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रविवार, 31 दिसंबर, 2006 को 08:41 GMT तक के समाचार
 
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एक मुलाक़ात: प्रीति ज़िंटा के साथ
 

 
 
प्रीति ज़िंटा
सभी समुदायों के ग़रीब बच्चों के लिए स्कूल खोलना चाहती हैं प्रीति
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इसी श्रंखला में इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं बॉलीवुड की जानी-मानी अभिनेत्री प्रीति ज़िंटा से.

पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश -

सबसे पहले, ये तो ठीक है कि आप प्रीटि (ख़ूबसूरत) हैं लेकिन प्रीति ज़िंटा के स्पेलिंग को लेकर कुछ ख़ास है क्या?

नाम प्रीति है, लेकिन मेरे पापा का ख़्याल था स्पेलिंग में ई और आई आना चाहिए. इसलिए मेरे नाम के स्पेलिंग पीआरईआईटीवाई है.

मतलब ये कि एकता कपूर की तरह दो ‘ए’ लगाने जैसा कोई मामला नहीं है?

नहीं ऐसा कुछ नहीं है. अगर ऐसा होता तो मैं आगे ‘के’ लगाती. कप्रीति हो जाती.

फ़िल्मों में आने की कैसे सूझी. जहाँ तक मुझे जानकारी है आपकी दिलचस्पी पढ़ाई में थी और पारिवारिक पृष्ठभूमि सैन्य परिवार से है. ऐसे में फ़िल्मी दुनिया की तरफ कैसे बढ़ीं आप?

मैने कभी नहीं सोचा था कि मैं फ़िल्म अभिनेत्री बनूँगी. लेकिन एक वक़्त में मेरी बहुत अच्छी दोस्त और उसका ब्वॉयफ्रेंड, शेखर कपूर के ऑडिशन में गए. जहाँ ये ऑडिशन हो रहा था, उसके ठीक सामने की बिल्डिंग में मैं मनोचिकित्सा की परीक्षा देने आई थी. जब मैं अपने दोस्तों को लेने वहाँ पहुँची तो शेखर कपूर ने मुझे देखा और फ़िल्म की पेशकश की.

 शेखर कपूर ने मुझे देखा और फ़िल्म की पेशकश की. मैने कहा पता नहीं कि मैं फ़िल्म कर सकूँगी या नहीं. शेखर ने कहा कि ये तुम्हारी तक़दीर है और तुम बहुत बड़ी स्टार बनने वाली हो. मैने तक़दीर का फ़ैसला सिक्के से किया. एक रुपए का सिक्का उछाला. तय किया कि ‘हेड’ आने पर ही मैं फ़िल्म लाइन में जाऊँगी. संयोग से ‘हेड’ आया और मैंने फ़िल्म साइन कर ली. हालाँकि वो फ़िल्म तो नहीं बनी, लेकिन मैं फ़िल्म इंडस्ट्री में आ गई
 
प्रीति

तब मैने कहा कि मुझे पता नहीं कि मैं फ़िल्म कर सकूँगी या नहीं. शेखर ने कहा कि ये तुम्हारी तक़दीर है और तुम बहुत बड़ी स्टार बनने वाली हो. मैने तब अपनी तक़दीर का फ़ैसला सिक्के से किया और एक रुपए का सिक्का लेकर उछाला. मैने तय किया कि ‘हेड’ आने पर ही मैं फ़िल्म लाइन में जाऊँगी. संयोग से ‘हेड’ आया और मैने फ़िल्म साइन कर ली. हालाँकि वो फ़िल्म तो नहीं बनी, लेकिन मैं फ़िल्म इंडस्ट्री में आ गई.

किस तरह का संगीत पसंद है?

मुझे हर तरह का संगीत पसंद है. कभी सॉफ्ट इंस्ट्रूमेंटल अच्छा लगता है, तो कभी सॉफ्ट रॉक. टेक्नो म्यूज़िक भी पसंद है. हिंदी फ़िल्मों में मेरा सबसे पुराना पसंदीदा गाना फ़िल्म ‘काग़ज़ के फूल’ से है - ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम.’ इसके बोल बहुत अच्छे हैं.

क्या शुरू से ही ऐसा था कि जो भी आपको देखता था तो ये समझता था कि भई ये तो भावी स्टार हैं?

जी नहीं. मेरे छोटे बालों की वजह से लोग मुझे लड़की नहीं लड़का ज़रूर समझते थे. बचपन में तो मैं बहुत शैतान थी. शिमला में बंदरों के साथ खेलती थी. एक बार तो बंदर ने मुझे थप्पड़ भी मार दिया था.

