BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
 
गुरुवार, 05 जुलाई, 2007 को 23:15 GMT तक के समाचार
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
कूप मंडूक
 
मुहावरे की कथा

एक था मंडूक यानी मेंढक.
अपने पूरे परिवार के साथ समुद्र में रहा करता था. जीवन सुख से ही कट रहा था.

लेकिन सुख भी बहुत दिनों तक रहे तो नीरसता होने लगती है. लगता है जैसे जीवन में कुछ दिलचस्प नहीं हो रहा. सो मंडूक रोमांच की तलाश में निकल पड़ा समुद्र से बाहर. पता नहीं क्यों उसने ज़मीन की ओर जाना तय किया. गहरा समुद्र उसे रोमांचक नहीं लगा.

जमीन पर उछलते कूदते वह बहुत दूर चला आया. उसने ज़मीन पर तरह-तरह की चीज़ें देखीं. सब कुछ उसे रोमांचित कर रहा था. चलते-चलते वह अचानक ही एक कुँए में गिर पड़ा.

पानी की उसे आदत थी. इसलिए पानी में गिरना एकबारगी अच्छा ही लगा. लेकिन इस पानी का स्वाद उसे ज़रा भी नहीं भाया. अजीब सा मीठापन था इस पानी में. अभी वह स्वाद से उबर पाया था कि उसने देखा कि उसके आसपास उसकी तरह के कई मंडूक हैं. बस उनकी शक्ल सूरत थोड़ी अलग थी.

मंडूक

सब उसकी ओर उत्सुकता से देख रहे थे. उसने बताया कि वह ग़लती से यहाँ गिर पड़ा है. कुछ मंडूक इधर-उधर चले गए लेकिन एकाध को उत्सुकता ज़्यादा थी सो वे वहीं उसके पास टिके रहे.

अपने को चतुर समझने वाले मंडूक ने पूछा, “यह तो ठीक है कि तुम ग़लती से गिर पड़े लेकिन यह तो बताओ कि तुम आ कहाँ से रहे हो, कहाँ है तुम्हारा घर?”

समुद्र से आए मंडूक ने कहा, “मैं तो समुद्र में रहता हूँ.”

“समुद्र? वह कैसा होता है?”

“समुद्र में भी पानी होता है. बस वह बड़ा होता है.”

“कितना बड़ा?” कुँए के उत्साही मंडूक ने पूछा और छपाक से एक छलाँग लगाई और कहा, “इतना बड़ा?”

समुद्र मंडूक को हँसी आई लेकिन उसने संयत रहते हुए कहा, “नहीं, इससे भी बड़ा.”

अब कुँए के मंडूक को थोड़ा आश्चर्य हुआ, उसने पूछा, “इससे भी बड़ा?” और फिर उसे झटपट तीन बार छगाँग लगाई, छपाक! छपाक! छपाक!

“तो क्या इतना बड़ा?”

समुद्री मंडूक को समझ में नहीं आया कि वह क्या कहे...पहले तो उसने सोचा कि कुँए के उस बेचारे मेंढक को बताए कि समुद्र वास्तव में कितना बड़ा होता है लेकिन उसे लगा कि इस कूप-मंडूक को वह चाहे तो भी नहीं समझा सकता कि समुद्र कितना बड़ा होता है क्योंकि वह उसकी कल्पना में समाएगा ही नहीं.

समुद्री मेंढक ने कूप-मंडूक को समुद्र का आकार बताने का ख़याल मन से निकाला और उस कुँए से बाहर निकलने के उपाय सोचने लगा.

 
 
चित्रांकन - हरीश परगनिहामेरी जगह
वह कितना कुछ सह रहा था पता ही नहीं चलता था... वीरा चतुर्वेदी की कहानी.
 
 
चित्रांकन - हरीश परगनिहाचोर: कुछ लघुकथाएँ
तरह-तरह के चोरों पर विमल कुमार की तरह-तरह की लघुकथाएँ.
 
 
 चित्रांकन- हेम ज्योतिकासस्पेंडेड औरत
एक औरत के जीवन का सच बयान करती जया जादवानी की कहानी.
 
 
टेढ़ी खीर
एक दृष्टिहीन को समझाते हुए कि खीर कैसी होती है यह मुहावरा बन गया.
 
 
चित्रांकन - हरीश परगनिहान तीन में न तेरह में
पढ़िए 'न तीन में न तेरह में' मुहावरे के बनने की कथा.
 
 
चित्रांकनः हरीश परगनिहाएक लोककथा
एक लड़के के सवाल में छिपा था प्रकृति के संतुलन का राज़. एक लोककथा.
 
 
चित्रांकन - हेम ज्योतिकाहमहुँ मेला देखे जाबै
बुढ़ापे और खुमारी के बीच आत्मसम्मान पर राजेश कुमार मिश्र की कहानी.
 
 
सुर्ख़ियो में
 
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
 
  मौसम |हम कौन हैं | हमारा पता | गोपनीयता | मदद चाहिए
 
BBC Copyright Logo ^^ वापस ऊपर चलें
 
  पहला पन्ना | भारत और पड़ोस | खेल की दुनिया | मनोरंजन एक्सप्रेस | आपकी राय | कुछ और जानिए
 
  BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>