http://www.bbcchindi.com

महबूब ख़ान
बीबीसी संवाददाता, लंदन

जासूस राजकुमारी-नूर इनायत ख़ान

भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य से लोहा लेने वाले हैदर अली और टीपू सुल्तान के ख़ानदान की एक महिला ने बहादुरी के लिए ब्रिटेन में सम्मान हासिल किया.

कौन थी यह महिला? इस महिला का नाम था नूर इनायत ख़ान जो टीपू सुल्तान की वशंज थीं.

ब्रितानी साम्राज्य की विरोधी होने के बावजूद नूर इनायत ख़ान ने ब्रिटेन के लिए जासूसी भी की और एक नई मिसाल क़ायम की लेकिन क्या उन्हें इतिहास में वो मुक़ाम हासिल है जिसकी वो हक़दार थीं.

ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब लंदन में रहने वाली भारतीय मूल की एक पत्रकार श्राबणी बासु ने अपनी किताब स्पाई प्रिंसेस यानी जासूस राजकुमारी- नूर इनायत ख़ान के ज़रिए तलाश करने की कोशिश की है.

दिलचस्प सवाल ये है कि सूफ़ी संगीत प्रेमी और बेहद ख़ूबसूरत महिला नूर इनायत ख़ान दूसरे विश्व युद्ध के समय में जासूस कैसे बन गईं.

वह बच्चों के लिए किताबें लिखती थीं लेकिन जब फ्रांस पर नाज़ी जर्मनी ने हमला किया तो उनके दिमाग़ में उसके ख़िलाफ़ वैचारिक उबाल आ गया और वह ब्रिटेन की जासूस बनकर फ्रांस में गईं.

वहाँ रहते हुए उन्होंने वो काम करके दिखाया कि उनकी बहादुरी के लिए नूर इनायत ख़ान को जॉर्ज क्रॉस सम्मान दिया गया लेकिन ऐसे भूले बिसरे व्यक्तित्व के बारे में किताब लिखने का विचार कैसे आया?

किताब की लेखिका श्राबणी बासु नूर इनायत ख़ान के व्यक्तित्व के बारे में बताती हैं, "मैंने ब्रिटेन में भारतीयों के योगदान के बारे में कही एक लेख पढ़ा था जिसमें नूर इनायत ख़ान का नाम भी था. "

"नूर इनायत ख़ान के बारे में लिखा गया था कि ब्रितानी जासूस थीं लेकिन उनके बारे में बहुत थोड़ी सी जानकारी थी. अलबत्ता उनकी एक तस्वीर छपी थी जिसमें वह बहूत ख़ूबसूरत नज़र आ रही थीं. बस तभी से मेरी रुचि जागी कि उनके बारे में कुछ किया जाए."

पृष्ठभूमि

नूर इनायत ख़ान की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक और बेहद दिलचस्प रही है. वह हज़रत इनायत ख़ान की बेटी थीं. हज़रत इनायत ख़ान वही शख़्स थे जिन्होंने भारत के सूफ़ीवाद को पश्चिमी देशों तक पहुँचाया.

उनका परिवार पश्चिमी देशों में ही रहने लगा था. वही रुचि नूर इनायत ख़ान के भीतर भी थी और बच्चों के लिए कहानियाँ लिखते हुए जातक कथाओं पर उनकी एक किताब भी छपी थी. नूर संगीतकार भी थीं और वीणा बजाने का उन्हें शौक था.

श्राबणी बासु बताती हैं कि वह बहुत ही सीधी-साधी महिला थीं लेकिन तस्वीर में देखा तो उनके हाथ में पिस्तौल था. दिलचस्पी जागी कि यह महिला जासूस कैसे बन गई और वो भी दूसरे विश्व युद्ध के दिनों में.

श्राबणी के अनुसार बताती हैं कि नूर इनायत ख़ान ने आख़िरी साँस तक बहादुरी दिखाई और उन्हें पकड़ने की कोशिश करने वाले जर्मन अधिकारियों से उन्होंने जमकर लोहा लिया मगर आख़िरकार पकड़ी गईं.

वह सचमुच एक शेरनी थीं जिन्होंने आख़िरी दम तक अपना राज़ नहीं खोला और जब उन्हें गोली मारी गई तो उनके होटों पर शब्द था - फ्रीडम यानी आज़ादी.

बहादुरी और सम्मान

इतनी बहादुर महिला का अंत इतना दुखदाई क्यों हुआ. शायद उनकी बहादुरी की वजह से ही उन्हें बेहद ख़तरनाक महिला घोषित कर दिया गया था.

श्राबणी बासु बताती हैं उन्हें बहुत प्रताड़ित किया गया, जेल में बंद करके ज़जीरों में बांधा गया और बहुत प्रताड़ित किए जाने के बाद भी नूर ने कोई राज़ ज़ाहिर नहीं किया. यह दिखाता है कि नूर इनायत ख़ान वास्तव में एक मज़बूत और बहादुर महिला थीं.

1944 में उन्हें जर्मनी में तीन अन्य साथियों के साथ जर्मनी के डकाऊ प्रताड़ना कैंप में ले जाया गया जहाँ उन्हें 12 सितंबर को गोली मार दी गई. उस समय नूर की उम्र सिर्फ़ 30 साल थी.

इस उम्र में इतनी बहादुरी कि जर्मन सैनिक तमाम कोशिशों के बावजूद उनसे कुछ भी नहीं जान पाए, यहाँ तक कि उनका असली नाम तक भी नहीं.

इतने असाधारण हौसले वाली महिला नूर इनायत ख़ान को क्या इतिहास में वो दर्जा मिल पाया जिनकी वह हक़दार हैं.

श्राबणी बासु कहती हैं, "हाँ कुछ सम्मान तो मिला है. ब्रिटेन ने उन्हें जॉर्ज क्रॉस सम्मान दिया जो सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. और फ्रांस ने भी उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान - क्रोक्स डी गेयर से नवाज़ा."

लेकिन श्राबणी बासु कहती हैं कि नूर इनायत ख़ान को दुनिया से गए हुए साठ साल गुज़र चुके हैं लेकिन अफ़सोस ये है कि उन्हें कोई जानता नहीं. उन्होंने ब्रिटेन के लिए इतनी बड़ी क़ुर्बानी दी मगर आम जीवन में उनकी स्मृति नज़र नहीं आती.

बासु का कहना है कि ब्रिटेन को भारतीयों का जो योगदान रहा है, ख़ासतौर से दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, उसे इतिहास में और प्रमुखता मिलनी चाहिए और उनमें नूर इनायत ख़ान जैसे कितने व्यक्तित्व सामने आएंगे.