हमें फ़ैशन का इतना एहसास नहीं था. तब केबल नहीं था, इंटरनेट नहीं था. सिर्फ़ दूरदर्शन का चैनल हुआ करता था. हमारी ज़िंदगी हिल स्टेशन पर बहुत साधारण तरीक़े से चल रही थी. आज तो गाँव-गाँव में केबल है और दुनिया में क्या हो रहा है आपको झट से पता चल जाता है. तब सपने भी अलग होते थे. कभी मैं सोचती कि बड़ी होकर ट्रक ड्राइवर बनूँगी, कभी सोचती कि एयर होस्टेस तो कभी प्रधानमंत्री. लेकिन फ़िल्मों के बारे में मैने कभी नहीं सोचा था.

उन दिनों फ़िल्में भी देखती होंगी. कोई दिलचस्प याद?

मैंने मिस्टर इंडिया देखी थी और श्रीदेवी की तो मैं दीवानी थी. मेरे छोटे भाई को अमिताभ बच्चन बहुत पसंद थे. मैने ‘मासूम’ भी देखी, लेकिन चूँकि मैं बोर्डिंग स्कूल में पढ़ती थी तो मैने ‘साउंड ऑफ़ म्यूज़िक’, ‘बेनहर’, ‘मेरी पॉपिन्स’ जैसी अंग्रेज़ी फ़िल्में ज़्यादा देखीं.

सैन्य पृष्ठभूमि के चलते क्या घर में ज़बरदस्त अनुशासन रहता था या रोक-टोक रहती थी?

माता-पिता ने एक ही बात कही थी कि झूठ नहीं बोलना. कोई भी ग़लती करो, लेकिन सच बोल दो तो कोई समस्या नहीं है. मैने तो तमाम उल्टे काम किए और सच बोला. मैं बाइज़्ज़त बरी हो जाती थी.

एक-दो उल्टे कामों के बारे में हमें भी बताइए?

मेरे पिता की मृत्यु उस वक़्त हुई जब मैं 13 साल की थी और तब तक मैं ख़ुद को लड़का ही समझती थी. मैं स्कर्ट नहीं पहनती थी, कोई मुझे गुड़िया दे देता था तो मैं उस गुड़िया की आँखे निकाल देती थी.

किसी लड़के के बारे में शादी करने की तो नहीं सोचती थी?

जी नहीं, मैं कंचे खेलती थी, पेड़ पर चढ़ती थी. लड़कों के साथ लड़ाई करती थी और अगर किसी ने मेरे भाई से झगड़ा किया या उसकी पिटाई कर दी तो उसकी तो ख़ैर नहीं. मैं बहुत लड़ाका थी और हमारा ग्रुप उल्टे कामों में लगा रहता था.

तो आपको कब ये एहसास हुआ कि आप बेहद खूबसूरत और आकर्षक लड़की हैं. आपकी पहली डेट. स्कूल-कॉलेज में कौन लड़का अच्छा लगा?

अच्छे तो कई लगे. लेकिन मैने कभी किसी को नहीं बताया. क्योंकि अक़्सर ये मेरे बहुत अच्छे दोस्त होते थे और उन्हें हमेशा किसी सुंदर लड़की से प्यार होता था. मेरा मन करता था कि मैं उस लड़की का गला घोंट दूँ. मैं समझती हूँ कि मुझे सरोज जी ने लड़की बनाया और बहुत कुछ सिखाया. सरोज जी सेट पर अक्सर कहतीं - इसे कहाँ से ले आए, इसे कमर तक हिलाना नहीं आता. फ़िल्मों में आकर ही मैने सीखा कि कैसे बाल बनाने हैं और लड़कियों की तरह कैसे रहना है.

सच कहूँ तो पहले मुझे इन सबमें ख़ास रुचि नहीं थी. फिर पिताजी की मौत के बाद मेरी माँ दो साल तक अस्पताल में रहीं. इसलिए ब्वॉय फ्रेंड को लेकर उतनी दिलचस्पी नहीं थी और उम्र भी ज़्यादा नहीं थी. 15-16 साल की थी. उस वक़्त इस उम्र में कोई इस बारे में नहीं सोचता था. ख़ैर आजकल तो 12-12 साल की लड़कियों के भी ब्वॉय फ्रेंड होते हैं.

