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सिनेमाघर
हिंदी फ़िल्मों के प्रदर्शन पर रोक के बाद पाकिस्तानी सिनेमाघर सूने हो गए थे
पाकिस्तान में रहने वाले मेरे पीढ़ी के लोग जब हाई स्कूल में पढ़ते थे तो हिंदी फ़िल्म जगत में दिलीप कुमार,राज कपूर और देव आनंद के नाम का डंका बजता था. वहीं अभिनेत्रियों में नरगिस,मधुबाला, निम्मी और मीना कुमारी की धूम थी.

लाहौर के ज़्यादातर सिनेमाघर मैक्लोड रोड पर थे जहाँ हर शुक्रवार को नई फ़िल्में रिलीज़ होती थीं. पाकिस्तान में अपनी फ़िल्में भी बनती थीं लेकिन ज़्यादा कारोबार भारतीय फ़िल्मों का था.

काबुल तक का सफ़र
 जिस तरह पाकिस्तानी लोग 1960 में मुग़ल-ए-आज़म देखने के लिए भारतीय वीज़ा लेकर अमृतसर जाया करते थे, 1965 के बाद उन्होंने भारतीय फ़िल्में देखने के लिए काबुल जाना शुरू कर दिया
 

रविवार शाम को मैक्लोड रोड पर भारतीय फ़िल्मों के स्पेशल शो होते थे जहाँ अधिकतर जवान पीढ़ी के लोग नज़र आते थे और ये शो काफ़ी सस्ती टिकटों पर होते थे.

मैने और मेरे दोस्तों ने दिलीप कुमार की आन, राज कपूर की बरसात, देव आनंद की टैक्सी ड्राइवर और गुरु दत्त की आर-पार 60 के दशक में उस समय देखी थीं जब ये सालों पुरानी होकर सस्ते टिकट पर लगी हुई थीं.

डिस्ट्रीब्यूटरों के पास पुरानी हिंदी फ़िल्में सोने के अंडे की मुर्गी के समान थीं. दिलीप कुमार की दीदार हो या अंदाज़, राज कपूर की आवारा हो या बरसात, देव आनंद की बाज़ी हो या जाल, वी शांताराम की परछांई हो या दो आँखे बारह हाथ...हर फ़िल्म सोने की खान थी.

जब लगाओ,जहाँ लगाओ लोग देखने आएँगे और टिकट बिकेंगे.

राज-दिलीप-देव आनंद की तिकड़ी

बाज़ी का पोस्टर
पाकिस्तान में दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद काफ़ी लोकप्रिय थे

हाई स्कूल के लड़के देव आनंद और गुरु दत्त की फ़िल्में ज़्यादा अभिलाषा से देखते थे और कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ दिलीप कुमार और राज कपूर की फ़िल्मों के दीवाने थे.

फिर 1965 का ज़माना आ गया और भारत-पाक सीमा पर जंग छिड़ गई. इसके बाद पाकिस्तान के सिनेमाघरों में भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई.

ताशकंद समझौते के बाद आशा थी कि ये रोक समाप्त कर दी जाएगी पर ऐसा न हुआ और रोक जारी रही.

लेकिन दर्शक भी कहाँ चैन से बैठने वाले थे. जिस तरह वे 1960 में मुग़ल-ए-आज़म देखने के लिए भारतीय वीज़ा लेकर अमृतसर जाया करते थे, 1965 के बाद उन्होंने भारतीय फ़िल्में देखने के लिए काबुल जाना शुरू कर दिया.

लेकिन सिर्फ़ फ़िल्म देखने के लिए काबुल का रिटर्न टिकिट खरीदना सब लोगों के बस की बात न थी.

डीवीडी ने बदला बाज़ार

पोस्टर
वर्ष 2005 में लाहौर में मुग़ल-ए-आज़म दिखाई गई थी

सत्तर के दशक में फ़िल्मों के वीडियो कैसेट बनने लगे और सबसे पहले जो हिंदी फ़िल्में स्मगल होकर लाहौर पहुँची उनमें रोटी, कपड़ा और मकान, शोले और गुलज़ार की फ़िल्म आँधी शामिल थी.

उन दिनों एक फ़िल्म को ट्रांस्फ़र करने के लिए तीन बड़े-बड़े कैसेट ज़रूरी थे. बाद में जब एक ही कैसेट पर सारी फ़िल्म ट्रांस्फ़र होने लगी तो भारतीय फ़िल्मों का आना आसान हो गया.

1980 के लगभग जब इलेक्ट्रॉनिक सामान कुछ सस्ता हो गया तो दरमियानी आमदनी वाले घरों में भी टीवी और वीडियो प्लेयर नज़र आने लगे और हिंदी फ़िल्मों की कैसेट घर-घर चलने लगीं.

ये अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, शशि कपूर, रेखा, ज़ीनत अमान, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल का ज़माना था.

इससे पहले के पंद्रह वर्षों में जो कुछ हिंदी फ़िल्म जगत में हो चुका था उससे पाकिस्तानी दर्शक अंजान थे. नंदा, साधना, तनुजा, आशा पारिख, मुमताज़ और माला सिंहा को हम लोगों ने कभी बड़ी स्क्रीन पर न देखा था.

और हमें मनोज कुमार, फ़िरोज़ खान, राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र की जवानी का दृश्य बड़ी स्क्रीन पर देखने का मौका भी नहीं मिला- सिवाय उन लोगों को जो केवल फ़िल्म देखने के लिए दुबई का सफ़र कर सकते थे.

या फिर कारोबारी सिलसिले में ब्रिटेन या अमरीका जाते रहते थे.

आजकल बड़ी स्क्रीन वाले टीवी चल निकले हैं और डीवीडी को बड़ी स्क्रीन पर दिखाने के लिए घरेलू प्रोजेक्टर भी मिल जाते हैं.

पाकिस्तान की नई पीढ़ी शाहरुख खान, अजय देवगन और ऋतिक रोशन की फ़िल्मों को बड़ी स्क्रीन पर घर बैठे देख लेती है.

और अब उन्हें शायद इसकी भी परवाह नहीं कि पाकिस्तान में हिंदी फ़िल्मों को दिखाए जाने की इजाज़त दी जाती है या नहीं.

 
 
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