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बुधवार, 30 अप्रैल, 2008 को 11:13 GMT तक के समाचार
 
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सचिन पायलट के साथ-मुलाक़ात
 

 
 
सचिन पायलट
एक मुलाक़ात में इस बार के ख़ास मेहमान हैं बेहद समझदार, युवा और छोटी सी उम्र में सार्वजनिक जीवन में खूब नाम कमाने वाले सचिन पायलट.

सचिन एक युवा राजनेता हैं, चर्चित राजनीतिक हस्ती स्वर्गीय राजेश पायलट के बेटे हैं और फिलहाल भारत की संसद के सदस्य भी हैं. आज की ख़ास मुलाक़ात इन्हीं के साथ, इन्हीं से जुड़े कुछ अनछुए सवालों पर...

सचिन सबसे पहले, मैने आपकी तारीफ में ये सब बातें कही. ये बातें आमतौर पर किसी राजनेता के साथ जोड़कर नहीं देखी जातीं. तो आप कैसे राजनीति में पहुँचे?

जो आपने मेरे बारे में तीन बातें कहीं. पहली बात समझदारी की तो कहना चाहूँगा कि इस पीढ़ी में काफ़ी लोग समझदार हैं. दूसरे, इस देश की आधे से ज़्यादा जनता मुझसे भी युवा है. मैं 30 साल का हूँ, जबकि देश की 54 फ़ीसदी आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है. बाकी मुझ पर ईश्वर का आशीर्वाद रहा. रही बात अच्छे दिखने की तो मेरा मानना है कि कोई सुंदर-बदसूरत नहीं होता, इंसान अच्छा-बुरा होता है.

जहाँ तक राजनीति की बात है तो राजनीति मेरे परिवार में रही. मेरी दिलचस्पी भी बचपन से ही राजनीति में थी. फिर कुछ ऐसे हालात बने, मेरे पिता राजेश पायलट साहब का निधन हुआ. बाद में पार्टी ने मुझे चुनाव लड़ने को कहा और जनता के प्रेम से मैं संसद में पहुँचा.

दुनिया के प्रतिष्ठित व्हार्टन स्कूल से आपने एमबीए किया. कभी मन में ये भी आया कि कुछ समय निजी क्षेत्र में नौकरी कर मोटा पैसा कमाया जाए. या फिर हालात ऐसे बने कि आपको सीधे राजनीति में आना पड़ा?

मैने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद गुडगांव स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ढ़ाई-तीन साल काम किया. फिर व्हार्टन में एडमिशन मिला और मैं एमबीए के लिए वहाँ चला गया. एमबीए के बाद की बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाई थी, लेकिन बहुत कुछ बहुत जल्द बदल गया.लेकिन ये बात ज़रूर है कि व्हार्टन में मेरे साथ पढ़ाई करने वाले मेरे दोस्त आज मुझसे कहीं अधिक पैसा कमा रहे हैं.

दिल पर हाथ रखकर बताना कि क्या उन दोस्तों में से लगभग सभी आपसे जगह बदलने को तैयार नहीं होंगे?

जो बहुत समझदार हैं शायद वो जगह नहीं बदलें. लेकिन जिन्हें बाहर से ये लगता है कि राजनीति बहुत अच्छी है, इसमें कुछ नहीं करना पड़ता. बस मंच पर खड़े हो जाओ, हाथ हिला दो, थोड़ा-बहुत भाषण, टीवी पर इंटरव्यु और गाड़ी चल जाती है. हकीकत ये नहीं है.

मैं राजनीति में हूँ और अपनी खुशी से हूँ. सबसे बड़ी बात है कि मैं संतुष्ट हूँ. मुझे लगा कि बचपन से मैने जो कुछ सीखा, जो मेरे अनुभव हैं उनका उपयोग इस पेशे में कर पा रहा हूँ.

बातचीत के इस सफ़र को हम आगे बढ़ाएँ. हम आपकी पसंद का गाना सुनना चाहेंगे?

मुझे ‘रंग दे बसंती’ फ़िल्म का गाना बहुत पसंद है.

ये फ़िल्म देखी थी आपने? आपको कैसी लगी?

