मदीना मस्जिद

मुसलमानों के लिए दूसरी सबसे पवित्र जगह की एक यात्रा

A view of the mosque

A view of the mosque

A view of the mosque

इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक़ तीसरा महीना, रबी-उल-अव्वल शुरू हो चुका है.  ये महीना पैग़म्बर मोहम्मद साहब के जन्म और मृत्यु का महीना है. पैग़म्बर मोहम्मद के जन्म और मृत्यु की तारीख़ एक ही है, यानी 12 रबी-उल-अव्वल. इसे ईद-मिलाद-उन-नबी कहा जाता है.

मुसलमानों के लिए दुख और ख़ुशी, दोनों का दिन है. हज़रत मोहम्मद इस्लाम का संदेश देने वाले पैगंबर हैं. उन्होंने ही दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद, मस्जिद-ए नबवी की बुनियाद रखी थी. ये सऊदी अरब के शहर मदीना में है.

स्थापना के समय मस्जिद का आकार काफ़ी छोटा था लेकिन आज ये एक विशाल मस्जिद है. ऐसी मस्जिद है जो मॉडर्न आर्किटेक्चर से लैस है. आस-पास शानदार इमारतें हैं. हर साल जब दुनिया भर के मुसलमान हज करने सऊदी अरब आते हैं तो मस्जिद-ए-नवबी में नमाज़ ज़रूर पढ़ते हैं. इस मस्जिद की और क्या-क्या ख़ासियतें हैं, इसका इतिहास क्या है, चलिए आपको विस्तार से बताते हैं. 

मदीना की ग्रैंड मस्जिद, इस्लाम में दूसरी सबसे पवित्र जगह है. ये मस्जिद पैग़म्बर मोहम्मद साहब के ज़माने में ही इस्लाम के मुख्यालय में स्थापित की गई थी. मोहम्मद साहब ही इस मस्जिद के पहले इमाम थे.

सुल्तान ग़ालिब अल क़ुऐती की किताब, ‘द होली सिटीज़, द पिलग्रिमेज ऐंड द वर्ल्ड ऑफ़ इस्लाम’ के मुताबिक़, पूरे अरब प्रायद्वीप में जो पहली जगह बिजली से रौशन की गई थी, वो ये मस्जिद ही थी, जहां 1909 में बिजली के बल्ब जले थे. 

Lighting and decorations inside the mosque

मस्जिद अल-नबवी को पैगंबर मोहम्मद साहब ने मक्का से मदीना की यात्रा के एक साल बाद बनाया गया था. आज के सऊदी अरब में स्थित मदीना शहर को तब यथरिब के नाम से जाना जाता था. इस विशाल मस्जिद को आज अरबी भाषा में अल-मस्जिद अल-नबाविस कहते हैं. ये मदीना में बनाई गई दूसरी मस्जिद थी. इससे पहले क़ुबा मस्जिद बनी थी, जैसा कि सैफ़ुर्रहमान अल-मुबाकराफु़री ने अपनी किताब ‘द सील्ड नेक्टर’ में लिखा है.

अन्य इस्लामिक परंपराओं में कहा जाता है कि इस मस्जिद के अंदर जन्नत की क्यारी है. ये मस्जिद सदियों पुरानी है. और बरसों से बढ़ते-बढ़ते अब ये पूरे पुराने मदीना शहर में फैल गई है. ये वो जगह है जहां दस लाख से भी ज़्यादा इस्लामिक स्मारक हैं.

Ariel view of the mosque at sunset

इस्लामिक परंपराओं के मुताबिक़ नबी की मस्जिद में एक बार नमाज़ अदा करना, दुनिया की किसी और मस्जिद में एक हज़ार बार नमाज़ पढ़ने के बराबर होता है. इस्लामिक परंपराओं के मुताबिक़, इस मस्जिद में नमाज़ अदा करने से ज़्यादा पुण्य केवल अल-मस्जिद अल-हरम में नमाज़ पढ़ने से होता है.

अल-मस्जिद अल-नबवी के सदियों के विस्तार के बाद आज इस के दायरे में पैग़ंबर मोहम्मद साहब की कब्र भी आती है. मोहम्मद साहब को उनकी प्रिय पत्नी आयशा के कमरे में दफ़नाया गया था. इसी कमरे में उनके दो सबसे क़रीबी साथियों यानी ख़लीफ़ा अबू बक़र और ख़लीफ़ा उमर की क़ब्रें भी हैं. इसके अलावा भी मदीना की ग्रैंड मस्जिद के दायरे में मोहम्मद साहब की दूसरी बीवियों के मकान भी आते हैं. साथ ही, इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक़, जन्नत का एक हिस्सा यानी रौज़ा भी मस्जिद का ही हिस्सा है.

सुन्नी इस्लाम की छह प्रमुख हदीसों में से एक अल बुख़ारी के मुताबिक़, पैग़ंबर मोहम्मद साहब ने अबु-हुरैरा से कहा था: मेरी मिम्बर और मेरे मकान बीच ज़मीन का जो टुकड़ा है, वो जन्नत का एक बाग़ीचा है.

