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गुरुवार, 25 मई, 2006 को 22:59 GMT तक के समाचार
 
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कश्मीर के हल का दूसरा और तीसरा अवसर
 
कश्मीर विरासत और सियासत
दूसरा सुनहरा अवसर 1964 में मिला. लंबे जेल प्रवास से बाहर आए शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला की प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से लंबी बातचीत हुई.

शेख़ ने अपनी आत्मकथा में पंडित नेहरू से इस महत्वपूर्ण मुलाक़ात का विस्तार से वर्णन किया है ‘‘श्रीनगर में कुछ दिन बिताने के बाद हम (मैं और बेग साहब) दिल्ली गए. जवाहरलाल ने हमें आमंत्रित किया था. पालम हवाई अड्डे पर श्रीमती इंदिरा गाँधी हमें लेने आई थीं. उनके साथ कुछ और भी लोग थे. वहाँ से हम सीधे तीनमूर्ति भवन ले जाए गए, जहाँ पंडित जी हमसे प्यार से मिले. 11 साल बाद मेरी उनसे मुलाक़ात हो रही थी. उनमें काफी बदलाव था. भुवनेश्वर में पिछले दिनों उन्हें हृद्याघात हुआ था, उनकी सेहत पर उसका काफी असर दिखाई पड़ा. बरामदे में हमने कुछ समूह फोटोग्राफ खिंचाए और फिर कमरे में आकर बैठे. अतीत के घटनाक्रम पर पंडित जी ने गहरा दुःख व्यक्त किया. मैंने भावुक होकर कहा ‘‘यह अच्छी बात है कि अब मैंने आपको यकीन दिला दिया कि आपके और भारत दोनों के प्रति मैं वफ़ादार हूँ. देखिए भारत अनेक समस्याओं से जूझ रहा है. अगर यह हमारे आपके जीवनकाल में ही नहीं सुलझाई गई तो ज़्यादा जटिल हो जाएँगी. इसलिए अपने जीवन के शेष जीवन और समय का उपयोग हमें इन मसलों को सुलझाने में करना चाहिए. मैंने उनका ध्यान कश्मीर मसले की तरफ आकृष्ट किया और पड़ोसी देशों खासकर पाकिस्तान से संबंध सुधारने की बात की. वे सहमत थे. उन्होंने मुझे पाकिस्तान जाकर राष्ट्रपति अयूब खां से बातचीत करने के लिए कहा. उनका सुझाव था कि मैं दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की शिखर वार्ता के लिए प्रारंभिक दौर की बातचीत करने तत्काल पाकिस्तान जाऊँ. इसके लिए मैं तैयार हो गया.’’

पंडित नेहरू इस द्विपक्षीय (या त्रिपक्षीय वार्ता) के लिए बेहद गंभीर थे. उन्होंने शेख़ से यह भी कहा कि स्वास्थ्य ठीक रहता तो वह स्वयं पाकिस्तान जाकर बातचीत करते. लेकिन अब अयूब खां को दिल्ली आने के लिए तैयार करना होगा. शेख़़ के पाकिस्तान दौरे का यह प्रमुख एजेंडा था. उन्हें पाकिस्तानी राष्ट्रपति को भारत आकर बातचीत के लिए राज़ी करना था. पाकिस्तान जाने से पहले शेख़़ अब्दुल्ला और पंडित नेहरू की कई बार बातचीत हुई. भारत और पाकिस्तान के समाचार पत्रों में इसे लेकर बहुत सारी खबरें छपीं. राष्ट्रपति अयूब खां उन्हीं खबरों के मद्देनजर पंडित नेहरू और शेख़ के नाम तार संदेश भी भेजे. इनमें कहा गया खा कि पाकिस्तान को अलग रखकर कश्मीर पर होने वाली बातचीत (नेहरू-शेख़ बातचीत) के फैसले उन्हें (अयूब खां को) स्वीकार्य नहीं होंगे.

अयूब खां के इस तार संदेश ने शेख़ की पाकिस्तान यात्रा को और ज़रूरी बना दिया. इस बीच पंडित नेहरू 15 मई को अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी के अधिवेशन में शामिल होने बंबई गए. वहाँ से वह थके हुए लौटे. लेकिन स्वास्थ्य संबंधी अपनी परेशानियों और अन्य व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने कश्मीर एवं भारत पाक रिश्तों को लेकर शेख़ से फिर लंबी बातचीत की.