बिल्कुल. ये फ़िल्म कुछ हटकर थी. विषय को जिस तरीके से फ़िल्माया गया था वह बेहतरीन था. कुल मिलाकर फ़िल्म काफ़ी अच्छी थी.

सचिन अभी आपने ये बताया कि आप बहुत युवा नहीं है और 54 फ़ीसदी लोग आपसे भी युवा हैं. लेकिन कई लोग मानते हैं कि आप इन युवा चेहरों का प्रतिनिधित्व करते हैं. आप इससे सहमत नहीं हैं?

 मैंने अपने पिता से काफ़ी कुछ सीखा. हालाँकि वो लंबे समय तक हमारे साथ नहीं रहे, लेकिन चंद वर्षों में जो कुछ देखने-सीखने को मिला, उसे मैने गाँठ बांधा है
 

नहीं. पूरी तरह से नहीं. मीडिया राजनीति से जुड़े लोगों की छवि बनाता है और कई बार ये छवि हकीक़त से काफ़ी अलग होती है. मेरा मानना है कि आदमी का व्यक्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि वह खुद क्या करता है और क्या कहता है और जिस ग्रामीण परिवेश से मैं आता हूँ वहाँ इस तरह की शब्दावली की कोई जगह नहीं है.

क्या आप इस बात से भी इत्तेफ़ाक नहीं रखते कि आप भारत के सबसे आकर्षक पुरुषों में से हैं?

नहीं. मेरा मानना है कि यह बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है. फिर भी जिस किसी ने मेरे बारे मैं ये बाते कहीं हैं मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूँ.

आप अपनी तारीफ़ से इतना असंतोष जाहिर क्यों करते हैं. आपको तो इनका लुत्फ़ उठाना चाहिए?

मैं ये कहना चाह रहा हूँ कि मुझे ऐसा नहीं लगता, लेकिन यदि किसी और को ऐसा लगता है तो यह मेरे लिए गर्व की बात है.

मुझे पक्का विश्वास है कि इन तारीफ़ों से आप मन ही मन बहुत खुश होते होंगे?

तारीफ़ किसको अच्छी नहीं लगती. लेकिन वो तारीफ़ जो आपको चने के झाड़ पर चढ़ाए उससे सचेत रहना चाहिए.

आपके पिता राजनीति में थे, मां राजनीति में हैं. आपकी राजनीतिक सोच में इनका कितना योगदान है?

देखिए. हर आदमी का अपना नज़रिया होता है और काम करने की अपनी शैली होती है. लेकिन ये बात भी स्वाभाविक है कि आप अपने आसपास परिवार से काफी कुछ सीखते हैं. मैंने अपने पिता से काफ़ी कुछ सीखा. हालाँकि वो लंबे समय तक हमारे साथ नहीं रहे, लेकिन चंद वर्षों में जो कुछ देखने-सीखने को मिला, उसे मैने गाँठ बांधा है.

चाहे वो बात करने का तरीका हो, ज़िदगी जीने का तरीका हो. लोगों को इज्ज़त सम्मान देना और अपनी जड़ों को न भूलना. ये कुछ बातें हैं जो मैने अपने परिवार से सीखी हैं.

अपनी पसंद का एक और गाना?

शाहरुख़ की फ़िल्म का गाना ‘ओम शांति ओम’ मुझे काफ़ी पसंद है. ‘कजरारे-कजरारे..’ भी मुझे काफ़ी पसंद है. सांवरिया फ़िल्म का गाना भी पसंद है. ‘बिन तेरे…’, ‘अल्लाह के बंदे..’ भी मन को भाते हैं.

राजेश पायलट के स्वभाव की वो कौन-सी बात थी जिसने आपको सबसे अधिक प्रेरित किया?

मेरे पिता की राजनीति की शुरुआत वायुसेना से हटने के बाद हुई. शुरुआती वर्षों में उन्होंने काफी संघर्ष किया. मेरे पिता कहा करते थे कि फौज में हमें बताया जाता था कि जो दिल में हो, उसे झट से बता देना चाहिए लेकिन राजनीति में बिल्कुल उल्टा है. यहाँ दिल, दिमाग और जुबान पर अलग-अलग बातें हैं.

