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शनिवार, 03 फ़रवरी, 2007 को 11:41 GMT तक के समाचार
 
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना पाया है बॉलीवुड?
 

 
 
बॉलीवुड
बॉलीवुड दुनिया के सबसे बड़े फ़िल्म उद्योगों में से एक है
करीब सौ वर्ष से भी पहले 1895 में फ़्रांस के लुमियर बंधुओं ने विश्व की पहली मोशन पिक्चर बनाई-45 सेकेंड लंबी. तस्वीरों के बजाय पर्दे पर चलते-फिरते लोगों को देखना दर्शोकों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं था.

भारत में इसे 1896-97 में दिखाया गया और 1913 में धुंडीराज गोविंद फाल्के ने भारत को 'राजा हरीशचंद्र' के रूप में उसकी पहली मूक फ़िल्म दी और जल्द ही 1931 में फ़िल्मों को आवाज़ मिली आलम-आरा से जिसे हिन्दुस्तानी में बनाया गया था.

उस समय शायद किसी ने सोचा भी न होगा कि एक दिन लोगों में हिंदी सिनेमा इस कदर लोकप्रिय होगा जैसा कि आज की तारीख़ में है.

भारत में सिनेमा किसी जुनून से कम नहीं है. आज शायद दुनिया के सबसे बड़े फ़िल्म उद्योगों में से एक है हिंदी सिनेमा. ख़ूबसूरत कॉस्ट्यूम, दिलकश नज़ारे, करोड़ों का बजट, टॉप सितारे और उस पर नाच-गाने का तड़का... दुनिया भर में हिंदी फ़िल्में रिलीज़ होती हैं, लोकप्रिय हैं और ज़बरदस्त कमाई भी कर रही हैं.

पर इस सब के बावजूद क्या अंतरराष्ट्रीय जगत में अच्छे और सफल सिनेमा के तौर पर मकाम बना पाया है बॉलीवुड?

क्या हिंदी फ़िल्मों की सफलता का आधार केवल फ़िल्मों की लोकप्रियता, पहुँच और पैसा कमाने की क्षमता है या फिर बेहतरीन, स्तरीय और अर्थपूर्ण सिनेमा भी इस दायरे में आता है.

 फ़िल्म बनाते समय सबसे पहले मैं ये तय करूँगा कि ये फ़िल्म मेरे स्थानीय दर्शकों के लिए है या ग्लोबल दर्शक के लिए और इनमें से चुनना पड़े तो मैं सबसे पहले भारतीय दर्शकों को ही तरजीह दूँगा.भारतीय सिनेमा की अपनी अलग पहचान है- तकनीक और कहानी कहने का अंदाज़ जुदा है और गीत-संगीत भी होता है. अच्छी फ़िल्म वही है जिसे मेरा दर्शक पसंद करें
 
सुजॉय घोष

फ़िल्मकार महेश भट्ट कहते हैं कि ये आकलन इस पर निर्भर करता है कि इसके लिए मापदंड क्या इस्तेमाल किए जाते हैं.

महेश भट्ट के मुताबिक अगर हिंदुस्तानी मापदंड इस्तेमाल करें तो हिंदी फ़िल्मों ने काफ़ी तरक्की की है, तकनीक के मामले में बहुत आगे बढ़ी हैं और सिनेमा की मार्केट स्थिरता ज़्यादा हुई है.

अंतरराष्ट्रीय सिनेमा बनाम हिंदी सिनेमा के बीच तुलना के बारे में युवा फ़िल्मकार सुजॉय घोष( झंकार बीट्स के निर्देशक) की अपनी सोच है.

सुजॉय घोष कहते हैं, "फ़िल्म बनाते समय सबसे पहले मैं ये तय करूँगा कि ये फ़िल्म मेरे स्थानीय दर्शकों के लिए है या ग्लोबल दर्शक के लिए और इनमें से चुनना पड़े तो मैं सबसे पहले भारतीय दर्शकों को ही तरजीह दूँगा.भारतीय सिनेमा की अपनी अलग पहचान है- तकनीक और कहानी कहने का अंदाज़ जुदा है और गीत-संगीत भी होता है. अच्छी फ़िल्म वही है जिसे मेरा दर्शक पसंद करें "

लोकप्रिय भी,कमाऊ भी

वैसे बात जहाँ तक लोकप्रियता और पहुँच की है, तो बेशक भारत के अलावा हिंदी फ़िल्में मध्य पूर्व और मध्य एशिया, अफ़्रीका, अमरीका और ब्रिटेन समेत दुनिया के कई हिस्सों में बेहद मशहूर हैं.

