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सोमवार, 02 मई, 2005 को 14:00 GMT तक के समाचार
 
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'सोनिया और वाजपेयी एक हैं'
 
रहबरी के सवाल
(बीबीसी हिंदी के पाठकों के लिए हम एक नया स्तंभ शुरु कर रहे हैं - 'पखवाड़े की पुस्तक'. जैसा कि नाम से ज़ाहिर है इसमें हम हर पखवाड़े हिंदी में प्रकाशित होने वाली एक महत्वपूर्ण पुस्तक का एक अंश प्रकाशित करेंगे. आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी. - संपादक)

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर मानते हैं कि राजनीतिक स्तर पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी एक थे और अब भी एक हैं.

चंद्रशेखर मानते हैं कि सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री न बनकर कोई त्याग नहीं किया है और अगर वे प्रधानमंत्री बन जातीं तो उनकी सरकार अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना में बुरी साबित होती.

उन्होंने अपने 75 वीं वर्षगाँठ के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि वाजपेयी जी हटे तो और बुरी सरकार आएगी लेकिन अब वे बताते हैं कि उस समय लोगों ने समझा था कि उनका इशारा लालकृष्ण आडवाणी की ओर था लेकिन दरअसल उनका इशारा सोनिया गाँधी की ओर था.

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय की नई किताब 'चंद्रशेखर रहबरी के सवाल' में चंद्रशेखर ने ये सब बातें कही हैं.

रामबहादुर राय की यह किताब चंद्रशेखर से उनके 35 सालों के राजनीतिक जीवन पर किया गया एक लंबा साक्षात्कार है जिसमें उन्होंने समकालीन राजनीति पर टिप्पणियाँ की हैं.

इसी पुस्तक का एक अंश -

सवाल - क्या सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग किया है?

चंद्रशेखर - तेरह तारीख को जब 14वीं लोकसभा का परिणाम आया तब सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनने को तैयार थीं. 17 तारीख को जब यूपीए की लीडर चुनी गईं, तब भी प्रधानमंत्री बनने को तैयार थीं. 18 तारीख को राष्ट्रपति महोदय से मिलने के बाद क्या हो गया? मैं तो इसे करिश्मा ही समझता हूं कि कलाम साहब (राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कमाल) के दर्शन मात्र से कोई व्यक्ति त्यागी हो जाता है.

सोनिया गाँधी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि हम सोचते कुछ और हैं, कहते दूसरी बात हैं. हमारी स्थिति यह है कि जिस काम को हम नहीं कर सकते, नहीं कर सकते. मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा था कि प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था? मुझे लगने लगा कि राजीव गाँधी के साथ मिलकर सरकार नहीं चलाई जा सकती है. राजीव गाँधी ने सौ लोगों से कहा कि हमने तो समर्थन वापस लिया नहीं है. राजीव गाँधी का बयान तमाम अखबारों में छपा. राजीव गाँधी ने मुझसे कहा कि आपके कहने से मैं पीएम ऑफिस में एक चपरासी भी सस्पेंड नहीं करा सकता. अगर एक प्रधानमंत्री अपने पद पर बने रहने के लिए एक चपरासी के साथ अन्याय कर सकता है तो वह देश के साथ भी अन्याय कर सकता है. इसे कुछ लोग जज़्बात कहेंगे, कुछ लोग बेवकूफ़ी. सिस्टम में गड़बड़ी नहीं है. हम लोग गड़बड़ हो गए हैं. हम लोग मतलब, ऑपरेटर.

एक-डेढ़ महीने में ही मनमोहन सरकार से लोगों का मोह भंग होने लगा है. किस आधार पर इतनी बड़ी आशा थी? कोई ऐसा विश्लेषण नहीं जो उनके लिए इस्तेमाल हुआ हो. वे योग्य व्यक्ति हैं. हमारे मित्र हैं. हमारे 75वें जन्मदिन पर अटल बिहारी वाजपेयी आए थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण में कहा कि चंद्रशेखर हमसे इस्तीफ़ा माँगते हैं. फिर उन्होंने गुजरात का प्रसंग छेड़ दिया. मुझे भी मौका मिल गया. मैंने अटल बिहारी वाजपेयी से कहा कि कभी-कभी तो मन में आता है कि आपसे इस्तीफ़ा माँगूं. लेकिन आपके बाद जो सरकार आएगी, वह और भी बुरी होगी. आडवाणी भी बैठे थे. लोगों ने सोचा, मेरा इशारा आडवानी की तरफ है. मेरे दिमाग में सोनिया गाँधी ही थीं. हम सेकुलरिज़्म से प्रभावित होने वाले नहीं हैं. जो सेकुलरिज़्म हमारे मित्र विश्वनाथ प्रताप सिंह, सोमनाथ चटर्जी और मधु दंडवते को प्रभावित करता है, उसका कोई मतलब नहीं है.

