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शुक्रवार, 08 सितंबर, 2006 को 13:08 GMT तक के समाचार
 
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ताले और अक्षरों का तालमेल
 

 
 
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
फ़ैज की शायरी कुछ अन्य शायरों के गले नहीं उतरती थी
पानीपत की एक गुंजान बस्ती में सूफ़ी बूअलीशाह क़लंदर की दरगाह है. यह इलाक़ा पचरंगा अचार के लिए भी मशहूर है.

कई किस्मों की कई दुकानों से गुज़रकर जब मैं वहाँ पहुँचा तो मज़ार के इर्द-गिर्द ढेरों अलग-अलग शक्लों के बंद ताले देखकर हैरत हुई.

दरगाह के एक ख़ादिम ने बताया, "ये ताले उन अक़ीदतमंदों के हैं जो अपनी मुरादों को इनमें बंद करके जाते हैं और जब क़लंदर बाबा की इनायत से मुराद पूरी हो जाती है तो बंद ताले को खोलकर, फक़ीरों को खाना खिलाते हैं.

पानीपत वाले उन्हें 'ताले वाले बाबा' भी कहकर पुकारते हैं.

ताले के बारे में मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर भी है. उस ज़माने में ताले अक्षरों के हिसाब से बनाए जाते थे. कौन-सा अक्षर किस दूसरे अक्षर से मिलाकर ताला खुलेगा, यह राज़ सिर्फ़ तालेवाले के जेहन में ही पोशीदा होता है.

ग़ालिब के युग में इसे ‘कुफ्ले अब्जद’ कहा जाता था. कुफ्ल यानी ताला और अब्जद का मतलब होता है अरबी लिपि के 28 अक्षर.

गालिब का शेर यूँ है-

तुम से मिलना है मिरा सूरते कुफ्ले अब्जद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना

मिर्ज़ा ने ताले के खुलने को जुदा होने के अर्थ में इस्तेमाल किया है लेकिन इस दरगाह में ताला उस वक़्त ही खुलता है जब मुरादवाले और मुराद में मिलाप होता है.

इस दरगाह के फाटक के बाईं ओर एक कब्र है. इसके सिरहाने उर्दू लिपि में लिखा है- मौलाना अल्ताफ़ हुसैन 'हाली'. हाली बूढ़े ग़ालिब के जवान शायर थे और उन्हीं के शार्गिद भी. यूँ तो मिर्ज़ा के कई शागिर्द थे जिनमें अंग्रेज, हिंदू, मुसलमान जैसे कई शुमार थे, लेकिन हाली का नाम इसलिए ज़्यादा मशहूर है क्योंकि वो शायर होने के साथ ही साहित्य के आलोचक भी थे.

ग़ालिब की अज़मत की पहली पहचान उन्हीं की आलोचना की देन है. उनकी किताब ‘यादगारे ग़ालिब’ ने जिस तरह ग़ालिब के फ़न की बुलन्दियों का परिचय दिया उसने इस पुस्तक को क्लासिकल महानता प्रदान की है.

हाली बड़ी पहलूदा शख़्सियत थे. उन्होंने सिर्फ़ आलोचना ही नहीं लिखी बल्कि अपनी शायरी के ज़रिए उन राहों की भी तलाश की जिनके बाद के मुसाफ़िरों में इकबाल, फ़ैज़ एहमद फ़ैज़ और जोश मलीहाबादी जैसे बड़े शायर शामिल हैं.

इन्हीं हाली पानीपती ने अपने युग में ग़ालिब के बाद की अदबी लिहाज से मरती हुई दिल्ली का एक मर्सिया(शोकगीत) भी लिखा था.

तज़किरा देहलि-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा, तुझसे ये फ़साना हरगिज़

इसी दर्द भरे मर्सिए में एक और शेर है-

दाग़ो-मजरूह को सुन लो कि फिर इस गुलशन में
न सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़

जिस दौर में यह मर्सिया लिखा गया था, यह उस दिल्ली की बात है जो अंग़्रेजों की चढ़ाई और आज़ादी की लड़ाई के रहनुमा आखिरी मुग़ल बादशाह की बेदस्तोपाई पर आँसू बहा रही थी और उदासी को बहलाने के लिए नवाब मिर्ज़ा दाग़ और मीर मेहदी मजरूह की गज़लें गुनगुना रही थी.

इन दोनों का तअल्लुक ग़ालिब से था. दाग़ अपने वालिद नवाब शम्सुद्दीन के वास्ते से मिर्ज़ा के क़रीबी रिश्तेदारों में थे, वो ग़ालिब के शतरंज के भी साथी थे.

