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शुक्रवार, 22 सितंबर, 2006 को 09:51 GMT तक के समाचार
 
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धर्मनिरपेक्ष धर्म
 
धर्मनिपरेक्ष धर्म
धर्मनिरपेक्षता के मायने अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग तरीके से समझाए-बताए हैं पर इसका एक मतलब तो साफ़ है कि सभी धर्मों को ख़ारिज करना धर्म निरपेक्षता नहीं है बल्कि धर्मों, संप्रदायों के बीच का सामंजस्य इसकी धुरी हो सकती है.

भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति में इसके अलग-अलग समय पर कई विशिष्ट उदाहरण सामने आते रहे हैं. इन्हीं में से एक है सिख राजाओं में से एक राजा रणजीत सिंह का धर्मनिरपेक्षवाद, जिसकी चर्चा अपनी पुस्तक 'धर्मनिपरेक्ष धर्म' में कर्तार सिंह दुग्गल ने की है.

इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद चर्चित कहानीकार कुलवंत कोछड़ ने किया है.

पढ़िए, इस पुस्तक का एक अंश-

महाराजा रणजीत सिंह का धर्मनिरपेक्षवाद

धर्मनिरपेक्षवाद को परिभाषित करना जटिल काम है. धर्मनिरपेक्षता का संबंध सांसारिक वस्तुओं से नहीं है. न ही उन चीजों से जिन्हें धार्मिक अथवा पवित्र माना जाता है. इसका अर्थ है तर्क और आस्था का संगम. किसी राज्य के लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है धार्मिक तटस्थता, जो अपने फैसले जाति, धर्म या रंग-रूप की भावना से परे रह कर, अच्छे-बुरे के आधार पर करता है.

परिभाषा के इस सिद्धांत के अनुसार महाराजा रणजीत सिंह का शासन काल सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष था. मुगलों के ध्वस्त साम्राज्य पर निर्मित महाराजा रणजीत सिंह का साम्राज्य तिब्बत से लेकर सिंध और काबुल से लेकर सतलुज तक फैला हुआ था. ऐसा माना जाता है कि जिन क्षेत्रों पर उसने हुकूमत की थी उनमें से 80 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की थी, 10 प्रतिशत हिंदुओं की और शेष 10 प्रतिशत उसके सहधर्मी थे.

वह एक श्रद्धावान सिख था. हर रोज प्रातः जल्दी उठकर वह स्नान कर के अरदास(प्रार्थना) किया करता था. ग्रंथ साहेब के सामने माथा टेकता था. उसका गुरु ग्रंथ साहेब में इतना दृढ़ विश्वास था कि वह किसी भी अभियान अथवा परियोजना, यहाँ तक कि छोटे से छोटे काम के पहले भी गुरु ग्रंथ साहेब से ‘वाक’ द्वारा मार्गदर्शन माँगता था.

कहा जाता है कि वह युद्ध के मैदान पर भी पूरे आदर-सम्मान सहित गुरु ग्रंथ को एक अलग हाथी पर साथ लेकर जाता था. एक बार गुरसिख होने के नाते उससे एक चूक हो गई. उसने स्वयं को अकाल तख्त के समक्ष प्रस्तुत किया, जो कि सिख समाज की सर्वोच्च धार्मिक संस्था है, और प्रायश्चितस्वरूप अपने लिए सज़ा की माँग की. महाराज ने अकाली फूला सिंह से कोड़ों की सज़ा भुगतने के लिए अपनी नंगी पीठ हाजिर कर दी.

उसने कभी किसी धर्म के ख़िलाफ़ भेदभाव नहीं किया. एक बार अपने विदेश मंत्री फकीर अजीज़ुद्दीन से उसने कहा,‘‘ईश्वर चाहता था कि मैं सभी धर्मों को एक नज़र से देखूँ इसीलिए उसने मुझे दूसरी आँख नहीं दी.’’

ननिहाल में 1780 में जन्म लिया तो उसका नाम रखा गया बुध सिंह अर्थात् विद्वान. उसके पिता को जब इसका समाचार दिया गया तो उन्होंने बालक का नाम रखा रणजीत सिंह. रणजीत सिंह के पिता महा सिंह सकरचकया उसके जन्म के समय पड़ोसी रियासत के मुखिया के साथ एक झड़प में उलझे हुए थे. रणजीत सिंह ने अनेक युद्ध जीते, परंतु वह जीवन भर निरक्षर ही रहा.

अपनी रियासत का वास्तविक मालिक वह 17 वर्ष पूरे करने के बाद ही बन सका. उसने अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए कनई की रानी महताब कौर (जिसके पिता रणजीत सिंह के पिता के हाथों मारे गए थे) तथा नकई सरदार की बहन राज कौर के साथ विवाह रचाए. प्रत्यक्ष कारणवश उसने अपनी सास सदा कौर के साथ एक विचित्र प्रकार का घृणा-प्रेम का संबंध स्थापित किया था. इसके कारण आने वाले वर्षों उसके कुछ साहसिक कारनामों में बाधा भी पड़ी और सहायता भी मिली. यह आश्चर्य की बात है कि उस छोटी आयु में भी उसने पंजाब के सिख सरदारों को संगठित करने की महत्वपूर्ण मुहिम आरंभ की, जो 12 रजवाड़ों में बंट चुके थे, जिन्हें ‘मिसल’ कहा जाता था.