मदीना की ये मस्जिद 1441 साल पहले बनी थी. मूल रूप से इसे पैग़ंबर मोहम्मद के घर के बगल में ही सन 632 में बनाया गया था. लेकिन पिछले क़रीब डेढ़ हज़ार बरसों में इस मस्जिद का डिज़ाइन कई बार बदला, कई बार विस्तार हुआ. इस मस्जिद का सबसे बड़ा विस्तार अभियान सऊदी बादशाह अब्दुल्लाह बिन अब्दुल्लाज़ीज़ के फ़रमान पर किया गया था.

इस मस्जिद में हर साल पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु आते हैं. ऐसा माना जाता है कि जब इस पवित्र मस्जिद का ये विस्तार कार्य पूरा हो जाएगा, तो यहां एक वक़्त में क़रीब 18 लाख मुसलमान नमाज़ पढ़ सकेंगे.

क्षमता

ज़फ़र बंगश के लेख, ‘मस्जिद अल-नबवी और हरे गुम्बद का इतिहास’ के मुताबिक़, मदीना की असल मस्जिद का आकार 98 फुट X 115 फुट था. ज़फ़र बंगश का ये लेख एक मासिक पत्रिका इंस्टीट्यूट ऑफ़ कंटेम्परेरी इस्लामिक थॉट (ICIT) में छपा था.

हालांकि अलग-अलग समय पर इस मस्जिद के विस्तार का काम हुआ, ताकि पूरी दुनिया से आने वाले ज़्यादा से ज़्यादा श्रद्धालुओं और ख़ास तौर से तीर्थयात्रियों को यहां नमाज़ पढ़ने का मौक़ा मिल सके. इस्लाम में केवल तीन मस्जिदों तक जाने के लिए लंबा सफ़र तय करने की इजाज़त है.

अपने रिसर्च पेपर, ‘पैग़म्बर मोहम्मद साहब और मदीना का शहरीकरण’ में प्रोफ़ेसर स्पैहिक उमर लिखते हैं कि मौजूदा मस्जिद अपने असली स्वरूप से अब 100 गुना ज़्यादा बड़ी है और आज इसका विस्तार पूरे मदीना शहर में फैल गया है.

प्रोफ़ेसर उमर आगे बताते हैं कि मस्जिद की चारदीवारी अब जन्नत अल-बाक़ी के क़ब्रिस्तान से लगती है. ये क़ब्रिस्तान पैग़म्बर मोहम्मद साहब के ज़माने में शहर के बाहरी हिस्से में हुआ करता था. ये बात डॉक्टर मोहम्मद वाजिद अख़्तर ने अपने लेख, ‘नबी की मस्जिद की वो 9 ख़ासियतें जिनके बारे में आप नहीं जानते’ में भी लिखी है.

मदीना की मस्जिद का जो विस्तार कार्य इस वक़्त हो रहा है, उसका आदेश सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाज़ीज़ ने 2012 में दिया था. इसके पूरा होने के बाद यहां एक साथ क़रीब 20 लाख लोग आ सकेंगे.

सऊदी अरब के वित्त मंत्री इब्राहिम अल-असफ़ कहते हैं कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद ये इमारत 6 लाख 14 हज़ार 800 वर्ग मीटर में फैली होगी. जबकि मस्जिद और इसके साथ की इमारतों का दायरा क़रीब दस लाख, बीस हज़ार पांच सौ वर्ग मीटर होगा. इतनी जगह में दस लाख लोग मस्जिद के भीतर और क़रीब आठ लाख लोग इसके बाहर जगह पा सकेंगे. 

अरब न्यूज़ ने मक्का और मदीना की मस्जिदों के रख-रखाव के लिए ज़िम्मेदार सऊदी अरब की जनरल प्रेसीडेंसी एजेंसी के प्रवक्ता शेख़ अब्दुलवाहिद अल-हत्ताब के हवाले से ख़बर दी कि किंग अब्दुल्लाह ने मस्जिद के खुले अहाते में 250 ऑटोमैटिक छतरियां लगाने का आदेश दिया है. इन छतरियों से क़रीब एक लाख 43 हज़ार वर्ग मीटर जगह को साया मिलेगा. ये स्वचालित छतरियां बेहद दक्षता और दो अलग-अलग ऊंचाई वाली होंगी जिससे ये खुलने पर एक-दूसरे के ऊपर सेट हो जाएं. ये स्वचालित छतरियां श्रद्धालुओं को सूरज की तीखी रौशनी और बारिश से बचाएंगी. शेख़ हत्ताब ने कहा था कि मस्जिद की साफ़-सफ़ाई के लिए 3200 सफ़ाईकर्मी काम करते हैं.

अरब न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, मस्जिद के विस्तार के दूसरे और तीसरे फ़ेज का काम पूरा होने के बाद  यहां दस लाख लोगों के लिए जगह बनेगी. जबकि पहले फ़ेज के विस्तार के बाद 8 लाख लोगों के लिए जगह बनेगी. कुल मिलाकर नए विस्तार के बाद मस्जिद अल-नबवी में वर्ष 2040 तक एक वक़्त में 12 लाख लोगों के लिए जगह होगी.

Some Minarets and Domes

मदीना मस्जिद के आस-पास क्या है?