(प्रीति ज़िंटा के साथ ‘एक मुलाक़ात’ सुनिए बीबीसी हिंदी ऑनलाइन के अलावा बीबीसी हिंदी पर –मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर, भारतीय समयानुसार रात आठ बजे. दिल्ली और मुंबई के श्रोता रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार दोपहर 12 बजे भी ये कार्यक्रम सुन सकते हैं.)

आपकी पहली डेट?

मैं दिल्ली के एनाबेल में वेलेंटाइन्स डे के लिए गई थी. वहाँ मुझे एक लड़के ने गुलाब का फूल दिया. बाद में मेरे दोस्तों का उससे झगड़ा हो गया और दोस्तों ने उसकी नाक तोड़ दी.

 जब मैं 21 साल की थी और अपना जन्मदिन मना रही थी. मुझे एक लड़का बहुत अच्छा लगा. मैंने अपनी दोस्त से उसके बारे में पूछा. आख़िरकार कुछ देर बाद जब मैंने उससे बात की और जैसे ही उसने अपना मुँह खोला और मेरा हालचाल पूछा, मेरा क्रश ख़त्म हो गया.
 
प्रीति ज़िंटा

सच कहूँ तो उस वक़्त मैं लड़कों के साथ प्रतिस्पर्धा करती थी. जब मैं 18 साल की थी तो मेरे नानाजी चाहते थे कि मेरी शादी हो जाए. लेकिन मैं कुछ बनना चाहती थी और शादी जेल नज़र आ रही थी. वैसे भी अगर आप मेरी 15-16 साल की उम्र की तस्वीर देखेंगे तो विश्वास नहीं करेंगे कि वो मैं ही हूँ. मेरे 13 चचेरे भाई हैं, इसलिए मैं लड़कों को देखकर कभी नर्वस नहीं हुई.

कब पहली बार ऐसा हुआ जब आपके दिल में घंटियाँ बजीं?

जब मैं 21 साल की थी और अपना जन्मदिन मना रही थी. मुझे एक लड़का बहुत अच्छा लगा. मैंने अपनी दोस्त से उसके बारे में पूछा. आख़िरकार कुछ देर बाद जब मैंने उससे बात की और जैसे ही उसने अपना मुँह खोला और मेरा हालचाल पूछा, मेरा क्रश खत्म हो गया.

आपको लोग बहुत चुलबुली और ऊर्जावान बताते हैं क्या वाकई ऐसा है?

हाँ, मैं ऐसी हूँ. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मैं 24 घंटे उछलकूद करती रहती हूँ. मेरे व्यक्तित्व में सभी तरह के रंग हैं. अगर मैं चुलबुली हूँ तो मेरे भीतर गहराई है, मैं गंभीर भी हूँ और मुझे ग़ुस्सा भी आता है.

आप खुद को कैसे डिस्क्राइब करेंगी?

मैं ज़िंदादिल हूँ और हरेक लम्हा पूरी तरह जीना चाहती हूँ.

पहले धारणा थी कि फ़िल्मी लोग ज़्यादा दिमाग़ी नहीं होते, आजकल फ़िल्म स्टारों की छवि बदल गई है. आपने तो दो-तीन साल पहले एक मुक़दमे में दिलेरी दिखाई थी और अपना बयान दर्ज कराया था. अगर आपको प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो क्या करेंगी?

अगर मुझे देश का प्रधानमंत्री बना दें तो मैं बहुत सारे काम करूंगी. वैसे राजनीति में आने की मेरी कोई इच्छा नहीं है, लेकिन अगर तीन-चौथाई बहुमत के साथ मुझे प्रधानमंत्री बनाया जाए तो मैं बन जाऊँगी.

हम हमेशा मज़ाक में कहते हैं कि एक बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है मेरा भारत महान और नीचे छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा होता है-बनाना पड़ेगा.

तो मैं चाहूँगी कि अपने देश को महान बनाऊँ. सबसे पहले आधारभूत ढाँचे का विकास करना होगा. सड़क, यातायात जैसी सुविधाओं पर ध्यान देना होगा.

भारत में अमरीका जैसी दोहरी नागरिकता रखना चाहूँगी. देश की अलग और राज्य की अलग.

होता क्या है कि लोग सुविधाओं के लिए बड़े शहरों की ओर आ रहे हैं और फिर आबादी बढ़ने से समस्या आती है.