 शेख़ अब्दुल्ला ने अपनी और कश्मीरी जनता की ओर से फील्ड मार्शल अयूब खां को एक बड़ा ‘संतूर’ उपहार के तौर पर भेंट किया. बड़ा ही प्रतीकात्मक था यह उपहार. शायद यह दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर बनाने की ईमानदार शुरुआत थी. दोनों नेताओं ने कश्मीर मसले पर देर तक बातचीत की. शेख़ ने भारत और पाकिस्तान के बीच शिखर वार्ता का प्रस्ताव रखा.
 

इसके बाद शेख़ अब्दुल्ला अपने कुछ सहकर्मियों और पत्रकारों की टीम के साथ रावलपिंडी के लिए रवाना हुए. टीम में नेशनल कॉन्फ्रेंस और रायशुमारी मोर्चा के प्रमुख नेता मिर्ज़ा मोहम्मद अफ़जल बेग, ख्वाज़ा मुबारक़ शाह, मोलवी मोहम्मद सईद मसूदी और फारूख अब्दुल्ला सहित कई लोग शामिल थे. रावलपिंडी हवाई अड्डे पर कश्मीरी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत करने ज़ुल्फिकार अली भुट्टो और अन्य पाकिस्तानी उच्चाधिकारी आए थे.

श्री भुट्टो उन दिनों पाकिस्तान के विदेशमंत्री और राष्ट्रपति अयूब खां के विश्वासपात्र थे. उसी दिन शाम को शेख़ और उनके साथियों की राष्ट्रपति अयूब खां से मुलाक़ात कराई गई. शेख़ अब्दुल्ला ने अपनी और कश्मीरी जनता की ओर से फील्ड मार्शल अयूब खां को एक बड़ा ‘संतूर’ उपहार के तौर पर भेंट किया. बड़ा ही प्रतीकात्मक था यह उपहार. शायद यह दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर बनाने की ईमानदार शुरुआत थी. दोनों नेताओं ने कश्मीर मसले पर देर तक बातचीत की. शेख़ ने भारत और पाकिस्तान के बीच शिखर वार्ता का प्रस्ताव रखा.

 शिखर वार्ता का रास्ता साफ़ हो गया था. पाकिस्तान में शेख़ अब्दुल्ला विभिन्न शहरों में अपने जानने वालों से मिल रहे थे. वहाँ उन्होंने मुस्लिम कॉन्फ्रेंस से दौर में अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी रहे मीरवाइज़ यूसुफ़ शाह से भी मुलाकात की. 27 मई को वह मुजफ्फ़राबाद गए. रास्ते में ही शेख़ को पंडित जवाहरलाल नेहरू के आकस्मिक निधन की खबर मिली.
 

पूरा विवरण स्वयं शेख़ के शब्दों में इस प्रकार है ‘‘राष्ट्रपति अयूब खां ने मुझे धैर्यपूर्वक सुना और स्वीकार किया कि उनके देश ने कश्मीर मसले पर अतीत में कुछ गलतियाँ की हैं. पर महासंघ (दोनों देशों का संयुक्त मंच या ढीला ढाला फेडरेशन) बनाने से कश्मीर समस्या का समाधान नहीं होगा.’’ इस पर मैंने कहा ‘‘मैंने महासंघ की बात कहाँ की है ? मैं तो बस ये चाहता हूँ कि आप और पंडित नेहरू एक साथ बैठें और महासंघ सहित उन सभी प्रस्तावों-सुझावों पर खुले मन से बातचीत करें, जो समस्या समाधान के लिए रखे जाते हैं. लेकिन अयूब खां मेरे सुझाव पर दिल्ली आने के लिए राज़ी हो गए. शिखर वार्ता का समय भी तय कर लिया गया. इसके तुरंत बाद मैंने दिल्ली को फोन करके बता दिया कि बातचीत की तिथि जून महीने में किसी दिन तय की जा रही है.’’