राज कपूर की आवारा हो या रोमांस के शंहशाह शाहरुख़ की ‘कभी अलविदा न कहना’ ..हिंदी फ़िल्मों ने वर्षों से लोगों को लुभाया है. हॉलीवुड के पास सुपरमैन और बैटमैन है तो हिंदी सिनेमा भी अब 'क्रृष' के रूप में अपने सुपरमैन होने का दावा कर सकता है.

इन फ़िल्मों ने न सिर्फ़ लोगों का मन लुभाया है बल्कि ख़ूब धन भी कमाया है. वर्ष 2006 की ही बात करें तो बॉलीवुड ने इस दौरान जमकर कमाई की-रंग दे बसंती, फ़ना, लगे रहो मुन्नाभाई, क्रिश, धूम-2...हिट फ़िल्मों की मानो झड़ी सी लग गई थी.

ब्रिटेन में बाफ़्टा( ब्रिटिश एकैडमी ऑफ़ फ़िल्म और टेलीविज़न आर्टस) ने बॉलीवुड के विशेष योगदान के सम्मान में 'बाफ़्टा गोज़ बॉलीवुड' नाम का विशेष आयोजन किया.

'सदी के महानायक' अमिताभ बच्चन को हाल ही में फ्रांस सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित भी किया है.

पहचान की तलाश?

 हिंदी सिनेमा विदेशों में लोकप्रिय ज़रूरू है लेकिन ये याद रखना होगा कि इसे देखने वाले ज़्यादातर भारतीय या दक्षिण एशियाई लोग ही हैं. ग़ैर एशियाई ऑडिऐंस आज भी शायद बॉलीवुड को उतना नहीं जानता है.हिंदी फ़िल्मों के स्तर को अभी और बेहतर करने की ज़रूरत है ताकि ग़ैर भारतीय दर्शक भी हिंदी फ़िल्में देखने लगें
 
इंदु मिरानी

लेकिन सवाल फिर भी बरकरार है कि क्या ये लोकप्रियता और कमाई बॉलीवुड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन सिनेमा की श्रेणी में खड़ा कर पाई है? या फिर बॉलीवुड अपने ही मायाजाल में फँस कर रह गया है.

वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार इंदु मिरानी विदेशों में बॉलीवुड की पहुँच और लोकप्रियता के तर्क से सहमत नहीं है.

इंदु मिरानी का मानना है,"हिंदी सिनेमा विदेशों में लोकप्रिय ज़रूरू है लेकिन ये याद रखना होगा कि इसे देखने वाले ज़्यादातर भारतीय या दक्षिण एशियाई लोग ही हैं. ग़ैर एशियाई ऑडिऐंस आज भी शायद बॉलीवुड को उतना नहीं जानता है"

इंदु मिरानी कहती हैं, "ये मानना ग़लत होगा कि हिंदी सिनेमा की पहुँच दूर तक है... मैं कहूँगी कि आजकल भारतीयों की पहुँच दूर तक है, कई देशों से बसे हैं और इसलिए बॉलीवुड भी वहाँ पहुँचा है."

हिंदी फ़िल्मों के बढ़ते कारोबार पर उनका कहना है कि फ़िल्मों की कमाई इसलिए बढ़ गई है क्योंकि विदेशों में टिकट मँहगे होते हैं और हिंदी फ़िल्मों के स्तर को अभी और बेहतर करने की ज़रूरत है ताकि ग़ैर भारतीय दर्शक भी हिंदी फ़िल्में देखने लगें.

'बंधा बंधाया फ़ार्मूला'

फ़िल्में
अंग्रेज़ी या अन्य विदेशी भाषाओं में बनी फ़िल्में ऑस्कर की दौड़ में हमेशा आगे रही हैं

बॉलीवुड पर एक आरोप लंबे समय से लगता रहा है- बंध-बंधाए दायरे में बनी फ़िल्में, वास्तविकता से दूर, न कहानी में नयापान न फ़िल्मांकन में- जैसे नई बोतल में पुरानी शराब.