मस्जिद-ए-नबवी के आसपास बहुत-सी अहम इमारतें हैं .सऊदी अऱब की सरकारी एजेंसियों के दफ़्तर के साथ-साथ आलीशान होटल, शॉपिंग मॉल, बड़ी और चौड़ी सड़कें, स्वास्थ्य सेवा देने वाली संस्थाएं हैं. लेकिन सबसे ख़ास है ,वो क़ब्रिस्तान जहां पैग़म्बर मोहम्मद के नज़दीकी साथी दफ़न हैं. जिसका नाम है जन्नत-उल-बक़ी.

The Baq' graveyard

बाक़ का कब्रिस्तान

Some buildings surrounding the mosque
some neighbouring buildings

आस-पास की इमारतें

The Baq' graveyard

बाक़ का कब्रिस्तान

Some buildings surrounding the mosque
some neighbouring buildings

आस-पास की इमारतें

मस्जिद-ए-नबवी के संरक्षक

मक्का स्थित काबा की मस्जिद और मस्जिद-ए-नबवी, दोनों का प्रशासन सऊदी अरब की जनरल प्रेसीडेंसी एजेंसी के तहत आता है. दोनों ही मस्जिदों के रख-रखाव और देख-भाल की ज़िम्मेदारी सऊदी अरब के शाही घराने की है. डॉ. ज़रेवा के मुताबिक़ सऊदी अरब के बादशाह को इन मस्जिदों का संरक्षक कहकर संबोधित किया जाता है. 

मस्जिद-ए-नबवी में सबसे पहले नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम ख़ुद पैग़म्बर मोहम्मद थे. उनकी मौत के बाद उनके साथी इमामत करने लगे.

पैग़म्बर मोहम्मद ने किसी को अपना नायब इमाम नहीं बनाया था. अलबत्ता मोहम्मद साहब ने कभी कभी अपनी ग़ैर-मौजूदगी अपने क़रीबी साथी अबु बकर को ये इख़्तियार दिया हुआ था कि वो मस्जिद-ए-नबवी में नमाज़ पढ़वाएं. 

फिर जब पैग़ंबर मस्जिद में दाख़िल होते थे तो अबु बकर पीछे हट जाते थे और पैग़ंबर ही नमाज़ अदा कराते थे, हालांकि पैग़ंबर मोहम्मद की मौत के बाद अबु बकर ही पहले ख़लीफ़ा और मदीना की मस्जिद के इमाम बने.  और तब से अब तक, इस मस्जिद के ना जाने कितने इमाम बन चुके हैं. फ़िलहाल शेख़ अब्दुल रहमान अल हुदैफ़ी प्रमुख इमाम हैं.

हालांकि 11 अक्टूबर 2019 को सऊदी सरकार ने ऐलान करके मदीना की मस्जिद में दो अतिरिक्त इमामों की बहाली कर दी है. इन में से शेख़ अहमद हुदैफ़ी, जो कि सबसे बड़े इमाम के बेटे हैं. और दूसरे इमाम हैं शेख़ अल ख़ालिद मुहन्ना. तहज्जुद की नमाज़ के लिए कुछ अन्य सहायक इमामों की नियुक्ति भी की गई है. तहज्जुद की नमाज़ आधी रात के समय होती है. हालांकि, ये नमाज़ फ़र्ज़ नहीं है लेकिन बहुत से श्रद्धालु ये नमाज़ अदा करते हैं.

Sheik Abdul Rahman Al-huthaifiy lead Imam, Madina mosque

मस्जिद-ए-नबवी के इमाम और मोअज़्ज़िन के साप्ताहिक ड्यूटी चार्ट और डॉक्टर ज़रेवा की मदद से हमें कुछ इमामों के नाम पता चले हैं. जो इस प्रकार हैं-

  1. शेख़ अब्दुल रहमान अली हुदैफ़ी
  2. शेख़ अब्दुल बारी अत तुबैती
  3. शेख़ सालेह बुदैर
  4. शेख़ अब्दुल्ला बुएजान
  5. शेख़ अहमद अल हुदेफ़ी
  6. शेख़ अहमद अल तालिब हमीद
  7. शेख़ हुसैन अल शेख़
  8. शेख इम्माद ज़ुहैर हाफ़िज़
  9. शेख़ ख़ालिद अल मुहन्ना

मुअज़्ज़िन (वो लोग जो नमाज़ से पहले अज़ान देते हैं)

अल-मुबारकफुरी के मुताबिक़, मदीना की मस्जिद में पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने जो पहला मुअज़्ज़िन नियुक्त किया था उसका नाम था, बिलाल बिन रबा.

जब अब्दुल्लाही-बिन-ज़ायद ने पैग़म्बर मोहम्मद साहब को अपने एक ख़्वाब के बारे में बताया कि उसे नमाज़ के लिए अज़ान देने का सपना आया था. तो उन्होंने ज़ायद को कहा कि वो बिलाल को अज़ान देना सिखा दें, क्योंकि बिलाल की आवाज़ बुलंद थी, जो एक मुअज़्ज़िन के लिए बहुत मुफ़ीद होती है.

सऊदी गज़ट ने अल-रियाद नाम के अख़बार में मदीना मस्जिद के मुख्य मुअज़्ज़िन शेख़ अब्दुल रहमान ख़शोज्जी के हवाले से लिखा है कि आज की तारीख़ में मस्जिद-ए-नबवी में 17 मुअज़्ज़िन हैं, जो दिन की पांच नमाज़ों के लिए अज़ान देते हैं.