प्रत्येक राज्य का विकास होना चाहिए ताकि लोगों को अपना राज्य न छोड़ना पड़े. अब मुंबई को ही लीजिए यहाँ सबसे अधिक लोग बिहार से आते हैं. ऐसे में यहाँ के लोगों की मुश्किलें बढ़ेंगी ही. हालाँकि बोलने के लिए चीज़ें आसान होती हैं, लेकिन मैं इन कामों को करना चाहूँगी.

वैसे तो अभी काफ़ी कुछ अच्छा हो रहा है. व्यापार बढ़ रहा है, जीडीपी आठ प्रतिशत तक हो गई है और कह रहे हैं कि इससे ऊपर जाने वाली है. निजी क्षेत्र को सरकार ने खूब बढ़ावा दिया है. तो मैं समझती हूँ कि भारत विकास की राह पर है. लेकिन आबादी की समस्या बनी हुई है.

सुना है आप बहुत मज़ाकिया हैं. हाल ही में लंदन में आपने अपने बॉडीगार्ड को बेवकूफ़ बनाया और बुर्का पहनकर निकल गईं. क्या ये सही बात है?

सही बात है. आइडिया अभिषेक को डराने का था. लेकिन मैं भूल गई थी कि मेरा बॉडीगार्ड साथ में है. बाद में सेट पर हमने अभिषेक को तंग करने की कोशिश की, लेकिन बाद में प्रशंसकों के वहाँ आने से हमें ये सब बंद करना पड़ा.

क्या आपको लगता है कि इस गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा में दो अभिनेत्रियाँ दोस्त हो सकती हैं?

जी हाँ, उनमें दोस्ती हो सकती है. क्योंकि अभिनेत्री होने से पहले मैं इंसान हूँ और दो इंसानों के बीच दोस्ती होने में कोई मुश्किल नहीं है. अभिनेत्रियाँ मेरी दोस्त हैं, लेकिन बेस्ट फ्रेंड नहीं हैं.

 आमिर के साथ मैने ‘दिल चाहता है’ की. बेशक मेरे ऑल टाइम फेवरिट शाहरुख़ हैं, मैं उन्हें किसी भी हीरो पर तरज़ीह दूँगी, लेकिन आमिर से मैने काफ़ी कुछ सीखा, वर्ल्ड टूर किया और वो मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं और मुझे बहुत पसंद हैं
 
प्रीति ज़िंटा

आपकी फेवरिट?

ऐश्वर्या मेरी अच्छी दोस्त है. मैने उनके साथ वर्ल्ड टूर किया था. जब मैने उनके साथ काम किया तो बहुत अच्छा लगा. मैं उनको काफ़ी वर्षों से जानती हूँ. फ़िल्म के हिट-फ़्लॉप होने पर हममें बदले की भावना नहीं है. क्योंकि कई ऐसी अभिनेत्रियाँ हैं जिनकी फ़िल्म हिट होने पर उनके बात करने का अंदाज़ बदल जाता है. ऐश्वर्या में वो बात नहीं है. वो मेरे साथ हमेशा वैसे ही रहीं हैं जैसे मैं उनसे पहली बार मिली थी.

और मल्लिका शेरावत?

अच्छी लगती है. मेरी उनसे मुलाक़ात बहुत छोटी रही है. उन्हें ज़्यादा जानती तो नहीं हूँ, लेकिन उनका इंटरव्यू सुना था और ये अच्छा लगा. क्योंकि वो जो है कहती हैं. वो ऐसी नहीं जो सती-सावित्री होने का ढोंग करे और फिर जा कर मर्डर साइन करे. वो कहती हैं कि वो खूबसूरत हैं और सेक्स सिंबल है. मुझे ऐसे लोग बहुत पसंद हैं जो ईमानदारी से बोलते हैं और डंके की चोट पर बोलते हैं.

अच्छा ये बताएँ आमिर ख़ान या शाहरुख़ ख़ान?

दोनों. आमिर के साथ मैने ‘दिल चाहता है’ की. बेशक मेरे ऑल टाइम फेवरिट शाहरुख़ हैं, मैं उन्हें किसी भी हीरो पर तरज़ीह दूँगी, लेकिन आमिर से मैने काफ़ी कुछ सीखा, वर्ल्ड टूर किया और वो मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं और मुझे बहुत पसंद हैं. इनके बीच में चुनाव बहुत मुश्किल है.

आप भी उनमें से हैं जो ये मानती हैं कि लोगों को सेलेब्रिटी की निजी ज़िंदगी के बारे में देखने या सवाल पूछने का अधिकार नहीं होना चाहिए?