उन्होंने इससे अलग करने की पूरी-पूरी कोशिश की. उन्होंने साफ़गोई बरतने की पूरी-पूरी कोशिश की. लोग उन्हें इसलिए भी पसंद करते थे कि वो दिल की बात कह देते थे, हालाँकि कई मर्तबा उन्हें इसका काफ़ी नुक़सान हुआ.

आप भी इस चीज़ पर अमल करने की कोशिश करते हैं?

जहां तक संभव हो, अमल करने की कोशिश करता हूँ. लेकिन मैं राजनीति में हूँ इसलिए थोड़ा देख संभल कर काम करना पड़ता है.

अच्छा अपने छात्र जीवन के बारे में कुछ बताएँ?

 मैं पहले भी अमरीका गया था लेकिन पढ़ने के लिए वहाँ जाने की बात अलग थी. अमरीका में बहुत स्वतंत्रता है, लेकिन ज़िम्मेदारियां भी उतनी ही हैं. खाना पकाना, रहना, धोना सब कुछ खुद करना होता है. इसके अलावा मैं जो कोर्स कर रहा था वह काफ़ी मुश्किल था. 60-70 देशों के छात्र आपके साथ पढ़ते हैं, तो उनसे काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है
 

मेरे पिता राजेश पायलट वायुसेना में थे. मैं और मेरी बहन दिल्ली के एयरफोर्स स्कूल में पढ़े. इसके बाद मैं दिल्ली के सेंट स्टीफंस स्कूल में पढ़ा. बीए ऑनर्स (इंग्लिश) किया और तीन साल कॉलेज में शानदार बीते और मैने इस समय का पूरा-पूरा लुत्फ उठाया.

जब पढ़ाई के सिलसिले में अमरीका गए तो कैसा अनुभव रहा?

मैं पहले भी अमरीका गया था लेकिन पढ़ने के लिए वहाँ जाने की बात अलग थी. अमरीका में बहुत स्वतंत्रता है, लेकिन ज़िम्मेदारियां भी उतनी ही हैं. खाना पकाना, रहना, धोना सब कुछ खुद करना होता है. इसके अलावा मैं जो कोर्स कर रहा था वह काफ़ी मुश्किल था. 60-70 देशों के छात्र आपके साथ पढ़ते हैं, तो उनसे काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है.

अच्छा, एक बात ईमानदारी से बताएँ कि व्हार्टन में दाखिला कैसे हुआ?

यही तो बात है कि राजनेता का परिवार चाहे कुछ भी करे, लोग हर काम को आशंका और सवालिया नज़र से देखते हैं. चलिए ये मान भी लें कि मैं कैसे भी व्हार्टन में पहुँचा, लेकिन वहाँ से पास होकर तो आया.

व्हार्टन से पढ़ाई के बाद नौकरियों के प्रस्ताव मिले होंगे. तो आप अमरीका में ही क्यों नहीं रुके?

इस बारे में मेरा अपने पिता से करार था कि पढ़ाई खत्म करके मैं भारत वापस लौटूंगा. ये अलग बात है कि जब मैं पढ़ ही रहा था तो उनकी दुर्घटना में मौत हो गई.

लेकिन मेरा मानना है कि अमरीका या दूसरे देशों में ऐसा ख़ास आकर्षण नहीं है. आखिर क्या नहीं है यहाँ. यहां दोस्त हैं, परिवार है, अच्छी नौकरियां हैं तो फिर बाहर जाने की क्या ज़रूरत है.

जब आप राजनीति में आए. पहली बार चुनाव, पार्टी की राजनीति. क्या बहुत मुश्किल था?

ये कहना गलत होगा कि सब कुछ बहुत आसान था और कोई चुनौती नहीं थी. लेकिन ये बात भी सच है कि सभी लोगों, पार्टी, कार्यकर्ताओं ने बहुत प्यार दिया और उत्साहवर्धन किया. इससे ही हमने सीखा कि राजनीति में जीवन कैसे जिया जाता है.

चूंकि ज़्यादातर राजनेताओं की छवि थोड़ा कम पढ़े-लिखे, ज़्यादा मज़बूत पृष्ठभूमि की नहीं है, जैसी आपकी है. राजनीति में इससे आपको कुछ फायदा मिलता है?