हर रोज़ तीन मुअज़्ज़िन बारी-बारी से ‘मुकाब्बरियाह’ से अज़ान देते हैं. ‘मुकाब्बरियाह’ वो जगह है जहां पर खड़े होकर मुअज़्ज़िन ऊंची आवाज़ में अज़ान देते हैं और नारा-ए-तकबीर को इमाम के बाद दोहराते हैं जिससे कि वहां मौजूद नमाज़ी उसे साफ़ तौर पर सुन सकें.

जनरल प्रेसीडेंसी के मुताबिक़ इस वक़्त मस्जिद-ए-नबवी में 20 मुअज़्ज़िन हैं.

1.     शेख़ अब्दुल मजीद सुरायेही

2.     शेख़ अब्दुल रहमान काशुकजी

3.     शेख़ अब्दुल हत्ताब अल हुनैनी

4.     शेख़ अदिल कातिब

5.     शेख़ अहमद अफ़ीफ़ी

6.     शेख़ अहमद अंसारी

7.     शेख अनस शरीफ़

8.     शेख़ अशरफ़ अफ़ीफ़ी

9.     शेख़ एसाम बुख़ारी

10.   शेख फ़ैसल नोमान

11. शेख़ हसन काशुकजी

12.  शेख़ इयाद शुकरी

13. शेख़ महदी बारी

14.  शेख़ मोहम्मद माजिद हकीम

15.  शेख़ मोहम्मद क़स्सास

16.  शेख़ समी देवाली

17.  शेख़ सऊद बुख़ारी

18.  शेख़ उमर कमाल

19.  शेख़ उमर सुनबुल

20.  शेख़ उसामा अख़दार

कैसे बनी थी मस्जिद-ए-नबवी

मुबारकफ़ुरी के मुताबिक़, पैग़म्बर मोहम्मद साहब जब मक्का से चलकर मदीना पहुंचे, तो उन्होंने वहां पर दो अनाथों सहल और सुहैल से दस दिनार में ज़मीन का टुकड़ा ख़रीदा. ये जगह खजूर सुखाने के काम आती थी. और यहीं पर पैग़म्बर मोहम्मद साहब का ऊंट मदीना में रुका था.

मदीना में मस्जिद बनाने के काम में ख़ुद पैग़म्बर मोहम्मद भी शामिल हुए. इसकी बुनियाद पत्थरों की थी, तो दीवारें मिट्टी की. छत बनाने के लिए खजूर के पेड़ के तनों और शाख़ों की मदद ली गई थी.

इस मस्जिद का मुंह दक्षिण में येरुशलम में स्थित अल-अक़्सा मस्जिद की तरफ़ था. तब उसे ही क़िब्ला माना जाता था यानी मुसलमान अल-अक़्सा मस्जिद की तरफ़ मुंह करके ही नमाज़ पढ़ा करते थे. मदीना की इस मस्जिद में तीन दरवाज़े थे. पीछे की तरफ़ एक छायादर जगह थी, ताकि अजनबियों और ग़रीबों को साया मिल सके. इस हिस्से को ‘अल-सफ़्फ़ा’ कहा जाता था.

जब पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने अल्लाह के फ़रमान से काबा को क़िब्ला (जिधर की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ते हैं) बनाने का एलान किया तो मदीना मस्जिद का रुख़ भी उत्तर की तरफ़ कर दिया गया. दक्षिण की तरफ़ पड़ने वाला मस्जिद का दरवाज़ा बंद कर दिया गया और उत्तर की तरफ़ नया दरवाज़ा बनाया गया.

जब पैग़म्बर मोहम्मद के साथियों ने उनसे कहा कि मस्जिद की छत को भी मिट्टी से ढक दिया जाए, तो उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि: नहीं, मूसा की तरह की जालीदार छत चाहिए. मस्जिद के फ़र्श को भी अगले तीन साल तक किसी तरह से नहीं ढंका गया था.

मस्जिद के प्रवक्ता ने बताया कि ‘मस्जिद-ए-नबवी का आकार शुरुआत में 1050 वर्ग मीटर था, जिसे हिजरत के सात बरस बाद पैग़म्बर मोहम्मद साहब के आदेश के बाद बढ़ाकर 1425 वर्ग मीटर कर दिया गया था.’

पैगंबर की रिहाइश

पैगंबर मोहम्मद साहब का मकान, मस्जिद के बगल में ही है. ये वही जगह है, जहां उनका इंतक़ाल हुआ था.

डॉ ज़रेवा कहते हैं कि पैगंबर मोहम्मद के इंतक़ाल के बाद उनके साथी उन्हें दफ़नाने के लिए माक़ूल जगह तलाश रहे थे. तभी अबू बकर ने कहा कि पैगंबर साहब ने उनसे कहा था कि उन्हें वहीं दफ़नाया जाए जहां अल्लाह उनकी रूह ले जाए.

इत्तिफ़ाक़ से मुहम्मद साहब ने अपनी सबसे छोटी और प्यारी बीवी हज़रत आएशा के कमरे में इंतकाल पाया था इसलिए उन्हें सबसे अज़ीज़ बीवी हज़रत आएशा के कमरे में ही दफ़नाया गया.

