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सोमवार, 19 नवंबर, 2007 को 10:09 GMT तक के समाचार
 
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हो सकने और न होने के बीच
 

 
 
हरिवंश राय बच्चन
क्या भूलूं…’ लोकप्रियता के लिहाज से लगभग ‘मधुशाला’ जैसा ही इतिहास रच सकी
डॉक्टर हरिवंशराय बच्चन के इस जन्म शताब्दी वर्ष में यह दोहराना ज़रूरी है कि ‘मधुशाला’, ‘निशा निमंत्रण’ आदि के माध्यम से कविता को भारतीय जनमानस का हिस्सा बनाने वाले इस गायक की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण तब थी, उतनी ही या उससे अधिक अब है.

आज भौतिक रूप से वे भले ही दूर जा चुके हों किंतु अपनी रचनाओं के साथ हमारे बीच पूरी तरह मौजूद हैं.

‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ (1969), ‘नीड़ का निर्माण फिर’ (1970), ‘बसेरे से दूर’ (1978) और ‘दशद्वार से सोपान तक’ (1985) नामक चार खंडों में प्रकाशित उनकी आत्मकथा छ्पने के साथ ही प्रीतिकर-मानक रचना की तरह अपना ली गई थी.

इसकी बढ़ती गई लोकप्रियता प्रमाण है कि कालांतर में वह कालजयी कृति सिद्ध हो सकेगी.

बच्चनजी अन्य साहित्यिक उद्यमों की भांति अपनी आत्मकथा में भी सरल-सुबोध, प्रसन्न, प्रभावी भाषा का भरपूर तालमेल अपनी सूझबूझ, आंतरिकता और सृजनशीलता के साथ बिठाने में समर्थ हुए थे.

लगभग दो दशकों की अवधि में पूर्ण की गई यह रचना उपन्यास की भांति रोचक और तारतम्ययुक्त बन सकी.

क्या भूलूँ..

लेखक ने इस कृति को अपने समय, समाज और परिवार से तो जोड़े रखा ही, सोलहवीं सदी के दो मानक ग्रंथों का भी आदर्श सामने रखा- फ़्रांसीसी गद्यकार मानतेन का आत्मकथ्य और अपने प्रिय कवि तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’.

जहाँ मानतेन की स्थापना उन्हें इतनी सार्थक जान पड़ी कि उन्होंने ज़रूरी समझा कि अपनी कथा के प्रत्येक खंड में उसे उद्धत करें और जिसका एक अंश यहां भी देना उपयोगी होगा: "पाठको, यह किताब ईमानदारी से लिखी गई है…मैं अपने गुण-दोष जग-जीवन के सम्मुख रखने जा रहा हूँ पर ऐसी शैली में जो लोक-शील से मर्यादित हो."

हरिवंश राय बच्चन
बच्चनजी का कहना था कि उनकी कविता मोह से आरंभ हुई थी और मोहभंग पर खत्म हुई

वहीं तुलसी कृत ‘मानस’ की महाकाव्यात्मक संरचना उनकी आधारभूमि बनी, वैसे ही जैसे ‘विनय-पत्रिका’ उनकी ‘प्रणय-पत्रिका’ के लिए हुई थी.

एक भव्य और विशाल इमारत की पक्की-पुख्ता नींव किस तरह डाली जाती है, बताने के लिए जैसे हम ‘मानस’ के ‘बालकांड’ और ‘अयोध्याकांड’ का प्रमाण देते हैं वैसे ही इस महत्वाकांक्षी आयोजन के आरंभ में ही मनसा के कुल-शील की विशद प्रस्तावना के अनंतर चम्पा-कर्कल, श्यामा- प्रकाशो जैसे अनेक मार्मिक चरित्रों की निर्मिति से इसकी विश्वसनीयता रेखांकित होती है.

‘पूत के पांव पालने में’ वाली कहावत इस तरह भी सही उतरी कि ‘क्या भूलूं…’ प्रकाशन और लोकप्रियता के विचार से लगभग ‘मधुशाला’ जैसा ही इतिहास रच सकी.

दूसरे खंड ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में भी ताप और आवेग वैसा ही बना रहा जैसा कि तीसरे-चौथे खंडों में सघनता की कमी दिखी जिसका कुछ कारण यदि लेखन-काल के बीच में पड़नेवाला अंतराल रहा होगा, तो कुछ भूमिका धारावाहिक लेखन के प्रति पाठकों की बढ़ती अपेक्षाओं ने भी निभाई होगी.

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पाठकीय थकान की छाया कभी-कभी लेखकीय ऊर्जा के भी आड़े आती है.

जो काम लेखक ने बड़े मनोयोग से शुरू किया हो, उसे ज्यों-त्यों निबटाने की हड़बड़ी और दबाव रचनात्मकता में बाधा डालती है.

मोह से मोहभंग

संयोगवश, बच्चनजी के साथ ऐसा न होकर एक और ही बात हुई जिसे कविता विषयक उनके इस आत्मस्वीकार से जोड़ा जाना चहिए कि- "मेरी कविता मोह से आरंभ हुई थी और मोहभंग पर खत्म हुई."

