोजन करना कितना बोरिंग हो सकता है. "

टॉरक्विन मानते हैं कि दूसरे देशों से लोगों का आना लंदन को जीवंत बनाए रखता है.

उनकी क़िताब में सिर्फ यही समस्या नहीं है बल्कि प्रवासी लोगों की समस्याओं का भी चित्रण है. वो ब्रिटेन में, लंदन में या फिर ब्रिक लेन में कैसे अपनी ज़िदगी बसर करते हैं.

कम पैसे पर किस तरह हर चीज़ का जुगाड़ करना पड़ता है और कैसे रोजमर्रा की छोटी छोटी बातों से लोग खुश हो लेते हैं.

खुद टॉरक्विन क़िताब लिखने के लिए ब्रिक लेन जाकर नहीं रहे थे बल्कि पैसों की तंगी ने उन्हें वहां रहने पर मज़बूर किया था.

ऐसे में अपने अनुभवों को सहेज कर पुस्तक की शक्ल देकर इस लेखक ने न केवल ब्रिटेन की एक समस्या की तरफ सबका ध्यान खींचा है बल्कि विदेशों में रह रहे ग़रीब प्रवासियों की मुश्किलों को भी उजागर करने की कोशिश की है.

सिर्फ़ इतना ही नहीं इस पुस्तक के ज़रिए लेखक ने ब्रिक लेन और लंदन के ईस्ट एंड के इतिहास को भी समेटने की कोशिश की है जिसे हमेशा से नीची नज़र से देखा जाता रहा है.

 
 
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