जब पहले ख़लीफ़ा यानी अबू बकर बीमारी के बाद अपनी आख़िरी सांसें गिन रहे थे, तो उन्होंने हज़रत आएशा से कहा कि उन्हें भी पैग़म्बर मोहम्मद के पास ही दफ़नाने की इजाज़त दे दी जाए. और हज़रत आएशा ने इसकी इजाज़त दे दी. आएशा, अबू बकर की बेटी भी थीं.

हज़रत उमर के देहांत के बाद उन्हें भी अबु बकर और पैग़म्बर मोहम्मद की क़ब्र के पास ही दफ़ना दिया गया.

लेकिन कई सदियों से लगातार चले आ रहे मस्जिद के विस्तार के बाद अब पैग़म्बर की रिहाइशगाह और आस-पास की उस वक़्त की इमारतें अब मस्जिद कंपाउंड का ही हिस्सा बन गए हैं. अब कब्रों के पास कई कमरे बना दिए गए हैं, और उसके ऊपर एक बड़ा हरे रंग का गुंबद बना दिया है.

पैग़म्बर मोहम्मद की क़ब्र को रौज़ा-ए-मुबारक कहा जाता है. हज के लिए आने वाले तीर्थयात्री पैग़म्बर मोहम्मद की क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़ने ज़रूर जाते हैं.

बेहद ख़ूबसूरत इमारत

मस्जिद-ए-नबवी की ख़ूबसूरती देखते ही बनती है. मस्जिद का ज़बरदस्त आर्किटेक्चर, तकनीकी सहूलियतें और मैनेजमेंट इसे और भी सुंदर बनाते हैं. मस्जिद के अंदरूनी हिस्से से लेकर सहन तक की छत और मीनारों पर बेहद ख़ूबसूरत क़ीमती पत्थर और लाइटें लगी हैं.

पूरे कम्पाउंड में कूल लाइट लगाई गई हैं. सेंट्रलाइज़ एसी सिस्टम मस्जिद को ठंडा रखता है.

मस्जिद-ए-नबवी के मामलों के प्रवक्ता अब्दुल वहीद अल हतब का कहना है कि मस्जिद और सहन में 250 स्वचालित छतरियां लगाई गई हैं. जो नमाज़ियों को हर तरह के मौसम की मार से बचाती हैं. सायेदार कस्टमाइज़ छतरियों में ऐसा ड्रेनेज सिस्टम मौजूद है कि पानी की एक बूंद भी मस्जिद के फ़र्श पर नहीं गिरती. बारिश का पानी छतरियों से ख़ुद ही बहकर निकल जाता है. एक कस्टमाइज़्ड छतरी 143 वर्ग मीटर के हिस्से को साया देती है. जिसके नीचे 800 नमाज़ी आ सकते हैं.

मस्जिद के फाटक

मस्जिद-ए-नबवी का जो नक़्शा जनरल प्रेसिडेंसी के पास है, उसके मुताबिक़ मदीना की मस्जिद में कम से कम 41 फाटक दिखाए गए हैं. और उन फाटकों में छोटे दरवाज़े बना गए हैं. हर दरवाज़े के ऊपर एक पट्टिका लगी है, जिस पर अरबी ज़बान में लिखा है 'शांति और सुरक्षा के साथ दाख़िल हों'. (सूरा अल-हिज्र, 15:46)

शेख़ अल हतबी के मुताबिक़ दरवाज़ों की कुल संख्या 85 है.  कुछ फाटकों में एक दरवाज़ा है, कुछ में दो या तीन हैं और कुछ बड़े फाटकों में पांच दरवाज़े हैं. सहन की पहली और दूसरी मंजि़ल तक जाने के लिए एलिवेटर भी लगे हैं. मस्जिद के दरवाज़ों के नाम इस प्रकार हैं -

बाब-अल-सलाम

बाब अबु बकर सिद्दीक़

बाब अल हिज्र

बाब क़ुबा

बाब अल मलिक सऊद

बाब इमाम अल बुख़ारी

बाब अल अक़ीक़

बाब अल सुल्तान अब्दुलमाजिद

बाब उमर बिन अल ख़ताबी

बाब बदर

बाब अल मुल्क फ़हद

बाब उहूद

बाब उस्मान बिन अफ़्फ़ान

बाब अली बिन अबि-तालिब

बाब अबू ज़र

बाब अल इमाम मुस्लिम

बाब अल मिलक अब्दुलअज़ीज़

बाब मक्का

बाब बिलाल

बाब निसा

बाब जिबरील

बाब अल बक़ी

बाब अल अनाइज़

बाब अल आइम्मा

One of the gates with three doors

मस्जिद का विस्तार

मस्जिद-ए-नबवी के विस्तार का काम पैग़म्बर मोहम्मद के ज़माने से होता आ रहा है. उनकी मौत के बाद भी इस्लाम में जितने ख़लीफ़ा हुए उनके समय में भी ये विस्तार होता रहा. फिर चाहे वो उमय्यद ख़लीफ़ा हों, अब्बासी हों या फिर ओटोमन साम्राज्य. हर दौर में मस्जिद-ए-नबवी का विस्तार होता रहा. आज के दौर में भी ये काम जारी है. लेकिन इस विस्तार के साथ मस्जिद के बुनियादी रूप में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है.

इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा उमर ने तो यहां तक कहा था कि अगर मस्जिद के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन किए बिना मस्जिद का विस्तार सीरिया तक करना पड़े, तो किया जा सकता है.

पैग़म्बर मुहम्मद के बाद 638 ईस्वी में हज़रत उमर के समय में होने वाले विस्तार की वजह दुनिया भर में मुसलमानों की बढ़ती आबादी था. चूंकि सारी दुनिया के मुसलमान मस्जिद-ए-नबवी में नमाज़ अदा करने आते हैं, लिहाज़ा मस्जिद का विस्तार किया जाना लाज़मी था.

हज़रत उमर के काल में ही पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं में विस्तार का काम किया जाने लगा था. पूर्व दिशा में पैग़म्बर मोहम्मद की पत्नियों के कमरे होने की वजह से इसे छोड़ दिया गया था.

उमर के बाद उनके जांनशीन उस्मान ने 29वीं हिजरी में अपने साथियों से मशवरे के बाद मस्जिद का और विस्तार कर दिया. उनके काल में विस्तार के बाद बनाई गई दीवारों में मज़बूती के लिए लोहे के सरियों और नक़्क़ाशी वाले बड़े पत्थरों का इस्तेमाल किया गया. अरब न्यूज़ के मुताबिक़ छतों पर सागौन की लकड़ी का इस्तेमाल किया गया था.

88 हिजरी में मदीना के गवर्नर उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने मस्जिद को नए सिरे से डिज़ाइन करते हुए इसका विस्तार किया. ये विस्तार उमय्यद ख़लीफ़ा अल वलीद इब्न अब्दुल अल मालिक के कहने पर किया गया था.

उन्होंने चार मीनारें और खाली मेहराबें तैयार कराई थीं. अंदर की दीवारें सोने और मार्बल से सजाई गई थीं. आज इन कॉलम की संख्या बढ़कर 232 हो चुकी है.

161 से 165 हिजरी में अब्बासी ख़लीफ़ा अल- मेहदी के काल में मस्जिद का क्षेत्र बढ़ाकर 8890 वर्ग मीटर कर दिया गया. इस में 60 नई खिड़कियां और 24 दरवाज़े बनवाए गए.

654 हिजरी में मस्जिद जला दी गई थी. जिस के बाद ख़लीफ़ा अल-मुतस्सिम ने इसे नए सिरे से डिज़ाइन कराने का काम शुरू कराया लेकिन तातरों के बग़दाद पर हमला करने और उसे जीत लेने की वजह से मस्जिद-ए-नबवी का ये पुनर्निर्माण रुक गया. आख़िर में मामलिक युग में मस्जिद के पुनरुद्धार का काम पूरा किया गया. जिन्होंने मस्जिद के लकड़ी के सभी दरवाज़ों पर कांसे की पट्टियां लगवा दीं.

सुल्तान सुलेमान ने गुंबद की मरम्मत कराई. और 974 हिजरी में ओटोमन साम्राज्य के इस दौर में गुंबद के ऊपर के चांद तारे हटा कर वहां सोने की परत चढ़े तांबे के चांद तारे लगाए गए. इस मस्जिद के गुंबद को 1228 हिजरी में पहली बार हरे रंग से रंगा गया था. और ये काम सुल्तान मोहम्मद द्वितीय के कहने पर किया गया था.

1227 हिजरी में जब मस्जिद की बिल्डिंग में दरार आ गई तो सुल्तान अब्दुल माजिद खान ने मस्जिद के पुनर्निमाण का आदेश दिया. तब इसका दायर 10 हज़ार 303 वर्ग मीटर तक कर दिया गया. मस्जिद की इमारत में पांच नए दरवाज़े भी जोड़े गए. साथ ही 170 नए गुंबद, 600 ऑयल लैम्प लगाए गए. इस की दीवार की लंबाई में 11 मीटर का इज़ाफ़ा किया गया.

1327 हिजरी या सन् 1909 में यहां पहली बार बिजली की रौशनी की गई. पूरे अरब प्रायद्वीप में मस्जिद-ए-नबवी पहली ऐसी इमारत थी जहां बिजली पहुंची थी. ये बात सुल्तान ग़ालिब अल क़ुवैती ने अपनी किताब, ‘द होली सिटीज़, द पिलग्रिमेज ऐंड द वर्ल्ड ऑफ़ इस्लाम में लिखी है.’

आधुनिक युग की बात करें तो, सन् 1950 में  सऊदी किंग अब्दुलाज़ीज़ अल सऊद ने मस्जिद का विस्तार करके इसका क्षेत्रफल 16,327 वर्ग मीटर तक पहुंचा दिया और इसमें 706 कॉलम, 170 गुंबद भी जोड़ दिए. मस्जिद में रोशनी के इंतज़ाम के लिए अलग से बिजलीघर बनवाया गया. मस्जिद के प्रवक्ता अल हतब के मुताबिक़ यहां लगे लैम्प की संख्या भी  बढ़ाकर 2427 कर दी गई.