फ़िल्म समीक्षक इंदु मिरानी का कहना है, "जो व्यवसायिक सिनेमा बॉलीबुड में आम तौर पर बनता है निर्माता-निर्देशक बस उसी सीमित दायरे में बंधकर रह जाते हैं. अजीब सी बात है कि लोग वहाँ पैसा नहीं लगाना चाहते जहाँ प्रयोग हो रहा हो या थोड़ा बहुत रिस्क हो. इसीलिए हिंदी सिनेमा उतना आगे नहीं जा पा रहा है."

 अंतरराष्ट्रीय मापदंडों की बात करें तो शायद हमने अपनी रेस शुरू ही नहीं की क्योंकि हर प्रोडक्ट की अहमीयत पश्चिमी मापदंड के अनुसार परखी जाती है, तो उसके मुताबिक हमारा कद उतना हुआ नहीं है
 
महेश भट्ट

आज़ाद भारत के करीब 60 वर्षों के इतिहास में विदेशी भाषा की श्रेणी में कोई भी हिंदी फ़िल्म ऑस्कर नहीं जीत पाईं है- केवल तीन हिंदी फ़िल्में अंतिम पाँच में नामांकित ज़रूर हुई हैं- 1957 में मदर इंडिया, 1988 में सलाम बॉबे और फिर 2001 में लगान.

जबकि इटली जैसा छोटा सा देश इस श्रेणी में 10 बार ऑस्कर जीत चुका है(तीन विशेष पुरस्कारों के अलावा), फ्रांस नौ बार और स्पेन चार बार.

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित होने वाली भारतीय फ़िल्में आम तौर पर हिंदी न होकर मलयालम और बंगाली जैसी क्षेत्रीय फ़िल्में ही रही हैं.

इसे विसंगति ही कहेंगे कि इस बार दीपा मेहता की वाटर ऑस्कर की दौड़ में आखिरी पाँच तक पहुँच तो पाई है पर इसे भारत की ओर से नहीं कनाडा की ओर से नामांकित किया गया है.

विदेशी सिनेमा से तुलना की बात पर फ़िल्मकार महेश भट्ट कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय मापदंडों की बात करें तो शायद हमने अपनी रेस शुरू ही नहीं की क्योंकि हर प्रोडक्ट की अहमीयत पश्चिमी मापदंड के अनुसार परखी जाती है, उसके मुताबिक हमारा कद उतना हुआ नहीं है."

उम्मीद की किरण?

रंग दे बसंती को आम दर्शकों और फ़िल्म आलोचकों दोनों की सराहना मिली

कुल मिला कर कहें तो एक विरोधाभासी तस्वीर उभर कर आती है....बॉलीवुड सफल है तो पर सार्थक सिनेमा नहीं? देश-विदेश में लोकप्रिय तो पर ऑस्कर जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार जीतने की क्षमता नहीं रखता?

तस्वीर कुछ धुँधली सी है पर साथ ही कुछ सकारात्कमक चलन भी पिछले कुछ सालों में सामने आए हैं.

मल्टीपलेक्स के बढ़ते चलन ने निर्माता-निर्देशक को ये आज़ादी दी है कि वो अपनी फ़िल्मों में लीक से हटकर कुछ प्रयोग करें और वो भी कम लागत में... क्योंकि दर्शकों का एक वर्ग इन मल्टीपल्केस सिनेमाघरों में मंहगी टिकट खरीदकर भी फ़िल्म देखने ज़रूर आता है. झंकार बीट्स,इक़बाल और खोसला का घोसला इसकी मिसाल हैं.

वहीं रंग दे बसंती और लगे रहे मुन्ना भाई जैसे फ़िल्मों की सफलता ने साबित किया है कि अर्थपूर्ण फ़िल्मों और व्यवसायिक फ़िल्मों में जो फ़ासला हमेशा बना रहता है,उसे मिटाया जा सकता है.

इंदु मिरानी कहती हैं कि रंग दी बसंती ऑस्कर की दौड़ में भले ही पिछड़ गई हो लेकिन ये ऐसी फ़िल्म है जिसे आप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिखा सकते हैं.

पिछले कुछ सालों में ऐसी कुछ-एक हिंदी फ़िल्में आईं जो सफल भी रहीं, सार्थक भी थी पर बॉलीवुड के बंधे-बंधाए फ़ार्मूले से हटकर भी रहीं- ऐसी फ़िल्में जिनमें मनोरंजन भी है, नाच-गाना भी, कुछ ताज़गी भी और संजीदगी भी.......

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग जगह बनाने में जुटे बॉलीवुडे के लिए शायद उम्मीद की ये एक बड़ी किरण है.

 
 
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