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बुधवार, 08 फ़रवरी, 2006 को 10:55 GMT तक के समाचार
 
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एक छोटे सुराख़ से दिखती बड़ी दुनिया
 
खिलो कुरिंजी
इससे पहले मधुकर उपाध्याय की 11 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं
अख़बारों में लिखे जाने वाले कॉलम या तो राजनीति पर होते हैं या किसी समसामयिक घटना पर फ़ौरी तौर पर की गई टिप्पणी.

कम से कम हिंदी के अख़बारों में तो यही परंपरा है.

इस परंपरा के कुछ अपवाद भी रहे हैं और इसी अपवाद की एक कड़ी है 'जनसत्ता' में प्रकाशित मधुकर उपाध्याय का कॉलम 'इस बहाने'.

हर पखवाड़े प्रकाशित होने वाले इस कॉलम में मधुकर उपाध्याय ने एक नया प्रयोग किया. उन्होंने हाशिए पर प्रकाशित होने वाली या अक्सर अनदेखी सी रह जाने वाली ख़बरों को, या किसी छोटे से किसी प्रसंग को एक सिरे से पकड़ा और उसी के सहारे इतिहास, भूगोल और विज्ञान बहुत कुछ को खंगाल डाला.

जैसे छोटे से सुराख़ से लेखक ने एकबारगी पूरी दुनिया दिखा दी हो.

अलग-अलग विषयों पर लिखी गईं उनकी 27 टिप्पणियाँ हाल ही में पुस्तकाकार प्रकाशित हुई हैं.

'खिलो कुरिंजी' शीर्षक से प्रकाशित इस पुस्तक से ही प्रस्तुत है एक टिप्पणी.

एकांत में गाली-गलौज

क्रोध एक सहज भाव है. समस्या क्रोध के होने से नहीं होती. उसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति से होती है. दिखने से होती है. वह न दिखे तो सब कुछ सामान्य ढंग से चलता रहे. लेकिन मुश्किल यह है कि विरोध प्रदर्शन बंद कमरे में नहीं हो सकता. वह विरोध होगा. प्रदर्शन नहीं. एकांत में धरना किस काम का? घने जंगल में अकेले भूख हड़ताल से क्या हासिल? पश्चिम का तर्क है कि प्रतिक्रिया के लिए उसका दिखना अनिवार्य है. इस पर कई किताबें लिखी गई हैं. डेव बर्ग ज़ोर देकर कहते हैं कि दिखाई न देने वाला क्रोध अर्थहीन है. पचा लिए गए क्रोध का कोई असर नहीं होता.

खिलो कुरिंजी

दुनिया की दो पुरानी संस्कृतियाँ इससे सहमत नहीं हैं. भारतीय और यहूदी. ये दोनों समाज मानते हैं कि क्रोध का असर प्रदर्शन किए बिना भी हो सकता है. होता है. उनके यहाँ क्रोध का एकांतिक प्रदर्शन ललित कला है. भारतीय और यहूदी धर्मग्रंथ इसके गवाह हैं. दोनों के इतिहास में इसका कई जगह हवाला मिलता है. बौद्ध साहित्य इससे भरा पड़ा है. जातक कथाओं में इसका उल्लेख मिलता है. कल्हण की राजतरंगिणी में इसे जगह-जगह पढ़ा जा सकता है. उनका मानना था कि क्रोध का सार्वजनिक प्रदर्शन सभ्य और अनुकरणीय आचरण नहीं है.