मस्जिद का नक्शा

मस्जिद का नक्शा

मदीना मस्जिद में तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए 1973 में किंग फ़ैसल ने पश्चिम में 35 हज़ार वर्ग मीटर ज़मीन मस्जिद के विस्तार के लिए दे दी. पूरे इलाक़े में पक्का फर्श बनाया गया और नमाज़ियों के लिए पंखे लगवाए गए. अरब न्यूज़ के मुताबिक़ पूरे एरिया में नए स्पीकर और कस्टमाइज़ छतरियां भी लगवाई गईं.

1398 हिजरी में किंग ख़ालिद बिन अब्दुल अज़ीज़ ने जो विस्तार कराया उसके बाद 1405-1414 हिजरी में किंग फ़हद ने दूसरा विस्तार कराया.

इस दौरान मस्जिद में कई एस्केलेटर और प्रवेश द्वार बनवाए गए. इसके अलावा कई ख़ूबसूरत गुंबद, चारमीनारें और 13 दरवाज़े बनवाए गए. लेकिन अब तक का सबसे बड़ा विस्तार 2012 में किंग अब्दुल्ला के समय शुरू हुआ था. इस विस्तार के बाद बीस लाख नमाज़ी मस्जिद-ए-नबवी में नमाज़ अदा कर सकते हैं.

सऊदी अरब के वित्त मंत्री इब्राहिम अल असफ़ का कहना है कि मस्जिद की इमारत 6 लाख, 14 हज़ार 800 वर्ग मीटर का क्षेत्र अपने में समेटेगी. इसमें कुछ प्लाज़ा भी बनाए जाएंगे. मस्जिद और प्लाज़ा, दोनों का क्षेत्र 10 लाख, 20 हज़ार, 500 वर्ग मीटर होगा. मस्जिद के अंदर दस लाख और प्लाज़ा में 8 लाख श्रद्धालु नमाज़ अदा कर सकेंगे.

उनका कहना है कि किंग अब्दुल्ला का निर्देश था कि मस्जिद के आंगन में सभी कॉलमों पर 250 कस्टामाइज़ छतरियां लगाई जाएं. ताकि, 1 लाख 43 हज़ार वर्ग मीटर के इलाक़े को मौसम की मार से सुरक्षित रखा जा सके और नमाज़ी बग़ैर किसी परेशानी के नमाज़ अदा कर सकें.

ओकाज़ अख़बार की एक रिपोर्ट में अब्दुल वहीद अल हतब के हवाले से लिखा गया है कि मौजूदा विस्तारीकरण की नीति के तहत पूर्व और पश्चिम में मस्जिद के लिए 12.5 हेक्टेयर में फ़ैली सौ इमारतों और दूसरी संपत्तियों को हटाया जाएगा.

छत का नज़ारा

छत का नज़ारा

अब्दुल हतब ने ये भी कहा कि शाह अब्दुल्ला के बाद नए शाह सलमान ने भी ख़ाना काबा और मस्जिद-ए-नबवी के विस्तार के काम को फिर से शुरू करके तेज़ी से करने पर ज़ोर दिया है. ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को हज कराया जा सके.

अल हतब के मुताबिक़ विस्तारीकरण के दूसरे और तीसरे चरण में क़रीब 10 लाख श्रद्धालुओं के लिए जगह बनाई जाएगी जबकि पहले चरण के विस्तार के बाद 8 लाख नमाज़ी नमाज़ अदा कर सकेंगे.

मदीना की मस्जिद के विस्तारीकरण के बाद वर्ष 2040 तक 12 लाख नमाज़ियों के लिए अतिरिक्त जगह तैयार कर ली जाएगी.

पैग़म्बर का मिम्बर

मदीना मुनव्वरा की मस्जिद में जो सबसे ख़ास है, वो है मिम्बर या उपदेश मंच जहां से पैग़म्बर मोहम्साहब अपने साथियों को ख़ुदा का फ़रमान सुनाया करते थे.

अल-मुबारकफ़ुरी के मुताबिक़ मदीना की मस्जिद में सबसे पहला मिम्बर खजूर के पेड़ की लकड़ी से बनाया गया था, और इसमें तीन सीढ़ियां थीं.

पैग़म्बर मुहम्मद इंतक़ाल बाद उनके क़रीबी साथी यानी पहले चार ख़लीफ़ा भी उपदेश देने के लिए इस मिम्बर का इस्तेमाल करते थे.

हज़रत उमर और अबु बकर ने भी ख़लीफ़ा बनने के बाद इसी मिम्बर का इस्तेमाल किया था. वो दोनों इस की दूसरी सीढ़ी पर खड़े होकर उपदेश देते थे.

ख़लीफ़ा उस्मान पहले तो इस मिम्बर की पहली सीढ़ी से खड़े होकर उपदेश देते थे. लेकिन, बाद में ख़लीफ़ा उस्मान ने भी मिम्बर की तीसरी सीढ़ी से उपदेश देना शुरू कर दिया था.

886 हिजरी में एक भयानक आग ने पूरी मस्जिद को चपेट में ले लिया था और पैग़म्बर मुहम्मद साहब का मिम्बर तबाह हो गया था. बाद में शहर के लोगों ने ईंटों से मिम्बर का प्लेटफॉर्म तैयार किया. इसके बाद ओटोमान साम्राज्य के मामलुक सुल्तान क़ातबे ने संगमरमर का प्लेटफ़ॉर्म यहां लगाने के लिए भेजा.

