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सोमवार, 05 फ़रवरी, 2007 को 10:05 GMT तक के समाचार
 
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भारत में क्षेत्रीय सिनेमा की भूमिका
 

 
 
सत्यजीत रे
सत्यजीत रे की पथेर पांचाली ने भारत को विश्व सिनेमा में पहचान दिलाई
कलात्मक विधा के रूप में भारतीय सिनेमा की पहचान क्या है- बॉलीवुड या क्षेत्रीय सिनेमा ?

ग्लोबलाइज़ेशन के मौजूदा दौर में यह सवाल, बॉलीवुड को भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ने वाले सिनेप्रेमियों या फिर ऐश्वर्या राय और शाहरुख ख़ान को भारत का राजदूत बताने वाले नेताओं और अफ़सरों को असमंजस में डाल सकता है.

सच्चाई ये है कि विश्व सिनेमा के मानचित्र पर भारतीय सिनेमा को स्थापित करने वाली पहली फ़िल्म सत्यजित राय की पथेर पांचाली (1955) थी जो विभूति भूषण बन्धोपाध्याय के कालजयी उपन्यास पर आधारित बंगाली भाषा की एक क्षेत्रीय फ़िल्म है.

1956 के अन्तरर्राष्ट्रीय कान समारोह में, पथेर पांचाली को एक हृदयस्पर्शी ‘मानवीय दस्तावेज़’ की संज्ञा दी गई. बाद में राय की फ़िल्म-त्रयी ( पथेर पांचाली (1955), अपराजितो (1956) और अपूर संसार (1959)) विश्व सिनेमा को भारतीय सिनेमा की देन मानी गई.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान

अडूर गोपालाकृष्णन
अडूर गोपालाकृष्णन मलायली सिनेमा के दिग्गज फ़िल्मकार हैं

सत्यजित राय के समकालीन रित्विक घटक और मृणाल सेन की कृतियां भी राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुईं हैं.

घटक की हर कृति में भारत विभाजन की त्रासदी को उप-कथानक अथवा कथावस्तु की पृष्ठभूमि के रूप में देखा जा सकता है- चाहे वो मेघे ढाका तारा (1960) सुबर्न रेखा (1962), अथवा तिसता एकती नदीर नाम (1973) हो.

आज के दौर में गौतम घोष, रितुपर्णो घोष और अपर्णा सेन सक्रिय सिनेकार हैं.

श्याम बेनेगल का मानना है कि सत्यजित राय के बाद आज के दौर में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सिनेकार केरल के अडूर गोपालाकृष्णन हैं जिनकी मुखामुखम (1984), आज़ादी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के अन्तर्विरोध, बिखराव व अस्मिता के संकट को दर्शाती है.

अपने पिछले 35 वर्षों के सिनेमाई कैरियर में अडूर ने मात्र 9 फ़िल्में बनाई हैं जो पिछले 60 वर्षों के किसी न किसी पक्ष को रेखांकित करती हैं. केरल के एक अन्य सिनेकार शाजी करुन की पिरवी (1988) ने 70 अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किये.

लोकप्रियता और व्यावसायिकता की कसौटी पर क्षेत्रीय सिनेमा के मुक़ाबले, मुंबई का हिन्दी सिनेमा (बॉलीवुड) नि:संदेह आगे रहा. पर कथानक, चरित्र विकास और चित्रांकन के नज़रिये से यह कभी भी क्षेत्रीय सिनेमा की गहराई हासिल न कर सका.

मराठी सिनेमा

श्वास
श्ववास को भारत की ओर से ऑस्कर के लिए नांमाकित किया गया

1930 के दशक से ही मराठी सिनेमा ने सामाजिक कुरीतियों, अन्याय और राजनैतिक भ्रष्टाचार के कथानकों पर फ़िल्में बनाईं.

व्ही शान्ताराम की कुंकू (1937) और मानूस (1939) नारी मुक्ति और वैश्याओं के उद्धार के कथानकों का निर्वाह ऐसी सिनेमाई शैली में करती हैं जो समय से आगे कही जा सकती हैं और सिनेमाई भाषा के लिहाज़ से किसी भी तरह यूरोपीय सिनेमा से द्वयं न थीं.

मराठी सिनेमा में इस समय जब्बार पटेल और अमोल पालेकर जैसे सिद्धहस्थ सिनेकारों के अलावा नई पीढी के संदीप सावंत जैसे सिनेकार हैं जो महत्वपूर्ण फ़िल्में बना रहें हैं.

विचारों का दिवालियापन

1950 के दशक में हिन्दी सिनेमा की अगुआई राजकपूर, बिमल राय, महबूब ख़ान और गुरूदत्त ने की. 1960 के दशक तक हिन्दी सिनेमा के कथानकों में दमखम था.

