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सोमवार, 02 मार्च, 2009 को 03:45 GMT तक के समाचार

अनीश अहलूवालिया
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

स्लमडॉग मिलियनेयर की सफलता के मायने

ऑस्कर पुरस्कारों के मौक़ै पर भारत में सुबह जो मूड था वो कुछ कुछ टी 20 विश्व कप क्रिकेट के फ़ाइनल के दिन से मेल खा रहा था.

लाखों लोग सुबह पाँच बजे से टीवी खोल कर बैठे थे कि वो जादू होगा जिसकी उन्हें उम्मीद थी.

क्रिकेट के अलावा इस देश में कोई सबसे बड़ा जुनून है तो वो है सिनेमा.

लेकिन इस जादू की उम्मीद लगाने वालों के लिए कुछ और ही जुनून था जो सिनेमा से कहीं ज्यादा देश की अस्मिता से जुड़ता था.

दुनिया की दूसरे सबसे बड़े फिल्म उद्योग के सिर्फ़ दो कलाकारों को आज तक ओस्कर मिला था, सत्यजीत रे और भानू अथैय्या को.

और जादू हुआ भी. देश का एक सबसे प्रतिभाशाली संगीतकार ऑस्कर के मंच पर था.

जादू और भी बड़ा इसलिए था क्योंकि उसके साथ कोई करन जौहर, आमिर ख़ान या अमिताभ बच्चन नहीं बल्कि झुग्गी में रहने वाले बच्चे खड़े थे.

उनके साथ थे ऐसे कलाकार जिनका फ़िल्म की दुनिया में यह पहला पहला क़दम था.

और यह हो रहा था व्यावसायिक फ़िल्म जगत के सबसे प्रतिष्ठित मंच पर.

कोडक थिएटर लास एंजेलिस, कोई विरला फ़िल्म कलाकार ही होगा जिसने कभी इस मंच पर ऑस्कर पुरस्कार लिए खड़े होने का सपना नहीं देखा हो.

सपनों की दुनिया की राजधानी हॉलीवुड. हॉलीवुड फ़िल्म उद्योग एक ऐसी दुनिया है जहां के सफल कलाकार ऐसी ऊंचाई पर हैं जहां से उन्हें दूसरी दुनिया बहुत धुंधली दिखती है तो तीसरी दुनिया की तो बात क्या करें.

कई चोटी के फ़िल्म निर्देशक हैं कलाकार हैं जिन्होंने कभी बॉलीवुड की कोई फ़िल्म तक नहीं देखी. इसलिए कोडक थियेटर में एआर रहमान और रसूल पुकुट्टी के साथ अनिल कपूर, इरफ़ान ख़ान के साथ झुग्गी में रहने वाले बाल कलाकारों का ऑस्कर अवार्ड जीतने के बाद साथ आना एक जादू के समान है.

ये दो विश्वों के बीच की खाई जैसा है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि पुरस्कार जीतने की सफलता उसे पाट देगी. लेकिन सफलता के जादू ने कई विडंबनाओं को खोल कर सामने रख दिया है.

जिनके जीवन और यथार्थ पर स्लमडॉग मिलियनेयर आधारित है जिनकी उसमें भूमिका है जिनके बच्चों ने इसमें काम किया है उनमें से कई तो फ़िल्म का नाम तक ठीक से नहीं ले पाते.

वो सिर्फ़ इतना जानते हैं कोई बड़ी बात हो गई है क्योंकि ऐसे दर्जनों पत्रकार जो भूले से भी उनकी झुग्गियों का रुख़ नहीं करते थे, आज पूरे तामझाम के साथ उनपर कैमरे ताने खड़े पूछ रहे हैं... बताओ कैसा लग रहा है.

पता नहीं कब पत्रकार किसी पुरस्कार विजेता से यह पूछना बंद करेंगे कि कैसा लग रहा है और वो दस साल के बच्चों को इस सवाल से नहीं बख्शते.

वो बच्चे जो कभी अपनी झुग्गियों से 20 किलोमीटर दूर भी नहीं जा पाए होंगे. उनसे पूछा जाता है कि क्या तुम अपने दोस्तों के साथ लास एंजेलिस जाना चाहते थे.

बच्चों की मासूमियत

बच्चे अपनी तमाम मासूमियत के बावजूद इस घिसेपिटे सवाल का टेलीविज़न से ही सीखा हुआ जवाब जानते थे. जी हाँ ज़रूर. हमारे दोस्तों ने देश का नाम रोशन किया है.

स्लमडॉग मिलियनेयर का जमाल महात्मा गांधी के बारे में पूछे जाने पर कहता है कि सुना हुआ सा लगता है नाम.

झुग्गी के इन बच्चों से भी देश का इतिहास और भविष्य इतना ही दूर या क़रीब है तो स्लमडॉग मिलियनेयर की सफलता इनके लिए क्या है...

स्माइल पिंकी नाम की डॉक्यूमेंट्री ने भी ओस्कर जीता. ये डाक्यूमेंट्री उत्तर प्रदेश के मिरजापुर के एक छोटे से गांव के ग़रीब परिवार की पिंकी नाम की जिस बच्ची के जीवन पर आधारित है उसकी मां मानती है कि उसकी बेटी ने ‘अफ़सर’ जीता है और देश का नाम रोशन किया है.

और अब सरकार को उन्हें कम से कम एक छोटी दुकान खोलने के लिए पैसे देने चाहिए.

ओस्कर की ख़ुशी में महाराष्ट्र सरकार ने भी स्लमडॉग के अज़हरूद्दीन और रूबीना को मकान देने का फ़ैसला कर लिया है.

मगर हफ़्ता भर लास एंजेलिस में बिताने वाले अज़हरुद्दीन को उसके पिता ने इसलिए तमाचा जड़ दिया क्योंकि वो किसी पत्रकार को इंटरव्यू देने से मना कर रहा था.

ख़बर अखबारों के पहले पन्ने पर है. कुछ दिनों के लिए इन बच्चों की ग़रीबी पर हमारी नज़र है.

आप कैसे देखते हैं इस ख़बर को. कैसे देखते हैं पिंकी, अज़हरुद्दीन और रूबीना जैसे लाखों बच्चों की ज़िंदगी और उनके सपनों के बीच के फ़ासलों को. ऑस्कर के जादू को.

मंच पर दुनिया के बेहद धनी और ख़ूबसूरत कलाकारों के साथ खड़े इन बच्चों को देख कर किसी ने कहा अगर इस फ़िल्म से करोड़ों बनाने वाले लोग बांद्रा और धारावी की झुग्गियों के इन बच्चों में से एक एक की शिक्षा का भी भार उठा लें तो कितना कुछ बदल सकता है.

ऐसा बदलाव आएगा या नहीं, हम नहीं जानते. लेकिन हां एक बदलाव ज़रूर आया है. वो है 'पावर्टी टूरिज़्म'.

अब पर्यटक इन बदबूदार बस्तियों को दूर से देख कर महसूस करना चाहते हैं कि यहां कैसे जादू शुरु हुआ होगा. अब ये बस्तियां टूरिस्ट नक़्शे पर हैं. एक निशान की तरह.

यहां अंधेरे का सफ़र सिनेमा के तीन घंटों से कहीं ज़्यादा लंबा है. बकौल विस्सवा शिंबोर्सका परदों का गिरना ही नाटक और फ़िल्म की सबसे कड़वी सच्चाई होता है.