दाग़ की शायरी हुस्न की परस्तारी और दिल की गिरफ़्तारी की फलंगरी लिए हुए है. सीधे-सीधे शब्दों में जवान शोख़ियों का बयान उनकी पहचान है.

दिल गया, तुमने लिया, हम क्या करें
जाने वाली चीज़ का ग़म क्या करें?

मजरुह भी आशिक़ाना शायर थे मगर उनका अंदाज़े बयां दाग़ से थोड़ा अलग था. वह ग़ालिब के उन चंद शागिर्दों में थे जिनके नाम ग़ालिब के कई खत हैं.

इनका भी एक शेर पेश है-

ग़ैरों को भला समझे और मुझको बुरा जाना
समझे भी तो क्या समझे, जाना भी तो क्या जाना?

मौलाना हाली के दौर में बुलबुल का तराना दाग़ और मजरूह से मंसूब था. हमारे क़रीब के माज़ी में यह तराना अगर किसी एक से हमरिश्ता किया जा सकता है तो वह नाम सिर्फ़ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का होगा.

फ़ैज़ को वर्तमान से अतीत बने वक़्त का एक बड़ा हिस्सा गुज़र चुका है. इस दौरान केवल आलमी रियासत ही तब्दील नहीं हुई है बल्कि इंसान की सोच भी काफ़ी तब्दील हो चुकी है.

कोई 2600 बरस पहले महात्मा बुद्ध ने कहा था कि तब्दीली एक बड़ी हक़ीक़त है लेकिन इससे बड़ी एक हक़ीकत है और वह यह है कि तब्दीली भी तब्दील होती है.

वक़्त के साथ बुलबुले भी बदलती हैं और उनके तराने भी. लेकिन इस बनने-बिगड़ने के बावजूद फ़ैज़ के कलाम और उसके एहतिराम में कोई कमी नहीं आई.

अपनी ज़िंदगी में जैसे वह पढ़े और सुने जाते थे आज भी उसी तरह दोहराए जाते है, सुनाए जाते हैं और गाए जाते हैं.

उनकी शायरी के इस चमत्कार का राज़ क्या है, इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें भारत के इतिहास में 600 बरस पहले जाना होगा.

वहाँ आज के उत्तरप्रदेश के मगहर के गांव में एक जुलाहे के झोपड़ीनुमा घर में चर्खे को चलाता एक ऐसा बुनकर मिलेगा जो एक ख़ुदा को कई नामों से गाता हुआ नज़र आएगा.

कभी वह उसे राम के नाम से गाता है, कभी ख़ुदा बोलकर उसे बुलाता है. जब उससे शब्दों की शक्ति का भेद पूछोगे तो वह अपनी बानी में बताएगा.

करनी बिन कथनी कहे
अज्ञानी की जात
ज्यों कूकर भूकत फिरे,
सुनी-सुनाई बात

कबीर के अनुभव के चार अक्षर जबतक नहीं जुड़ते हैं तब तक कला का ताला नहीं खुलता है.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने वही लिखा जो उनका अनुभव था. इस अनुभव की रौशनी ने न उनकी आवाज़ को नारा बनाया और न ही उन्होंने अपने दृष्टिकोण का शोर मचाया था. उन्होंने समाज के ग़मो-खुशी को पहले अपना बनाया और फिर उन्हें दूसरों को सुनाया.

मुंबई की एक महफ़िल में फ़ैज़ शरीक थे. फ़ैज़ के लिए सजाई गई उस महफ़िल में अमिताभ बच्चन, रामानंद सागर और दूसरी फ़िल्मी हस्तियों के साथ, सरदार जाफ़री, जज़्बी, जांनिसार अख़्तर, मजरूह सुल्तानपुरी वगैरह शरीक थे.

ये सब फ़ैज़ की शोहरत, अजमत और शेरी-ज़हानत (काव्यदृष्टि) के कॉम्पलेक्स से पीड़ित थे. सब अलग-अलग टुकड़ियों में बँटे फ़ैज़ को चर्चा का विषय बनाए हुए थे.

कोई कह रहा था कि फ़ैज़ ग़लत ज़ुबान लिखते हैं तो कोई बोल रहा था कि उन्हें यासर अराफ़ात की पत्रिका 'लोटस' ने शोहरत दी है.

फ़ैज़ इन सब बातों को दूर-दूर से सुन रहे थे और जाम पर जाम चढ़ा रहे थे और सिगरेट पर सिगरेट सुलगा रहे थे.

जब पढ़ने के लिए बुलाया गया तो उन्होंने फ़रमाया कि भाई दुकानें तो सबने एक साथ लगाई थीं. अब इसको क्या कहा जाए. कोई चल गई तो यह उसकी देन है जिसे परवरदिगार दे.

 
 
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