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शनिवार, 03 फ़रवरी, 2007 को 11:39 GMT तक के समाचार

जयप्रकाश चौकसे
लेखक और स्तंभकार

सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन है या सामाजिक दस्तावेज़?

भारतीय कथा फ़िल्म के जनक दादा फाल्के ने भारत में अंग्रेज़ सरकार द्वारा स्थापित पैरियर कमेटी के सामने 1927 में वक्तव्य दिया था कि आने वाले समय में फ़िल्म निर्माण पर व्यय बढ़ता जाएगा और कथा में सामाजिक सरोकार घटता जाएगा.

उनका यह भय काफ़ी हद तक सच साबित हुआ लेकिन वे अजब-गज़ब भारत की चौंका देने की शक्ति को आँकने में चूक गए.

उन्होंने ये कल्पना नहीं कि थी कि जब केवल ‘मनोरंजन के लिए मनोरंजन’ के दौर की ‘धूम’ है, ऐसे समय में नागपुर जैसे शहर का मध्यमवर्गीय युवा राजकुमार हीरानी, ‘मुन्नाभाई’ के ज़रिए गाँधी के मूल्यों का शंखनाद कर देगा.

और प्रभाव ऐसा कि उस फ़िल्म में नायक की भूमिका करने वाले साधारण से कलाकार पर क़ानून का शिकंजा ढीला सा पड़ने लगेगा.

दरअसल भारत की विविधता हर कालखंड में उसके सिनेमा में भी दिखती रही है. जिस कालखंड में शांताराम ने दुनिया ना माने, आदमी और पड़ोसी जैसे सार्थक सफल फ़िल्मों का प्रदर्शन किया, उस कालखंड में फ़ार्मूले के आदिगुरु शशधर मुखर्जी ने बाम्बे टॉकीज से देविका रानी को निष्कासित करके किस्मत, बंधन, कंगन और झूला जैसी विशुद्ध मनोरंजक फ़िल्में बनाई.

मनोरंजन भी, सामाजिक दायित्व भी

भारतीय सिनेमा की एक अन्य विशेषता यह है कि मनोरंजन के आठ दशकों के साथ सामाजिक सोद्देश्यता के दो रेशे मिलकर मनोरंजन की चादर बुनी जाती रही है.

फूहड़ से फूहड़ फ़िल्मों में भी कोई छोटा सा दृश्य कमाल का बन जाता है, मसलन शम्मी कपूर द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘बंडलबाज़’ को लीजिए.

फ़िल्म में जिन्न बने शम्मीकपूर को नायक राजेश खन्ना के साथ कुछ क्षणों के लिए आम आदमी की तरह पहाड़ पर चढ़ना होता है तो जिन्न कहता है कि आम आदमी होना कितना तकलीफ़देह है.

इस रेशों की मिलावट के दूसरे पहलू को देखिए कि बिमल रॉय और गुरुदत की गंभीर फ़िल्मों में अवाम के मनोरंजन के ढेर से दृश्य और गीत होते थे.

‘‘सर जो तेरे चकराए या दिल डूबा जाए’’, प्यासा जैसे गंभीर फ़िल्म का गीत है. बिमल राय की मधुमति जैसी दिलकश जन्म-जन्मांतर की प्रेम कथा में जॉनी वॉकर का एक गीत है, ‘‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा, हम थोड़ी सी पी के बहके सबने देखा.’’

गुरुदत के प्रिय कलाकार जॉनी वॉकर थे जिन्हें उन्होंने सभी फ़िल्मों में भूमिकाएं दी. गुरुदत की गंभीर चदरिया में जॉनी वॉकर के हास्य का रेशा अवश्य रहता था और टाट के पर्दानुमा रची गई फूहड़ फ़िल्मों में भी गंभीर बातें रहतीं रही हैं.

मणीरत्नम की ताज़ा फ़िल्म ‘गुरू’ में, जो भारत की अर्थनीति के ‘लेफ़्ट’ से प्रारंभ होकर ‘मध्य’ से गुजरते हुए ‘राइट’ होने तक की महत्वपूर्ण बात कहती है, नायक शेयरधारकों होल्डर्स से कहता है कि इस बैठक में आने के लिए आपको बपोटिया छोड़ना पड़ा इसका मुझे ख़ेद है.

‘बपोटिया’ का अर्थ गुजरात में दोपहर की नींद है परंतु सब जानते हैं कि इसका आशय पत्नी से छुपाकर दोपहर में प्रेमिका के साथ सहवास है. इसी फ़िल्म में मल्लिका शेरावत भी इस्तांबुल में नाच रही हैं.

यह तो हम अति गंभीर सामाजिक दस्तावेज़-नुमा फ़िल्मों और दूसरे किनारे पर निहायत ही फूहड़ फ़िल्मों की बात कर रहे हैं.

परंतु मध्यममार्गीय राजकपूर ने तो आधी हकीकत आधे फसाने का सिनेमाई मुहावरा ही प्रस्तुत किया. इसी सुर को ‘माध्यम’ से गाया ऋषिकेश मुखर्जी ने जिनकी श्रेष्ठतम फ़िल्म ‘आनंद’ में राजेश खन्ना और नवोदित अमिताभ के होते हुए भी सबसे ज़्यादा हंसाया और रुलाया जॉनी वॉकर के पात्र ने.

विविध सिनेमा

दरअसल विविधता की जीवन ऊर्जा वाले अजब गज़ब भारत में मनोरंजन की कोई एक सर्वसम्मत परिभाषा नहीं है.

उसका सिनेमा भी विविध समुदाय के लोगों के लिए कलाइडोस्कोप नुमा मनोरंजन गढ़ता है जिसमें मनोरंजन के साथ सामाजिक सोद्देश्यता के रेशे भी शामिल रहते हैं.

शांताराम की ‘दहेज’ (1951) के प्रदर्शन के बाद अनेक प्रांतों ने दहेज विरोधी क़ानून बनाए. राजकपूर की ‘प्रेम रोग’ में विधवा के विषय में कई लोगों का नज़रिया बदला. यश चोपड़ा की ‘वीरज़ारा’ और उसके पहले रणधीर कपूर की ‘हिना’ देखकर दोनों देशों के अनेक लोगों की आँख से आसू बहे हैं जिनकी कभी कोई सरहद नहीं होती.

मनोरंजन और सामाजिक सोद्देश्यता गलबाही करती नज़र आती है. आशुतोष और आमिर की ‘लगान’ में जिसमें क्रिकेट महज़ बहाना है.

असल बात कही गई है निहत्थे आम आदमी के जीवन संग्राम में केवल साहस के बल पर कूद जाने की. इसी आम आदमी के और भी छोटे स्वरूप हैं- गूंगे बहरा गंवई गाँव का ‘इक़बाल’ राष्ट्रीय नायक के रूप में उभरता है कुकनूर की फ़िल्म में.

हम एक सरल सी बात को अनदेखा नहीं कर सकते कि केवल मनोरंजन प्रदान करने वाली फ़िल्में भी समाज की बहुत बड़ी सेवा करती हैं.

‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘पड़ोसन’ और ‘अंगूर’ देखकर जीवन की उदास शामें रंगीन हो जाती है.फूहड़ सी बंटी-बबली के ‘कजरारे’ ने कितना सुख दिया है.

क्या यह समाज की सेवा नहीं है? दादा फाल्के से लेकर आदित्य चोपड़ा तक के सिनेमा में मनोरंजन के रेशों के साथ सामाजिक सत्य के रेशे शामिल रहे हैं और रहेंगे.