सरबत खालसा

सौभाग्यवश एक अवसर महाराजा के हाथ तब लगा जब पंजाब के ऊपर शाह जमान ने अपनी गिद्ध दृष्टि डाली. रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिखों की एक बैठक अकाल तख्त में हुई. इसे ‘सरबत खालसा’ कहा गया. अमृतसर की पवित्र धरती पर लिए गए इस फैसले पर धार्मिक सहमति थी. बहुत सारे सरदार पहले ही की तरह पहाड़ियों में जाकर छुप जाना चाहते थे, परंतु रणजीत सिंह अडिग रहा. अंततः तय पाया गया कि रणजीत सिंह के नेतृत्व में आक्रमणकारी से लोहा लिया जाएगा. रणजीत सिंह के प्रेरणास्पद नेतृत्व में न केवल सिखों ने शाह जमान को दुम दबाकर लौटने पर मजबूर कर दिया अपितु एक अंतराल के पश्चात रणजीत सिंह ने लाहौर दुर्ग के मुसुम्म बुर्ज पर चढ़कर हमलावर को, जो उस समय दरबार सजाकर बैठा था, ललकारा,‘‘ओ अबदाल की औलाद, निकल बाहर और आजमा ले अपनी तलवार का ज़ोर, चढ़त सिंह की औलाद के साथ.’’

कहते हैं कि अफ़ग़ानी सिपाही सिखों को देखकर बुरी तरह भयभीत हो गए. वे अपनी बैरकों से रात में बाहर निकलने को तैयार नहीं हुए. उस लड़ाई में इन पंजाबी मुसलमानों को ही सबसे अधिक क्षति पहुँची जिन्होंने सोचा था कि उनके सहधर्मी उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाएंगे. रणजीत सिंह ने सिंधु नदी तक पीछा करते हुए शाह जमान को खदेड़ा और इसकी सेनाओं को भारी क्षति पहुँचाई और इस प्रकार उसने इस किंवदंती को भी सदा के लिए झुठला दिया कि जहाँ से अफ़ग़ान घोड़े गुजर जाएँ, वहाँ घास कभी नहीं उगती.

अफ़ग़ानों के लौट जाने के बाद लाहौर पर तीन सरदारों ने कब्ज़ा कर लिया. उनमें से चेत सिंह सबसे उतावला था. शराब और व्यसनों में लिप्त होकर उन्होंने नगर पर कुशासन चलाया. हिंदू और मुसलमान जनता उनसे तंग आ चुकी थी. उन्होंने रणजीत सिंह को संदेश भिजवाया कि आकर शासन की बागडोर संभाले. रणजीत सिंह ने जब यह सुना तो सच्चाई का पता लगाने उसने अपने विश्वासपात्र अब्दुल रहमान को लाहौर भेजा. पुष्टि हो जाने पर, रणजीत सिंह अपने 25000 सैनिकों को लेकर आ पहुँचा और लाहौर पर अधिकार कर लिया. उसने बिना किसी रक्त-पात के पंजाब के सबसे बड़े शहर लाहौर पर कब्ज़ा किया था. शहर पर अधिकार कर लेने के बाद सबसे पहला काम जो रणजीत सिंह ने किया, वह था बादशाही मस्जिद जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करना.

रणजीत सिंह ने तुरंत शहर के प्रशासन और जनता के कल्याण पर ध्यान दिया. किसी को भी अन्याय अथवा दमन करने की अनुमति नहीं थी. स्वयं महाराजा द्वारा भी कोई अनुचित आदेश जारी कर दिया गया हो तो उस पर पुनर्विचार के लिए महाराजा से अनुरोध किया जा सकता था. न्यायाधीशों को शास्त्रों और कुरान के अनुसार फ़ैसला करने का आदेश दिया गया था. निज़ामुद्दीन को मुख्य काज़ी नियुक्त किया गया. मोहम्मद शापुरी और सैदुल्लाह उसके मुफ्ती नियुक्त किए गए. पूरे शहर में नूरूद्दीन के अधीन दवाखानों का जाल बिछा दिया गया. नूरूद्दीन मुख्य आयुर्वेद अधिकारी थे. इमाम बख्श को लाहौर का कोतवाल नियुक्त किया गया.

 महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी सेना में अनेक ऊँचे ओहदों पर हिंदू और मुसलमान नियुक्त किए. उसकी सेना में 40 से अधिक मुसलमान ऊँचे ओहदों पर नियुक्त थे, जिनमें से कम से कम दो जनरल थे
 

महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी सेना में अनेक ऊँचे ओहदों पर हिंदू और मुसलमान नियुक्त किए. उसकी सेना में 40 से अधिक मुसलमान ऊँचे ओहदों पर नियुक्त थे, जिनमें से कम से कम दो जनरल थे. रणजीत सिंह ने लाहौर के इर्द-गिर्द फैले राज्यों पर कब्ज़ा करने के बाद मुलतान पर आक्रमण करने के लिए मिश्र दीवान चंद को अपने 20,000 सैनिकों के साथ भेजा. इसमें उसकी सहायता के लिए एक जाने-माने मुस्लिम जनरल इलाही बख्श को मनोनीत किया. यह एक ज़बरदस्त जंग थी. मुलतान के नवाब मुजफ़्फर ख़ान ने अंत तक संघर्ष किया परंतु अंततः जीत रणजीत सिंह की सेना की हुई. इस जीत से बहावलपुर, डेरा गाज़ी ख़ान, डेरा इस्माइल ख़ान तथा मनकेरा आदि अन्य मुस्लिम रियासतों को जीतने में भी मदद मिली. मुलतान फतह करने के फौरन बाद महाराजा मियां गौस द्वारा निर्मित शाह अब्दुल माली की दरगाह पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने गए. गौस रणजीत सिंह के कमांडरों में से एक था जो लड़ते हुए मारा गया था.

उसके बाद तो एक के बाद एक जीत का सिलसिला ही शुरु हो गया, जिनमें जम्मू, श्रीनगर और काबुल शामिल हैं. महाराजा के यहाँ यह परंपरा थी कि जिन राजाओं को वह पराजित करता था उन्हें जागीर देकर उनके साथ स्थाई मित्रता गाँठ लेता था. वह मुस्लिम शासकों के प्रति विशेष रूप से नरम रहता था.

महाराजा साम्राज्यवादी अंग्रेज़ों के साथ बड़ी चतुराई से पेश आया था और जब तक जीवित रहा, उसने उन्हें अपने पास फटकने नहीं दिया. उसने अपनी सेनाओं और प्रशासन के आधुनिकीकरण के लिए अंग्रेज़ों की सेवाएँ लीं. कहते हैं कि उसकी सेवा में 37 विदेशी थे. इनमें से तीन अंग्रेज़, 12 फ्राँसीसी, चार इतालवी, सात एंग्लो-इंडियन तथा तीन अमेरिकी थे. ये सभी लोग सुपरिभाषित शर्तों पर नौकरी पर रखे गए थे.

रणजीत सिंह ने यूँ तो कभी स्वयं को राजा नहीं कहा. एक लंबें अर्से तक वह कभी औपचारिक सिंहासन पर नहीं बैठा. वह अपने आपको जनता का नेता मानता था, जिसे लोगों ने अपनी लड़ाई लड़ने के लिए चुना था. विंसेंट स्मिथ का कथन है,‘‘पंजाब प्रांत न तो पारंपरिक रूप से एक भारतीय भू-क्षेत्र रहा, न मात्र एक समुदाय का दूसरे पर तानाशाही तंत्र. बल्कि समुदायों की आपस में भागीदारी रही है. रणजीत सिंह ने अपने ही सिख समुदाय पर कभी पारंपरिक राजा की तरह तानाशाही नहीं जताई. वह एक प्रकार से निर्वाचित मुखिया था और अगस्त ससीजर की तरह ढोंग के मामले में सतर्क. अंतिम समय के क़रीब महाराजा का ख़िताब ग्रहण करते हुए भी उन्होंने स्वयं को मात्र खालसा का जनरल ही माना.’’

महाराजा रणजीत सिंह जिस समय सत्ता में आया, उन दिनों सिख बिरादरी की यह परंपरा थी कि सिख समाज में यदि कोई बड़ी समस्या उठ खड़ी होती थी, तो अमृतसर में अकाल तख्त में सब जमा होते थे. इसे ‘सरबत खालसा’ कहा जाता था. वे सब उस विषय पर चर्चा कर सर्वसम्मति से निर्णय लेते थे. फैसला सब पर लागू होता था. इसे धार्मिक मान्यता प्राप्त होती. ऐसा ‘गुरमता’1809 में पारित हुआ, जब होलकर ने पंजाब में आश्रय की याचना की थी. उसका पीछा ईस्ट इंडिया कंपनी का लार्ड लेकर कर रहा था. रणजीत सिंह के भीतर के चतुर शासक को सरबत खालसा को एक परिषद में बदल देना सुविधाजनक जान पड़ा और उसे उसने नाम दिया ‘राज्य के स्तंभ’. इस प्रकार उसने धार्मिक और सांसारिक मामले को अलग करना चाहा था. राज्य के स्तंभों में थे ध्यान सिंह डोगरा, जो कि उनका हिंदू मंत्री था और दूसरा था उनका मुस्लिम विदेश मंत्री फकीर अजीज़ुद्दीन. यह फैसला वास्तव में उस परंपरा ‘मिसल’ से हट कर लिया गया क़दम था, जिसका सभी सिख आदर करते थे.

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धर्मनिरपेक्ष धर्म
लेखक- कर्तार सिंह दुग्गल
अनुवाद- कुलवंत कोछड़
प्रकाशक- नेशनल बुक ट्रस्ट, भारत
मूल्य- 45 रूपए (पेपरबैक संस्करण) कुल पृष्ठ-103

 
 
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