सवाल - क्या आप मानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गाँधी में आपसी राजनीतिक समझदारी थी?

चंद्रशेखर - जब तक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, हमसे छुपाकर कुछ भी करें, अटल बिहारी और सोनिया गाँधी एक थे और आज भी सोनिया गाँधी और अटल बिहारी एक हैं.

सवाल - इसे थोड़ा विस्तार से बता दें.

चंद्रशेखर - नहीं, मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहूंगा. सोनिया गाँधी कभी इस हैसियत में तो नहीं रहीं कि अटल बिहारी वाजपेयी को डरा सकें, मगर जब सोनिया गाँधी ने अटल बिहारी वाजपेयी से कुछ कहा, उन्होंने उपकृत करने की पूरी कोशिश की और आज अटल बिहारी वाजपेयी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ सोनिया गाँधी नहीं जा सकतीं. पॉलिसी के स्तर पर तो दोनों एक ही हैं. कभी कोई अंतर नहीं रहा.

अटल बिहारी वाजपेयी

पॉलिसी के लिहाज से दोनों अमेरिका के साथ हैं. देश में कोई ऐसी घटना नहीं जिसकी ख़बर हमें न हो. अगर कोई बात या गतिविधि होती है तो उसी सरकार का कोई आदमी हमें बता देता है. एक घटना सुनाता हूं. एक बार सीताराम केसरी मेरे पास पहुंचे. कहने लगे, लोग आपकी बहुत शिकायत करते हैं. हमने पूछा कि कौन लोग कह रहे थे? उन्होंने नाम बताने से इनकार कर दिया. फिर मैंने कहा कि तुम नहीं बताओगे तो मैं ही बता देता हूं. मैंने केसरी से कहा कि परसों तुम और तुम्हारे साथ दो आदमी बैठे थे. दो मिनट तो वह चुप बैठा रहा, फिर उठकर चला गया. दो दिन के बाद आया और पूछने लगा, आपसे किसने कहा? हमने केसरी से कहा कि जाकर इंदिरा गाँधी से कह दो कि अगर अकेले में बात करती हैं तो समझ में आती है. लेकिन दो आदमी हैं तो उसमें एक आदमी हमारा है. वस्तुतः यह देश निष्कपट लोगों का देश है. घपला करने वाले ऊपर के कुछ लोगों को यह ग़लतफ़हमी है कि देश वे लोग चला रहे हैं.

सवाल - 14वीं लोकसभा में कई लोग हार गए, लेकिन तुरंत राज्यसभा में पहुंच गए. इसको आप किस रूप में देखते हैं.

चंद्रशेखर - शायद उन्हें लगता हो कि उनके बिना देश नहीं चल सकता? वैसे यह कोई नई बात नहीं है. 1984 में बहुत लोग हार गए. बाद में राज्यसभा में पहुंच गए. मैं भी चुनाव हार गया था. एक सज्जन ने मुझसे कहा कि आप भी राज्यसभा में आ जाइए और हम भी आते हैं. हमने उनसे विनम्रतापूर्वक कहा कि आप ही राज्यसभा में जाएंगे क्योंकि आपके बिना देश नहीं चल सकता. राजनीति में कोई व्यक्ति अपरिहार्य नहीं होता. कोई मर ही गया तो क्या हो जाएगा? यह तो मान ही लें कि हारना एक “पॉलिटिकल डेथ” नहीं है.

सवाल - मायावती लोकसभा छोड़कर राज्यसभा में पहुंच गईं, क्या कारण हो सकता है?

चंद्रशेखर - मैं नहीं जानता. अनेक कारण हो सकते हैं. इस तरह के फ़ैसलों में कभी-कभार तात्कालिकता काम करती है.

सवाल - 14वीं लोकसभा चुनावों से केंद्र की सत्ता में बदलाव आया. एक गठबंधन सरकार (एनडीए) की विदाई हुई और दूसरे गठबंधन (यूपीए) ने सत्ता संभाली. जिस बदलाव की उम्मीद थी, वह पूरा होता नहीं दिख रहा है.ऐसा लगता है कि देश एक राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है. इस सरकार के सामने की चुनौतियों को आप किस प्रकार देखते हैं?

