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मंगलवार, 22 अगस्त, 2006 को 11:17 GMT तक के समाचार

आरिफ़ वक़ार
बीबीसी उर्दू सेवा

'ट्रेन टू पाकिस्तान' ने तय की आधी सदी

सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार खुशवंत सिंह के उपन्यास 'ट्रेन टू पाकिस्तान' को अब 50 वर्ष पूरे हो चुके हैं.

अगस्त 1956 में पहली बार प्रकाशित होने वाले इस उपन्यास के 50 वर्ष पूरे होने पर नया संस्करण प्रकाशित किया गया है.

इस नए संस्करण में भारत के विभाजन से संबंधित 60 ऐसी तस्वीरें भी शामिल हैं जो इससे पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुई थीं. ये तस्वीरें अमरीकी पत्रिका 'लाइफ़' की फ़ोटोग्राफ़र मार्ग्रेट व्हाइट ने ख़ीची थीं.

इस नए संस्करण में मूल कहानी के अलावा बहुत-सी और कहानियाँ भी हैं जो खुशवंत सिंह ने अपनी नई भूमिका में व्यक्त की हैं.

‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ में पंजाब के एक गांव ‘मनु माजरा’ का नक़्शा ख़ींचा गया है. यह कहानी वाला गाँव भारत-पाक सीमा के क़रीब ही स्थित है और यहाँ सदियों से मुसलमान और सिख मिल-जुल के जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

पर देश के विभाजन के साथ ही स्थितियाँ बदलती हैं और लोग एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाते हैं. यह सारा वृत्तांत एक प्रेम कहानी की पृष्ठभूमि में है.

नसीहत

इस विशेष संस्करण के लिए लेखक ने एक नई भूमिका भी लिखी है जिसमें वह कहते हैं, "हंसते-हंसते ख़ानदान विभाजित हो कर रह गए और पुराने दोस्त हमेशा के लिए बिछुड़ गए. अब हमें एक दूसरे से मिलने के लिए पासपोर्ट, वीज़ा और पुलिस थाने की रिपोर्ट की दरकार है."

वो कहते हैं, "1947 के विभाजन से अगर कोई सबक़ मिलता है तो सिर्फ़ इतना कि भविष्य में ऐसा कभी नहीं होना चाहिए और यह ख़्वाहिश इसी स्थिति में पूरी हो सकती है जब हम उपमहाद्वीप की विभिन्न नसलों और धर्मवासियों को एक दूसरे के क़रीब लाने की कोशिश करें."

खुशवंत सिंह ने इस उपन्यास में सिर्फ़ विभाजन की त्रासदी ही नहीं लिखी है बल्कि जिहालत और ग़रीबी का भी चित्रण किया है जो जनता की परेशानी की असल जड़ हैं.

इस उपन्यास में लेखक ने स्वतंत्रता, बराबरी और जनता के राज का नारा लगाने वाली पार्टियों और देहात में फैले हुए उनके कार्यकर्ताओं की भी पोल खोलने की कोशिश की है.