पढ़ाई किसी भी व्यक्ति की जीवन की पूँजी है. बाकी सब चीजों में उतार-चढ़ाव लगा रहता है. जहाँ तक राजनेताओं की पढ़ाई का सवाल है तो हमारी राजनीति में भी कई नेता बहुत पढ़े लिखे हुए हैं, मसलन जवाहरलाल नेहरू.

और बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई का राजनीति के दांवपेंच में कुछ लाभ?

नहीं सीधे तौर पर ऐसा नहीं है. लेकिन चीजों और मुद्दों को समझने और उनका विश्लेषण करने में मदद तो मिलती ही है. जब मैं युवा था मेरे पिता ने मुझसे कहा था कि जिंदगी में कुछ भी करो. लेकिन जो भी क्षेत्र चुनो, उसके लिए सबसे अच्छी पढ़ाई हासिल करो.

आप गाने के शौकीन तो हैं?

गाना गाने का मन बहुत करता है, लेकिन न सुर है न आवाज़ है, इसलिए गाने का शौकीन नहीं हूँ. हां गाना सुनने का शौकीन ज़रूर हूँ.

फ़िल्म देखने के शौकीन हैं?

हां फ़िल्में देखना मुझे पसंद है. जिनके बारे में सुनता हूँ कि ये अच्छी हैं मैं सिनेमा हॉल में जाकर देखता हूँ.

हालाँकि आखिरी फ़िल्म देखे हुए दो-तीन महीने हो गए होंगे. ये शायद एनिमेशन फ़िल्म थी. मैं अपने भतीजे-भतीजियों और कुछ पड़ोसियों के साथ फ़िल्म देखने गया था.

और हाल ही में हिंदी फ़िल्म कौन-सी देखी?

शायद तारे जमीं पर. बहुत अच्छी फ़िल्म थी. मुझे लगता है कि आमिर ख़ान ने लाजवाब अभिनय किया.

अच्छा एक निजी सवाल. आपने प्रेम विवाह किया है. क्या यह पहली नज़र का प्रेम था या..?

 मैं और मेरा परिवार सारा और उनके परिवार को लंबे समय से जानता था. मैं उनसे कई साल पहले मिला था, हम दोनों ने एक-दूसरे को समझा और फिर 2004 में हमने शादी कर ली
 

मैं और मेरा परिवार सारा और उनके परिवार को लंबे समय से जानता था. मैं उनसे कई साल पहले मिला था, हम दोनों ने एक-दूसरे को समझा और फिर 2004 में हमने शादी कर ली.

आपका एक बेटा भी है न. क्या नाम है?

जी हाँ. नाम आरन है. इसका मतलब है ‘ताक़त का पहाड़’.

एक शिकायत जब सारा आरन के साथ लोधी गार्डन जाती हैं तो आप उनके साथ क्यों नहीं दिखते?

ये सवाल सारा भी मुझसे शुरू-शुरू में पूछती थी. दरअसल, मुझे वॉक का शौक नहीं है. हां कभी-कभी मैं उनके साथ जाता हूँ. लेकिन मुझे पत्नी से इसकी छूट मिली है.

पत्नी से और किस-किस चीज़ की छूट मिली है?

बस इससे ज़्यादा छूट नहीं मिली है.

लेकिन आप बहुत फिट हैं. क्या काफी एक्सरसाइज करते हैं?

सच कहूँ तो मैं कभी-कभार ही एक्सरसाइज करता हूँ. हाँ, खाने का विशेष ख़्याल रखता हूँ.

और पत्नी की क्या ख़ास बात पसंद है?

मेरी पत्नी सारा चीजों को समझने वाली महिला हैं. मेरी जीवनचर्या को समझना, देर-सबेर लोगों से मिलना, घर से बाहर रहना. उन्हें पता है कि ये चीजें मेरे लिए ज़रूरी हैं.

मैं मानता हूँ कि राजनेता से ज़्यादा उनका परिवार बलिदान देता है. राजनेता चाहे महिला हो या पुरुष उनके जीवनसाथी राजनीतिक करियर में अहम भूमिका निभाते हैं.

पसंदीदा अभिनेता?

कई हैं, लेकिन आमिर बहुत पंसद है.

कभी फ़िल्मों में काम करने का प्रस्ताव मिला?

नहीं, लेकिन अगर आपके पास कुछ ऐसा हो तो बताएं. फ़िल्मों कुछ समय काम किया जा सकता है.