लोकसभा के पिछले चुनाव से केंद्र की सरकार में बदलाव आया था. इस परिवर्तन से लोगों में आशा की नई भावना पैदा हुई थी. एक प्रमुख राजनीतिक दल की अध्यक्ष ने अपनी पहल से ऐसी भावना पैदा की जिसे मीडिया ने बड़े त्याग के रूप में देखा. इनमें से कुछ ने तो उनकी तुलना महात्मा गाँधी और जयप्रकाश नारायण से भी कर डाली. उनके अनुसार इससे उनके (अध्यक्ष) लिए इस देश को नया युग में पहुंचाने में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने का दरवाज़ा खुल गया.

मनमोहन सिंह

प्रधानमंत्री पद के लिए सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री तथा ईमानदार बुद्धिजीवी के चयन से उनके नेतृत्व में अतिरिक्त कौशल का माद्दा देखा गया. लेकिन आज ये सभी आशाएँ धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं और लगता है कि एक राष्ट्र के रूप में अभी हम अपनी कल्पनाओं की ही दुनिया में विचरण कर रहे हैं.
मुझ जैसे व्यक्ति को केंद्र में नई सरकार के आने से बड़ी राहत मिली. लेकिन थोड़े ही अरसे में आज मुझे लगने लगा है कि मेरा एक साधारण सा बयान सत्य साबित हो गया और देश राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ा हो गया.

इससे यह नहीं समझा जाना चाहिए कि मैं किसी भी तरह जो सरकार चली गई है, उसके फिर लौटने का स्वागत करता. जो सरकार चली गई, अपने कामों और अपने दृष्टिकोणों से उसने देश को एक संकट के कगार पर कर खड़ा कर दिया था और अगर वह बनी रहती तो देश में प्रतिगामी और फूट पैदा करने वाली शक्तियों को ही मज़बूत करती. परंतु उस सरकार ने जो चार सालों में किया था, लगता है कि वर्तमान सरकार सिर्फ़ चार महीनों में ही उससे आगे निकल गई.

सरकार का एक मंत्री एक स्वतंत्रता सेनानी के विरुद्ध कुछ अपमानजनक टिप्पणी करता है और सत्तारूढ़ दल का अध्यक्ष उसे नकारने के बजाय केवल यह कहना उचित समझती है कि वह मंत्री का व्यक्तिगत विचार था. परंतु मामला केवल टिप्पणी करने का ही नहीं था बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की, जिनका हमारे स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण स्थान था, पत्थर की पट्टिकापर अंकित कुछ उक्तियों को हटाने का भी था. जिस व्यक्ति को लेकर विवाद उत्पन्न किया गया, संभव है कि हम उसके कुछ विचारों और कुछ कार्यों से सहमत न हों, परंतु उसको लोगों की निगाह में गिराने का कोई औचित्य नहीं है, जैसा मंत्री ने किया था. इससे बचा जा सकता था.

चंद्रशेखर

लेकिन यह कोई अकेला मामला नहीं है. एक वरिष्ठ और महत्वपूर्ण मंत्री ने यह आरोप लगाया कि लोकसभा में विपक्ष के नेता एक पड़ोसी देश में एक आपराधिक षडयंत्र के मुलजिम हैं और भगोड़े हैं. सत्तारूढ़ गठबंधन के किसी भी नेता में यह साहस नहीं है कि वह इस तरह की खतरनाक प्रवृतियों पर अंकुश लगा सके. संभव है कि आपत्तिजनक और भोंडी भाषा का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और कुछ अन्य लोगों को, जो राजनीति और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को एक मनोरंजक लग सकता है. परंतु भविष्य का यह तकाज़ा है कि देश ऐसी प्रवृत्तियों पर ज़्यादा गंभीरता से विचार करे. जनता के एक वर्ग का समर्थन हासिल करने की दृष्टि से अपने विरोधी को नीचा दिखाने का क्रियाकलाप कुछ फायदेमंद लग सकता है परंतु लंबे दौर में इसके परिणाम विनाशकारी ही होंगे.

सवाल - वर्ष 2004 कई महत्त्वपूर्ण राजनीतिक एवं अन्य घटनाओं के लिए याद किया जाएगा. आप इन घटनाओं का आकलन किस प्रकार करते हैं?

चंद्रशेखर - पहली बार कोई ग़ैर-राजनीतिक आदमी प्रधानमंत्री बना है. यह देश के लिए शुभ होगा या अशुभ, इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. इसका एक असर यह होगा कि राष्ट्रीय जनजीवन में राजनीतिक लोगों का महत्त्व धीरे-धीरे कम होता जाएगा. बीते साल की यह सबसे अधिक गौर करने लायक और चिंताजनक देन है.

