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'मुझे आज भी अचार खाना पसंद है'
 

 
 
लता मंगेश्कर
लता की गायिकी का सफ़र छह दशक से अधिक लंबा रहा है
'भगवान ने सब कुछ तो दिया है मुझे, अब तो कुछ माँगने की इच्छा ही नहीं रही.'

लता मंगेशकर की आवाज़ में वही खनक सुनाई पड़ती है जो उनके गायन में सुनाई देती है और जिसके कायल दुनिया के करोड़ों संगीत-प्रेमी हैं.

लता हो गईं हैं पूरे 77 साल की लेकिन आवाज़ और अंदाज़ अब भी जवाँ हैं.

ऐसी आवाज़ की तारीफ़ करने की हिम्मत मुझ में नहीं जो हिंदी फ़िल्मों के पार्श्वगायन की परिभाषा-सी है. गहरी साँस लेकर लता कहती हैं, "बड़ा लंबा सफर रहा है मेरे लिए लेकिन मैं ये कह सकती हूं कि मैंने इस सफ़र के हर लम्हे का मज़ा उठाया है."

ऐसा कहना लताजी के लिए अभी तो आसान है लेकिन इस सफ़र की शुरुआत में उन्होंने बड़ी कठिनाइयाँ भी उठाईं. "मुझे मराठी फ़िल्मों में अभिनय करना पड़ा क्योंकि पिताजी की मृत्यु मेरे बचपन में ही हो गई और किसी को तो घर का खर्च उठाना ही था न. मुझे अभिनय करने से सख्त परहेज़ था लेकिन मैं करती भी क्या."

उनके गरिमा भरे व्यक्तित्व को देखकर ये यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि बचपन में लताजी बड़ी शरारती थीं. क्या ये सच है कि लताजी रसोई में अचार चुराने जाती थीं तो माँ से मार पड़ती थी. "मां पिटाई तो अक्सर करती थीं लेकिन अचार खाने के लिए नहीं, मेरी शरारतों के लिए. रही बात अचार की तो वो तो मैं अब भी खाती हूँ."

 ऐसा कुछ भी नहीं है कि अचार खाने से गला ख़राब होता है. मैं तो बचपन से खाती आई हूँ. हाँ, ठंडी चींज़ों जैसे आइसक्रीम से कभी-कभी गले पर असर पड़ सकता है
 

मेरा मुँह तो खुला का खुला रह गया. इतनी सुरीली आवाज़ और अचार? ऐसा भला कैसे हो सकता है. "ऐसा कुछ भी नहीं है कि अचार खाने से गला ख़राब होता है. मैं तो बचपन से खाती आई हूँ. हाँ, ठंडी चींज़ों जैसे आइसक्रीम से कभी-कभी गले पर असर पड़ सकता है."

तो बचपन में कैसे स्वभाव की थीं लताजी. "मैं बड़ी हंसमुख थी और अभी भी हंसने-हंसाने में मुझे बड़ा मज़ा आता है."

इन हल्की-फुल्की बातों के बाद मैंने रुख किया कुछ गंभीर सवालों का. सुना है बहन आशा भोंसले से लताजी की नहीं बनती۔ क्या सोचती हैं वे आशा के बारे में.

"आशा एक बहुत अच्छी गायिका है. आज भी सुरीला गाती है. हमारे संबंध बहुत अच्छे हैं और हमारे फ्लैट भी एक दूसरे के अगल-बगल में हैं जिनको एक ही दरवाज़ा जोड़ता है. पता नहीं लोग ऐसा क्यों सोचते हैं कि हमारी नहीं बनती. हो सकता है ये इसलिए हो क्योंकि हम दोनों एक ही क्षेत्र से जुड़े हैं."

इतनी पुरुष-प्रधान फ़िल्म इंडस्ट्री में भी लताजी ने हमेशा अपनी ही शर्तों पर काम किया. "मैंने एक बार मोहम्मद रफ़ी साहब के साथ गाने से इनकार कर दिया क्योंकि मैं अपने गानों के लिए रॉयल्टी लेना चाहती थी और रफ़ी साहब को लगता था कि ये ग़लत है. इस बात पर हमारी अनबन हो गई और कुछ साल मैंने उनके साथ नहीं गाया."

लता ने बहुत कम उम्र से गाना शुरू किया

और राज कपूर से क्यों अनबन हो गई थी? 'राज साहब ने मुझे मेरे गानों के लिए रॉयल्टी देने से मना कर दिया तो मैंने 'मेरा नाम जोकर' के लिए गाने से मना कर दिया.'

फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धराशायी हो गई और राज कपूर को भी सुरों की मल्लिका के सामने झुकना पड़ा. आख़िर लताजी की वापसी आरके बैनर में हुई फ़िल्म 'बॉबी' के साथ जिसने सफलता के झंडे गाड़ दिए.

ज़ाहिर है, जन्मदिन है तो लता जी व्यस्त हैं, इसलिए मुझे उनसे विदा लेनी ही पड़ती है. लेकिन सुरों की रानी से मैं एक वो गुज़ारिश किए बिना कैसे विदा ले लूँ. क्या आप बीबीसी के लिए कुछ गुनगुना देंगी लताजी?

लता जी फिर उसी खनक के साथ बोलीं "जानती हैं पूरी रात मैं ठीक से सो नहीं पाई हूँ और देखिए न कितना काम पड़ा है. आज मुझे माफ कर दीजिए. पर हां, मुझे मेरे जन्मदिन पर आपने याद किया, इसके लिये मैं आपकी शुक्रगुज़ार हूँ."

 
 
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