और पसंदीदा अभिनेत्री?

नरगिस, मधुबाला. आजकल भी कई अभिनेत्रियां जो अच्छा अभिनय कर रही हैं, लेकिन नरगिस, मधुबाला जैसी नहीं हैं.

आपकी ज़िदगी का सबसे खुशनुमा दिन?

मुझे लगता है कि पहली बार पिता बनना. इसे व्यक्त तो नहीं किया जा सकता और निश्चित तौर पर ये मेरी जिंदगी का सबसे खुशनुमा दिना था.

आप पिता बनने का लुत्फ़ उठाते हैं?

हाँ मैं कोशिश करता हूँ. मैं मां तो नहीं बन सकता, लेकिन मुझे बेटे के साथ समय बिताना अच्छा लगता है. मुझे लगता है कि परिवार में जो अपनापन होता है, उसका कोई मुक़ाबला नहीं. दुनिया में सब कुछ छिन जाता है तो अपने ही काम आते हैं. अपनों को संजोने के लिए कुछ प्रयास करने होते हैं और ये प्रयास प्यार से ही संभव हो पाता है.

आप राजनीति में हैं. लोग राजनेताओं को उतनी इज्ज़त नहीं देते जिसके वे हक़दार हैं, कैसा लगता है?

 मैं मां तो नहीं बन सकता, लेकिन मुझे बेटे के साथ समय बिताना अच्छा लगता है. मुझे लगता है कि परिवार में जो अपनापन होता है, उसका कोई मुक़ाबला नहीं. दुनिया में सब कुछ छिन जाता है तो अपने ही काम आते हैं. अपनों को संजोने के लिए कुछ प्रयास करने होते हैं और ये प्रयास प्यार से ही संभव हो पाता है
 

एक बात तो सच है कि जो लोग राजनेताओं को इज्जत नहीं दे रहे हैं, उसकी कोई न कोई वजह है. राजनेताओं को इसका आत्ममंथन करना होगा. राजनेताओं की जो छवि है. जो कुछ हम कहते हैं और करते हैं उसका लोगों के दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ा है.

लेकिन मेरा मानना है कि अब धीरे-धीरे कुछ बदलाव आ रहे हैं. अब राजनेता पहले से ज़्यादा जवाबदेह हो गए हैं. इसके अलावा एक और बदलाव आया है कि युवा पहले से ज़्यादा राजनीति में आ रहे हैं. गांवों-कस्बों में महिलाएं भी आगे आ रही हैं. जब पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आते हैं तो राजनेताओं की छवि में बदलाव ज़रूर आएगा.

जो युवा राजनीति में आने की कोशिश कर रहे हों, उनके लिए सचिन पायलट की क्या राय होगी?

मेरा मानना है कि राजनीति ऐसा पेशा है जो सिर्फ़ काम के लिए नहीं है, बल्कि ज़िदगी जीने का तरीका है. अगर आपके पास राजनीति में पूरा वक़्त देना का हौसला और संकल्प है तो इस क्षेत्र में आ सकते हैं.

राजनीति में सही वजहों से उतरा जाए तो अच्छा रहेगा. राजनीति में सिर्फ इसलिए न आया जाए कि मुझे खादी पहननी है और भाषण देना है. लोगों को ये ध्यान रखना होगा कि उनका लक्ष्य प्राथमिक तौर पर समाज सेवा होना चाहिए.

आपकी नज़र में बेस्ट ड्रेस्ड राजनेता कौन है?

ये कहना मुश्किल है. मैने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया कि कौन किस तरह का कुर्ता पायजामा पहनता है. मैं तो इसलिए पहनता हूँ क्योंकि मुझे ये पोशाक पसंद है. ये आरामदायक है. ये फॉर्मल भी है और इन्फॉर्मल भी.

अब लोग पोशाक पहनने के मामले में पहले से ज़्यादा सजग हो गए हैं. हर कोई अच्छा कपड़ा और ड्रेस पहनता है.

खेलों में दिलचस्पी है?

हां मुझे क्रिकेट का शौक रहा है. कॉलेज के दिनों में मैने निशानेबाज के तौर पर कुछ राष्ट्रीय चैंपियनशिपों में शिरकत भी की है.

 
 
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