इसका बाक़ायदा इंतज़ाम किया जाता था कि विरोध सार्वजनिक घटना न बने. ऐसी व्यवस्था होती थी कि लोग अपना ग़ुस्सा अकेले में निकाल लें. सार्वजनिक स्थानों से दूर. पहाड़ पर, नदी के किनारे या जंगल जाकर. जो लोग जंगल नहीं जा सकते थे, उनके लिए अलग से भवन बनाए जाते थे. या फिर नगर में ही कोई जगह और समय तय कर दिया जाता था. ताकि वे वहाँ जाकर चीख-चिल्ला लें. अपने दिल का गुबार निकाल लें. क्रोध की एक एकांतिक अभिव्यक्ति बेकार नहीं जाती थी. उसका निश्चित तौर पर असर होता था. उन्होंने इसका एक ढंग विकसित कर लिया था. इस व्यवस्था में क्रोध की अभिव्यक्ति एकांत में होती थी. लेकिन उसकी घोषणा सार्वजनिक रूप से की जाती थी. अक्सर इसी से समस्या का हल निकल आता था.

 चिकित्सा विज्ञान अब इसी नतीजे पर पहुँचा है. एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि ग़ुस्सा आए तो किसी निर्जन स्थान पर चले जाइए. पेड़ों पर चिल्लाइए. सूरज को गालियाँ दीजिए. नदी को भला-बुरा कहिए. आप स्वस्थ महसूस करेंगे. मतलब कि ग़ुस्सा निकालने के लिए अपने कद से बहुत बड़ा लेकिन ऐसा लक्ष्य चुनिए, जो पलट कर जवाब न दे
 

चिकित्सा विज्ञान अब इसी नतीजे पर पहुँचा है. एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि ग़ुस्सा आए तो किसी निर्जन स्थान पर चले जाइए. पेड़ों पर चिल्लाइए. सूरज को गालियाँ दीजिए. नदी को भला-बुरा कहिए. आप स्वस्थ महसूस करेंगे. मतलब कि ग़ुस्सा निकालने के लिए अपने कद से बहुत बड़ा लेकिन ऐसा लक्ष्य चुनिए, जो पलट कर जवाब न दे. आपका कुछ बिगाड़ न सके.

डेयट ब्राउन से डॉक्टरों ने यही कहा. ब्राउन जर्मनी में रहते हैं. वहीं पढ़े-लिखे. बड़े हुए. शादी हुई. कुछ ही समय में पत्नी से संबंध बिगड़ गए. गाली-गलौज की नौबत आ गई. पहले ऐसा कभी-कभार होता था. फिर रोज़ होने लगा. फिर दिन में कई-कई बार. डॉक्टरों ने उन्हें जंगल में जाने की सलाह दी. कहा कि वहाँ जाकर किसी पेड़ को जी-भरकर गालियाँ दें. उसे डॉटें. चीखें-चिल्लाएँ. ब्राउन को यह बात समझ नहीं आई, पर उन्होंने सलाह मान ली. उन पर इसका वाकई असर हुआ. अब वह घर में शांत रहते थे. उनकी शादी टूटने से बच गई.

इस कथा में सिर्फ एक कमी है. क्रोध की एकांत में अभिव्यक्ति की व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता. चिकित्सा विज्ञान जिस नतीजे पर पहुँचा था, समाज को जानकारी नहीं थी. उस समाज के लिए यह एकदम नई बात थी. समझ में नहीं आई. नतीजा यह हुआ कि ब्राउन जेल पहुँच गए. लोगों ने कुछ दिन तक देखा. एक आदमी पेड़ों को रोज गालियाँ बकता है. मुट्ठियाँ तनी रहती हैं. तर्जनी पेड़ की ओर होती है. वह पेड़ के चारों ओर घूम-घूमकर चीखता है. पेड़ों को कोई फर्क नहीं पड़ा. पेड़ सोख्ता हैं. सब कुछ सोख लेते हैं. प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते. पर लोग पेड़ नहीं हैं. पेड़ों ने कुछ नहीं कहा, लोगों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. पुलिस ने घटना की वीडियो फ़िल्म बनाई. ब्राउन को समझाने की कोशिश की. ब्राउन अपनी शादी बचाने पर तुले हुए थे. नहीं माने. अंततः पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. यह बात पुलिस के गले नहीं उतरी कि एकांत में अपना ग़ुस्सा निकालना ब्राउन के लिए जरूरी था.