हाँ, बिल्कुल. फिर तो टेलीविज़न रिपोर्टरों से भी पूछा जाना चाहिए. क्योंकि वे भी तो रोज़ टेलीविज़न पर दिखते हैं. किसी भी इंसान को ये सब अच्छा नहीं लगता. सेलेब्रिटी की निजी ज़िंदगी में दख़लंदाजी नहीं होनी चाहिए. अगर निजी ज़िंदगी सबको पता हो तो आप कभी सामान्य नहीं रह पाएँगे.

लेकिन हम अच्छी बातों के बारे में जानना चाहते हैं. शादी के बारे में बता सकें तो बताएँ वरना चर्चाएँ तो हैं ही?

मैंने तो सब जगह सच बोला. आज तक मैने मीडिया से कभी झूठ नहीं बोला. अगर मेरी ज़िंदगी में कोई नया दौर आएगा तो मैं बताऊँगी. मीडिया अपनी तरफ़ से कहानी बनाता है, छापता और दिखाता रहता है. आजकल तो मैं बची हुई हूँ. क्योंकि मीडिया इन दिनों अभिषेक और ऐश्वर्या के पीछे पड़ा है. जब ऐश्वर्या-अभिषेक के बारे में अख़बार में पहला आर्टिकल छपा था तो मैंने अभिषेक से कहा था कि मैं बच गई हूँ, अब तुम्हारी बारी है और सच्ची मीडिया ने उनकी बैंड बजाकर रख दी है.

अगर ये कहा जाए कि आपके लिए एक ख़ूबसूरत और रोमांटिक शाम का आयोजन करना है तो आप इसे कैसे आयोजित करवाना चाहेंगी?

मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जिनके लिए रोमांस का मतलब कैंडिल लाइट डिनर होता है. मैं समझती हूँ कि रोमांस दिल में होता है. आप जिसके साथ बैठे हो उसके साथ आप कुछ अच्छे लम्हे बिताएँ, वो रोमांस होता है. बाक़ी तो सब फ़िल्मी रोमांस है. अगर आपकी किसी के लिए फ़ीलिंग्स हैं. तो चाहे आप उसके साथ बैठकर चने भी खाएँ, ये भी बहुत रोमांटिक हो सकता है.

 मैं चाहती हूँ कि ऐसा बड़ा स्कूल बने जहाँ दुनिया के सबसे अच्छे शिक्षक और खेल शिक्षक हों जो सारे ग़रीब बच्चों को पढाएँ और वो बच्चे हिंदू, मुसलमान, सिख न हों बल्कि हिंदुस्तानी हों. एक ऐसा स्कूल आज नहीं तो कल एक न एक दिन तो ज़रूर बनाऊँगी.
 
प्रीति

पर मुझे क्यों नहीं लग रहा है कि आपने हाल ही में किसी के साथ बैठकर चने खाए हैं?

दरअसल, जब भी लोग रोमांटिक शाम कहते हैं तो ख़्याल आता है कि अच्छा रेस्तरां हो, अच्छा खाना हो, शेंपेन हो, फूल हों. लेकिन प्यार तो ग़रीब भी करते हैं न. मैं समझती हूँ कि रोमांटिक डेट का मतलब है कि आप जिसे बहुत चाहते हैं वो आपके साथ हो.

अच्छा जीवन की कोई ऐसी घटना जिसे आप मिटा देना चाहेंगी?

वैसे यूँ तो बहुत सी चीजें हैं. फिर भी मेरे पिता की मौत और सूनामी प्रलय की घटना को मिटा देना चाहूँगी. पर कोई चीज़ मिट नहीं सकती.

कोई बड़ी महत्वाकांक्षा, कोई सपना?

मैं चाहती हूँ कि ऐसा बड़ा स्कूल बने जहाँ दुनिया के सबसे अच्छे शिक्षक और खेल शिक्षक हों जो सारे ग़रीब बच्चों को पढाएँ और वो बच्चे हिंदू, मुसलमान, सिख न हों बल्कि हिंदुस्तानी हों. एक ऐसा स्कूल आज नहीं तो कल एक न एक दिन तो ज़रूर बनाऊँगी.

प्रीति ज़िंटा 10 साल में अपने आपको कहाँ देखती हैं.

दस साल बाद तो मेरे बच्चे होंगे. पता नहीं तब शायद मैं क्या रही होऊँगी. मैंने इतने आगे की तो नहीं सोची है. पर जैसी भी होऊँगी, खुश होऊँगी.

 
 
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