शिखर वार्ता का रास्ता साफ़ हो गया था. पाकिस्तान में शेख़ अब्दुल्ला विभिन्न शहरों में अपने जानने वालों से मिल रहे थे. वहाँ उन्होंने मुस्लिम कॉन्फ्रेंस से दौर में अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी रहे मीरवाइज़ यूसुफ़ शाह से भी मुलाकात की. 27 मई को वह मुजफ्फ़राबाद गए. रास्ते में ही शेख़ को पंडित जवाहरलाल नेहरू के आकस्मिक निधन की खबर मिली. रावलपिंडी लौटकर वह फिर अयूब खां से मिले. पंडित नेहरू के अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए उन्होंने अपने विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को दिल्ली भेजा. एक ही विमान में शेख़ अब्दुल्ला और भुट्टो दिल्ली पहुँचे. नेहरू के बाद भी कश्मीर मसले के समाधान और भारत-पाक रिश्तों में सुधार की बातें हुईं पर 27 मई 1964 को जिस महान संभावना का अंत हुआ था वह उस रूप में फिर कई सालों तक नहीं उभरी.

बीच में सन् 65 की लड़ाई और फिर ताशकंद समझौता हुआ. लेकिन कश्मीर के मसले पर कोई ठोस बातचीत नहीं हुई. इस दौरान शेख़ अब्दुल्ला का ज़्यादा वक़्त गिरफ्तारी या नजरबंदी में बीता. तीन साल वह दक्षिण भारत के मशहूर पर्यटन स्थल कोडइकनाल में नज़रबंद रहे. बाद में उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली के कोटला लेन स्थित एक बंगले में रखा गया. सन् 67 के आम चुनाव के बाद उन्हें रिहा किया गया. उस वर्ष कश्मीर में चुनाव हुआ. पर उसमें जमकर धांधली हुई. शेख़ ने उसे ‘‘फर्जी चुनाव’’ कहा.

कश्मीर विरासत और सियासत

शुरू के दिनों में श्रीमती इंदिरा गाँधी और शेख़ अब्दुल्ला के बीच ‘‘अच्छी बातचीत’’ हुई पर शेख़ जल्दी ही निराश हो गए. उन्हें लगा कि श्रीमती गाँधी के सलाहकार बीच में समस्या खड़ी कर रहे हैं. इस दौरान जम्मू कश्मीर की समस्या के राजनीतिक समाधान के बजाय भारतीय संघ के सूबे के एकीकरण को सुदृढ़ करने के ताबड़तोड़ प्रयास किए गए. घाटी की अवाम की भावना और सरोकारों को बिल्कुल तवज्जो नहीं दी गई. सन् 1953 में बख्शी ग़ुलाम मोहम्मद के समय दिल्ली में बैठे सलाहकारों और कश्मीरी राजनेताओं एवं कूटनीतिज्ञों की मजबूत लॉबी ने कश्मीर को भारतीय संघ का अविभाज्य अंग बनाने के लिए फार्मूले सुझाए, वे बाद की राजनीतिक प्रक्रिया का स्थायी अंग बन गए. इससे जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों को अपना प्रभाव विस्तार करने का मौका मिल गया.

कश्मीरी मुसलमान पहले जमात को ज़्यादा भाव नहीं देते थे लेकिन दिल्ली के अविवेकपूर्ण रवैये ने घाटी में जमात को भी जिंदा कर दिया. उसने ‘‘हिंदू सांस्कृतिक सोच’’ और ‘‘हिंदू संरचना वाले भारतीय राष्ट्र राज्य’’ की आलोचना की और कहा कि ‘‘दिल्ली कश्मीरियों पर इसे थोप रही है. जमात ने इस प्रक्रिया को कश्मीर और कश्मीरियत पर ‘‘ब्राह्मण साम्राज्यवाद’’ के हमले के तौर पर चिन्हित किया. शेख़ अब्दुल्ला पहले से ही ‘‘कश्मीर’’ और ‘‘कश्मीरियत’’ की बात करते थे. पर कश्मीरियत की उनकी धारणा पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना के ‘‘दो राष्ट्र के सिद्धांत’’ का विरोध करती थी. राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर एक समझौते के तहत उन्होंने भारती राष्ट्र राज्य के तहत कश्मीर को बृहत्तर स्वायत्ता देने की केंद्र से माँग की. वह शेख़ की जेनुइन और न्यायपूर्ण माँग थी पर केंद्र सरकार के सलाहकारों ने उसमें भी अलगाव के तंतु देखे.