इसके लिए वे लोग कम ज़िम्मेदार नहीं हैं जो राजनीति में हैं. राजनीति वास्तव में हो ही नहीं रही है. मैं राजनीति का विद्यार्थी हूं. हमने जिसे राजनीति समझा, उसका वास्ता वेश के आम लोगों के दुख-दर्द से है. इस मायने में राजनीति अति गंभीर और दायित्वपूर्ण क्षेत्र है. राजनीति में लिए गए हर छोटे-बड़े फैसले का देश की अस्मिता और यहाँ रह रहे करोड़ों लोगों की जिंदगी से सीधा सरोकार है. सत्ता के लिए एक बेमेल और बेतुके गठबंधन के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है. यह भ्रम नहीं रहना चाहिए कि देश की जनता ने यूपीए गठबंधन को चुना है. सच यह है कि जनता ने राजग को हराया.

 यूपीए सरकार बदले की कार्रवाई पर उतर आई है. गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस कर रही है. मैं जिस कांग्रेस को जानता हूँ, उसका स्वभाव कभी बदला लेने का नहीं होता था. अगर असावधानी और नासमझी में उसने कभी ऐसे कदम उठाए तो उनके नतीजे बहुत ख़राब हुए. आपातकाल की घटनाएं गवाह हैं
 

अक्सर यह कहा जाता है कि मनमोहन सिंह दबाव पड़ने पर प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़कर अलग हो जाएंगे. मैं यह समझ नहीं पाता हूं कि ऐसा क्यों कहा जाता है? अगर उन्हें पद छोड़ना होता तो वे स्वीकार ही क्यों करते? शुरुआत में इस सरकार से आम आदमी ने कुछ आशाएं बना ली थीं, वे टूट रही हैं. इस सरकार के मंत्री कई भाषाओं विविध स्वरों में बोल रहे हैं. उनमें नीतिगत मसले भी हैं. इससे भ्रम पैदा हो रहा है. अभी हाल ही की घटना है. रक्षामंत्री का जो बयान था, वह गृहमंत्री के बयान से मेल नहीं खाता था. ऐसी विरोधाभासी परिस्थिति में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंतित होना बहुत स्वाभाविक है. ऐसे बहुत थोड़े लोग हैं जो यह जानते हैं कि इस समय देश में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है.

आगामी दिनों में देश के सामने अनेक बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हो सकती है. इसके संकेत विभिन्न क्षेत्रों से मिल रहे हैं. सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के रवैए से लगता है कि वे उसे सही रूप में समझ नहीं पा रहे हैं. इस कारण संकट अधिक बड़ा हो सकता है. यूपीए सरकार बदले की कार्रवाई पर उतर आई है. गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस कर रही है. मैं जिस कांग्रेस को जानता हूँ, उसका स्वभाव कभी बदला लेने का नहीं होता था. अगर असावधानी और नासमझी में उसने कभी ऐसे कदम उठाए तो उनके नतीजे बहुत ख़राब हुए. आपातकाल की घटनाएं गवाह हैं. उन्हें अपवादस्वरूप ही देखा जाना चाहिए.

शंकराचार्य

इन दिनों ऐसी घटनाएं हो रही हैं जिनसे मन क्षुब्ध हो जाता है. केंद्र में कोई सरकार काम कर रही है या नहीं, यह सवाल उन घटनाओं में पैदा होता है. कांची मठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को हत्या के आरोप में जेल में डाल दिया गया. उनके साथ जिस तरह का दुर्व्यवहार हो रहा है, वह किसी सभ्य समाज के लिए कलंक का विषय है. मैं नहीं जानता कि उनका हत्या में कोई हाथ है या नहीं. उन पर आरोपों की छानबीन इस तरह नहीं होनी चाहिए, जैसी हो रही है. उन्हें दोषी मानकर परेशान किया जा रहा है. ऐसे नाजुक मामले में केंद्र सरकार का रवैया तमाशबीन का है.

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के बयान पढ़कर मुझे हैरानी होती है. वे यह बताना चाहते हैं कि उनकी इसमें कोई भूमिका नहीं है. उन्हें फिर यह भी बताना चाहिए कि भारत सरकार का अस्तित्व क्यों है ? जयेंद्र सरस्वती एक व्यक्ति मात्र नहीं हैं. वे शंकराचार्य के पद पर हैं. उनके साथ कम से कम ऐसा व्यवहार होना चाहिए जिसे सभ्य समाज स्वीकार करता है. राज्य सरकार अगर बदले की भावना से कार्रवाई कर रही तो केंद्र अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता.
(पृष्ठ 129 से 134)
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पुस्तक : चंद्रशेखर रहबरी के सवाल, राजनीति के पैंतीस वर्षों की पड़ताल
साक्षात्कार : रामबहादुर राय
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 350 रुपए.
ISBN : 81-267-1069-1

 
 
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