 मुखर होना सफलता की अनिवार्य शर्त है और क्रोध को अपने अंदर रखना दुर्बलता की निशानी. क्रोध को सामूहिक रूप से सार्वजनिक करना राजनीति, धर्म और समाज के एक बड़े हिस्से का कारगर हथियार बन गया है. सब कुछ सार्वजनिक अभिव्यक्ति पर आकर टिक गया है
 

कोई अन्य समाज शायद इस पर दूसरे ढंग से प्रतिक्रिया ज़ाहिर करता. हो सकता है उसके मन में ब्राउन के प्रति सहानुभूति होती. वह इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला न मानता. राजतरंगिणी की चौथी से 18वीं तरंग तक इस बात का विस्तार से ज़िक्र है कि अपना क्रोध सार्वजनिक न करने वालों की समस्या कैसे हल की जाए. कल्हण छिपे क्रोध को ‘गुप्त हथियार’ मानते हैं. कश्मीर में राजा विजय सिंह ने ऐसे लोगों से निपटने के लिए मंत्रियों को विशेष निर्देश दे रखे थे. मंत्रिमंडल में एक मंत्री का विभाग ही यही था. पता लगाएँ कि कौन नाराज़ है. उसकी नाराज़गी दूर करें. उनके साम्राज्य में एक जगह तय थी, जहाँ जाकर बैठने वाले को ‘शिकायती’ समझा जाता था. भूख हड़ताल और मौन विरोध उस समय आम था. उन पर बौद्ध दर्शन का ख़ासा असर था.

तात्कालिकता आधुनिक समाज की सबसे बड़ी देन है. वह हर काम फ़ौरन चाहता है. सार्वजनिक मुखर अभिव्यक्ति इसका एक प्रमुख साधन है. सार्वजनिक अभिव्यक्ति में तात्कालिक लाभ दिखता है. वही समाज या व्यक्ति के लिए काफ़ी होता है. मुखर होना सफलता की अनिवार्य शर्त है और क्रोध को अपने अंदर रखना दुर्बलता की निशानी. क्रोध को सामूहिक रूप से सार्वजनिक करना राजनीति, धर्म और समाज के एक बड़े हिस्से का कारगर हथियार बन गया है. सब कुछ सार्वजनिक अभिव्यक्ति पर आकर टिक गया है. अपने पूर्ववर्ती समाज की यह बात उसे याद नहीं आती कि भावनाओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के परिणाम दूरगामी नहीं होते.

आर्थिक और नैतिक दुनिया बहुत बदल गई है. इसमें पुराने मूल्यों को नए नज़रिए से देखा जाता है. उसके अर्थ निकाले जाते हैं. वैश्वीकरण ने विचारों की यात्रा आसान बना दी है. वे तेज़ी से चलते हैं और पलक झपकते ही कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं. बदलाव की प्रक्रिया में इस बात पर नज़र ही नहीं जाती कि सार्वजनीनता की एक सीमा है, जो हर समाज अपने हिसाब से बनाता है. तय करता है. यह ख्याल नहीं रहता कि आयातित विचार की कामयाबी की कोई गांरटी नहीं होती. समाज, राजनीति या व्यक्तिगत संबंध कही भी नहीं. जिन समाजों ने प्रेम और क्रोध को सार्वजनिक होने से बचाया था, नए नज़रिए के तहत वे उसे खुद तोड़ने पर आमादा दिखाई देते हैं. वे अपनी उम्र और अपना समय देखते हैं. यह नहीं देखते कि उनकी उम्र में समाज और सभ्यता की उम्र जोड़ी जानी चाहिए.

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खिलो कुरिंजी
लेखक - मधुकर उपाध्याय
पृष्ठ -124, मूल्य - 150
वाणी प्रकाशन, दिल्ली

 
 
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