तीसरा अवसर

तीसरा महत्वपूर्ण अवसर था 1975 से 80 के बीच. कश्मीर के आधुनिक इतिहास का इसे अपेक्षाकृत शांत और सहज दौर कहा जा सकता है. इंदिरा-शेख़ समझौते के तहत श्रीनगर में सत्ता बदल हुआ और शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला सूबे के मुख्यमंत्री बने. सन 9171 के युद्ध और ‘‘बांग्लादेश सृजन’’ से पाकिस्तान की राजनीतिक आर्थिक स्थिति में भी बदलाव आ चुका था. भारत मजबूत होकर उभरा था. यह कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान का सुनहरा अवसर था.

 भारत और पाकिस्तान की अनसुलझी गुत्थियों (कश्मीर इसमें सबसे प्रमुख है) के संदर्भ में एक बात आईने की तरह साफ़ है कि कश्मीर मसले पर जब कभी सार्थक बातचीत होगी सरहद के सवाल से दोनों सरकारों को रूबरू होना ही होगा. दोनों को साहस और लचीलापन दिखाना होगा. यह काम वही सरकारें कर सकती हैं, जिनकी अपने अपने देश की जनता में जड़ें गहरी हों
 

सन 1974 में कश्मीर पर उच्चस्तरीय वार्ता की हल्की सी पहल ज़रूर हुई. इस बार प्रयास भुट्टो की तरफ़ से हुआ. लेकिन वह बात आगे नहीं बढ़ सकी. भारत सरकार कश्मीर में अपने आंतरिक राजनीतिक मसलों को हल करने में व्यस्त थीं. इंदिरा-शेख़ समझौते के लिए माहौल बनाया जा रहा था. समझौता हो जाने के बाद शिमला में बनी समझदारी (कश्मीर को लेकर) ज़्यादा प्रासंगिक नहीं रह गई. शिमला की ‘‘अघोषित समझदारी’’ के मुताबिक नियंत्रण रेखा को अंतर्राष्ट्रीय सीमा-रेखा में तब्दील करने पर दोनों देशों के बीच सहमति बनाई जानी थी. पर कुछ ख़ास नहीं हो सका.

इधर कश्मीर में वर्षों से दबे हुए अलगाव के बीज अंकुरने लगे और लोगों में दिलों की भूमिगत आग दहकने लगी. सन 1988-89 आते आते कश्मीर घाटी में विद्रोह उग्रवाद और आतंकवाद की विषबेल तेज़ी से फैली.

भारत और पाकिस्तान की अनसुलझी गुत्थियों (कश्मीर इसमें सबसे प्रमुख है) के संदर्भ में एक बात आईने की तरह साफ़ है कि कश्मीर मसले पर जब कभी सार्थक बातचीत होगी सरहद के सवाल से दोनों सरकारों को रूबरू होना ही होगा. दोनों को साहस और लचीलापन दिखाना होगा. यह काम वही सरकारें कर सकती हैं, जिनकी अपने अपने देश की जनता में जड़ें गहरी हों.

नियंत्रण रेखा को अंतर्राष्ट्रीय सरहद मानने से कश्मीरियों का एक हिस्सा ज़रूर क्षुब्ध होगा लेकिन समस्या को सुलझाने का फिलहाल यह एक ठोस और शुरूआती क़दम है. कश्मीर में खुशहाली समाज और शासन के विभिन्न स्तरों का लोकतांत्रीकरण और सरहद की जटिलताओं पर संबद्ध पक्षों के बीच सम्मानजनक समझौते से ही समस्या का निर्णायक समाधान संभव होगा. इस प्रक्रिया को जल्दी शुरू किया जाना चाहिए.

परस्पर रिश्तों पर सैन्यवाद को हावी होने देना और समस्या को लगातार लटकाए रखना भारत और पाकिस्तान दोनों के हित में नहीं है. युद्ध और हिंसा प्रतिहिंसा से शांति और समृद्धि का नहीं, विनाश और बेहाली का ही रास्ता तैयार होगा.

 
 
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