 सच तो यह है कि अपने अदेवत्व, अपनी मानवता, मानवीय अपूर्णता की जितनी अनुभूति मैं आज कर रहा हूँ उतनी मैंने पहले कभी नहीं की
 
हरिवंशराय बच्चन

इस बात को ‘आत्मकथा’ के अंत में आए इस उदगार से मिला कर देखा जाए तो गुत्थी कुछ सुलझेगी: "मैं तो उस (सफ़र) पर चलते-चलते अपनी आयु के 77 वर्ष 7 महीने 7 दिन पर पहुँच गया हूँ, जब महाभारत के अनुसार मनुष्य देवकोटि में चला जाता है.

व्यासजी महाराज की आत्मा मुझे क्षमा करे, मैं तो ऐसे किसी चमत्कारी परिवर्तन का अनुभव नहीं कर रहा हूँ"

…सच तो यह है कि अपने अदेवत्व, अपनी मानवता, मानवीय अपूर्णता की जितनी अनुभूति मैं आज कर रहा हूँ उतनी मैंने पहले कभी नहीं की.

ऐसा प्रतीत होता है कि इसी मानसिकता के चलते कविता के प्रति बच्चनजी के मोहभंग का विस्तार गद्य-लेखन के प्रति भी उनके मोहभंग में हुआ.

जहाँ तक सार्वजनिक जानकारी है, चौथे खंड के बाद उन्होंने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया, उलटे लेखनमात्र से विरक्त होते गए.

अधूरी आत्मकथा

इस कथन की पुष्टि बाह्य प्रमाणों के अतिरिक्त ‘आत्मकथा’ के आरंभिक और समापक लेखकीय वक्तव्यों से भी होती है.

आरंभ में उनका विचार था कि "जब तक मैं अपने अंतर में निरंतर उठती स्मृतियों को चित्रित न कर डालूँगा, तब तक मेरा मन शांत नहीं होगा."

 लंबा जीवन तो सौभाग्यवश उन्हें मिल सका था, काश, मन और स्वास्थ्य ने भी साथ दिया होता.… तो कौन जाने, उन जैसे विचारशील आत्मस्थ लेखक के परिपक्व सोच-विचार का लाभ हिंदी साहित्य को मिल पाता
 

फिर समापन करते हुए बताया- "मैं कलम पर हाथ रखकर कहता हूँ कि मैं जो कुछ कहूँगा सत्य कहूँगा और सत्य के अतिरिक्त अगर कुछ कहूँगा तो फिर ॠत (सच) कहूँगा."

इन दोनों स्थितियों के बीच अंतराल बढ़ता चला गया. ‘सत्य’ और ‘ॠत’ का द्वंद्व जैसे-जैसे असह्य होने लगा, वैसे-वैसे गद्य-लेखन से भी वे विरक्त होते गए.

अन्तत: अपनी सुदीर्घ महागाथा उन्होंने ‘सुंदरकांड’ पर ही समाप्त कर दी.

परिणाम यह हुआ कि जो आत्मकथा विवादित होने के बावजूद, उत्तरकांड तक पहुँचकर पूर्ण रचना हो सकती थी, वह किन्हीं अर्थों में अधूरी रह गयी.

काश!...

लंबा जीवन तो सौभाग्यवश उन्हें मिल सका था, काश, मन और स्वास्थ्य ने भी साथ दिया होता.… तो कौन जाने, उन जैसे विचारशील आत्मस्थ लेखक के परिपक्व सोच-विचार का लाभ हिंदी साहित्य को मिल पाता.

इसकी बात चलने पर प्राय: वे यों ही टरका दिया करते थे—"कुछ न अब ज़िन्दगी में करने को, खूब फ़ुरसत मिली है मरने को."

इस टिप्प्णी के अंत में, यह बताने का लोभ मैं नहीं संवरण कर पा रहा कि वह आयोजन संपूर्ण हो सके.

इसका कुछ प्रयास मैंने अपने निजी स्तर पर किया तो था, जिसकी चर्चा का अवसर यहाँ नहीं, पर अंतत: यही मान चुप हो जाना पड़ा कि ‘जो हो सकता था और जो नहीं हुआ’ के बीच वह अंतराल हमेशा रहा है और रहेगा.

जिसे स्वयं बच्चनजी ने बड़ी खूबसूरती के साथ इन पंक्तियों में बता दिया है:

पूर्ण कर दे वह कहानी,
जो शुरू की थी सुनानी,
आदि जिसका हर निशा में, अंत चिर अज्ञात.
साथी, सो न, कर कुछ बात.

अधूरी रह जाने के बावजूद जो कृति असंख्य पूर्ण की जा चुकी कृतियों से कहीं अधिक पूर्ण और संतोषप्रद सिद्ध हुई है.

उसके रचनाकार की बहुतेरी जन्म-शताब्दियां आगे भी मनाई जाती रहेंगी, ऐसी आशा करना स्वाभाविक है.

 
 
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