पर धीरे धीरे विचारों का दिवालियापन नज़र आने लगा और हिन्दी सिनेमा मनोरंजन के एक पिटे-पिटाये फ़ार्मूले में बंध गया. 1970 के दशक में नई धारा के श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलाणी और सईद अख़्तर मिर्ज़ा सरीखे सिनेकारों उसे उबारने की कोशिश की पर 1980 के दशक के अन्त तक आते-आते ये आन्दोलन बिखर गया.

1990 के दशक में बम्बइया सिनेमा का नया नाम ‘बॉलीवुड’ प्रचलन में आया. भारत के प्रसार माध्यमों में विकसित हो रही ‘बॉलीवुड’ कार्यक्रमों की होड़ ने, धीरे-धीरे क्षेत्रीय सिनेमा की चर्चा को फ़िल्म महोत्सवों तक सीमित कर दिया.

आज चौबीस घंटों तक चलने वाले टेलीविज़न चैनलों और समाचार पत्रिकाओं में बॉलिवुड चर्चाओं की भरमार है जबकि क्षेत्रीय सिनेमा पूरी तरह उपेक्षित है.

स्वर्ण युग

उपेक्षा के बावजूद
 21वीं सदी के इस प्रारंभिक दौर में अगर इमानदारी और समग्रता से समूचे भारतीय सिनेमा का जायज़ा लिया जाय तो सरकार और प्रसार माध्यमों की उपेक्षा के बावजूद भारत का क्षेत्रीय सिनेमा न केवल ज़िन्दा रहा है बल्कि उसने नई ज़मीन तो़ड़ने की जद्दोजहद भी जारी रखी है.
 

पर बीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर से आज तक भारत के कई राज्यों में क्षेत्रीय सिनेमा की जड़े गहरी हुई हैं. 1960 और 1970 के दशक को भारत के क्षेत्रीय सिनेमा का ‘स्वर्ण-युग’ कहा जा सकता है जब बंगाल के बाद केरल, कर्नाटक, असम और उड़ीसा जैसे राज्यों में नई धारा का सिनेमा विकसित हुआ.

कन्नडा सिनेमा में गिरीश कारनाड, ब.व.कारंत व गिरीश कासरावल्ली ने अपनी फ़िल्मों से एक नई ‘सांस्कृतिक क्रांति’ पैदा की.

एक नाटककार के रूप में तुग़लक़ औऱ हयवदन से ख्याति प्राप्त कारनाड और कारंत ने वंशवृक्ष (1972) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जित किया. पर कन्नडा सिनेमा में गिरीश कासरावल्ली की जगह वही है जो केरल में अडूर गोपालाकृष्णन की है.

कर्नाटक के एक और सिनेकार गणपति वेंकटरमण अय्यर ने कन्नडा के अतिरिक्त संस्कृत भाषा में आदि शंकराचार्य (1983) और भगवत गीता (1992) बनाई.

असम के सर्वाधिक चर्चित सिनेकार जहानू बरुआ की हलोदया चौराये बाओधन खाय (1987) और खगोरोलोये बोहु दूर (1994) जैसी फ़िल्में सामाजिक भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और राजनैतिक दुष्चक्र में फंसे विपन्न व निम्न मध्यम वर्ग के जीवन संघर्ष को दर्शाती हैं.

उड़िया भाषा के सिनेकार नीरद महापात्र की माया मिरगा (1983) अर्थ-संघर्ष के बीच टूटते-बिखरते एक संयुक्त परिवार की कहानी है.

क्षेत्रीय सिनेमा की उपेक्षा

पहेली
मीडिया में क्षेत्रीय सिनेमा की तुलना में हिंदी सिनेमा ज़्यादा चर्चा में रहता है

21वीं सदी के इस प्रारंभिक दौर में अगर इमानदारी और समग्रता से समूचे भारतीय सिनेमा का जायज़ा लिया जाय तो सरकार और प्रसार माध्यमों की उपेक्षा के बावजूद भारत का क्षेत्रीय सिनेमा न केवल ज़िन्दा रहा है बल्कि उसने नई ज़मीन तो़ड़ने की जद्दोजहद भी जारी रखी है.

इसके विपरीत लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा अपनी सार्थकता और अस्मिता पूरी तरह खो चुका है.

विडम्बना ये है कि वह अपने नाम तक की रक्षा नहीं कर पाया और उसने ‘हॉलीवुड’ की तर्ज़ में ‘बॉलीवुड’ कहलाया जाना स्वीकार कर लिया.

क्या ऐसे सिनेमा का अस्तित्व बना रह सकता है ? इस तरह की पलायन वादी फ़िल्मों से भारत के फ़िल्म निर्माता और सिनेकार पर्याप्त विदेशी मुद्रा तो कमा रहे हैं. पर क्या ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कोई सम्मान या उंचा मंच प्रदान कर रही हैं ?

 
 
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