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गुरुवार, 26 मई, 2005 को 13:18 GMT तक के समाचार
 
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क्यों खोखली होती हैं भारतीय फ़िल्में ?
 

 
 
बेनेगल ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया नामक बेहतरीन धारावाहिक भी बनाया है
हिंदुस्तान में राष्ट्रीय आंदोलन और सिनेमा, दोनों की शुरुआत एक साथ हुई. राष्ट्र की भाषा को स्वीकारने के साथ एक भाषा की ज़रूरत हुई जो बहुसंख्य जन की भाषा हो.

जब तक मूक फ़िल्मों का दौर था, तब तक समस्या नहीं थी, मूक फ़िल्में कहीं भी देखी समझी जा सकती थीं.

1931 में बोलती फ़िल्मों के साथ ही भाषाई अलगाव का दौर भी तेज़ हुआ. इस दौर में सबको अपनी भाषा में फ़िल्में चाहिए थीं इसलिए क्षेत्रीय फ़िल्में भी बनने लगीं और हर भाषा की फ़िल्मों का अपना दर्शक वर्ग और बाज़ार बना.

हिंदी फ़िल्मों के लिए भारत के विभिन्न प्रदेशों में व्यापार की संभावनाएँ थीं मगर इसी कारण उसे विभिन्न संस्कृतियों को आत्मसात भी करना पड़ा और फ़िल्मों में एक सर्वसामान्य सांस्कृतिक परिवेश भी दिखाई पड़ने लगा.

इस तरह फ़िल्मों की दुनिया एक काल्पनिक दुनिया बन गई क्योंकि उसमें विभिन्न प्रदेशों की संस्कृति का घालमेल था.

फ़िल्मों में चीज़ें अस्पष्ट सी होती थीं जैसे नाम को ही लें, सरनेम नहीं होते थे जो किसी जाति या क्षेत्र को सूचित करें.

जैसे मास्टर अशोक, अब अशोक बेनर्जी हैं या मल्होत्रा, वर्मा हैं या अय्यर, ये पता नहीं चलता था.

फ़िल्मों में दिखाए गए घर किसी स्थान विशेष की संस्कृति को नहीं दर्शाते थे, फिर हिंदी फ़िल्में जहाँ बनती थीं, चाहे कलकत्ता हो, लाहौर हो या बंबई, हिंदी यहाँ की भाषा थी ही नहीं, तो हिंदी फ़िल्मों की दुनिया एक अजीब सी दुनिया बना जिसका सच से कोई सीधा ताल्लुक नहीं था.

निर्देशक के बतौर मैं भी इन समस्याओं से जूझता रहा हूँ क्योंकि इस माध्यम की पहले से ही निश्चित सीमाओं में ही आपको काम करना पड़ता है, ये ऐसा है कि पलंग तो पहले से तैयार है पर पलंग पर लेटने वाले की लंबाई ज़्यादा है तो उसकी टाँगें काट दो.

तो इस तरह फ़िल्मों का ऐसा चेहरा रचा गया जो राष्ट्रीय तौर पर स्वीकृत हो, हर जगह उसे पहचाना जा सके और इसीलिए फ़िल्मों का लोक, परीलोक बन गया.

शास्त्रीय नाटकों की परंपरागत तर्ज पर कहानी को बताने के सुखांत और दुखांत नज़रिए आए और वहीं से गाने भी आए. आप आज भी फ़िल्मों में वही सब देख सकते हैं कि कहानी जब गंभीर होने लगती है तो हास्य के कुछ टुकड़े होते हैं और फिर कहानी अपना रास्ता पकड़ती है और इन सब के बीच में कुछ गाने होते हैं.

सिनेमा फ़ोटोग्राफ़ी पर निर्भर एक माध्यम है और फ़ोटोग्राफ़ी का संबंध प्रकृति और यथार्थ से है, फ़ोटोग्राफ़ी चीज़ों को वैसे ही दिखाती है जैसे कि वास्तव में वो हैं. इसके साथ सिनेमा का दूसरा अंग था मनोरंजन, जिसमें हर छोटा और बड़ा ख़ास और आम रस ले सके.

इन दोनों ही तत्वों को मिलाकर जो रसायन बना, वो सबका प्रतिनिधित्व करने का दावा करता हुआ किसी का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता था.

(मुंबई मे अपराजित शुक्ल के साथ बातचीत पर आधारित)

 
 
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