मेहराब

मेहराब वो जगह है से मस्जिद के इमाम जमात को नमाज़ अदा कराते हैं.

पैग़म्बर मोहम्मद साहब की मस्जिद में दो मेहराबें हैं. पहली मेहराब वो है जहां मस्जिद के ऑरिजनल इमारत में वो जमाअत को नमाज़ अदा कराते थे. ये मेहराब पैग़म्बर मोहम्मद के मिम्बर और उनके रौज़ा मुबारक यानी पैग़म्बर की क़ब्र के नज़दीक ही है, और यहां से नमाज़ के लिए अज़ान दी जाती है. इसे मुकाब्बरिया कहते हैं.

डॉ अख़्तर के मुताबिक़ पैग़म्बर मोहम्मद की मेहराब उस हिस्से में फैली है, जहां से मुहम्मद साहब जमात को नमाज़ अदा कराते थे, इस में सिर्फ़ वो हिस्सा नहीं है जहां वो पैर रखते थे.यहां आम लोगों को जाने की इजाज़त नहीं है.

मस्जिद-ए-नबवी की दूसरी मेहराब उस्मानी मेहराब है, जिसे मौजूदा इमाम इस्तेमाल करते हैं. ये मेहराब उस्मानी ख़लीफ़ाओं के दौर में मस्जिद के विस्तार के वक़्त बनाई गई थी. तब मस्जिद का विस्तार उत्तर की तरफ़ हुआ था.

डॉ अख़्तर के मुताबिक़ तीसरी मेहराब को सुलेमानिया या अहनफ़ मेहराब कहते हैं. इसे ओटोमान सुल्तान सुलेमान के हुक्म पर बनवाया गया था. ये मेहराब हनफ़ी इमाम के लिए बनवाई गई थी. डर था कि कहीं मलिकी इमाम पैग़म्बर मोहम्मद के मेहराब का इस्तेमाल ना शुरू कर दें.

अल-रौज़ा

मदीना मस्जिद में रौज़ा पैग़म्बर मुहम्मद की रिहाइशगाह और उनके मिम्बर के दरमियान है.

बुख़ारी शरीफ़ में अबु हुरैरा से रिवायत है कि पैग़म्बर ने कहा था कि  मेरे घर और मिम्बर के दरमियान जन्नत है. रौज़ा को ज़ियारत के लिए खोला जाता है. लेकिन मर्दों और औरतों के लिए ज़ियारत का समय अलग-अलग होता है, ताकि भगदड़ ना हो जाए.

श्रद्धालु यहां पैग़म्बर मोहम्मद को सलाम पेश करने के लिए नफ़िल नमाज़ अदा करते हैं. मस्जिद के विस्तार के साथ-साथ इस जगह को ख़ूबसूरत नक़्क़ाशी वाली जालियों और मोटे कपड़े से ढ़क दिया गया है. काबा और मस्जिद-ए-नबवी की सऊदी जनरल प्रेसिडेंसी के मुताबिक़, रौज़ा का आकार 330 वर्ग मीटर है.

इसकी लंबाई 22 मीटर और चौड़ाई 15 मीटर है.  इस इलाक़े में हमेशा सफ़ाई कर्मी और सुरक्षा तैनात रहते हैं, ताकि लोगों की आवाजाही तसल्ली बख़्श बनी रहे.

हरा गुंबद

पैग़म्बर मोहम्मद साहब की मस्जिद में सबसे ख़ास है हरा गुंबद. ये गुंबद पैग़म्बर मोहम्मद और ख़लीफ़ा अबु बकर और हज़रत उमर की क़ब्रों के ठीक ऊपर बना है. 

वफ़ा अल वफ़ा में अल समहुदी कहते हैं कि पैग़म्बर मोहम्मद की क़ब्र पर गुंबद सुल्तान क़ालावुन ने उनके निधन के 650 साल बाद 1276 में बनवाया था और ये लकड़ी का था.

डॉ अख़्तर कहते हैं कि आज जो हरा गुंबद हम देखते हैं वो असल में पैग़म्बर मोहम्मद के कमरे की छत पर है. इसके अंदर एक और गुंबद है, जो आकार में बहुत छोटा है. इस गुंबद पर बाहर की तरफ़ पैग़म्बर मोहम्मद और हज़रत अबू बकर के नाम दर्ज हैं. और अंदर की तरफ़ हज़रत उमर का नाम दर्ज है.

जज़ीरा इंसाइक्लोपीडिया के मुताबिक़ ये गुंबद नीचे से वर्गाकार और ऊपर से अष्टकोणीय था लेकिन आग में भस्म हो जाने के बाद ओटोमन सुल्तान ग़ाज़ी महमूद ने इसे फिर से और नए अंदाज़ में बनवाया था.

डायरीज़ ऑफ़ रिफत पाशा, खंड-1 पेज 464-465 पर डॉक्टर अख़्तर लिखते हैं कि 1837 में गुंबद को हरे रंग से रंगा गया. जबकि इससे पहले काफ़ी समय तक ये सफ़ेद रंग का था. और उसके बाद ये गुम्बद जामुनी और नीले रंग का भी रहा.

लाइब्रेरी

मस्जिद के रख-रखाव के लिए ज़िम्मेदार सऊदी अरब की जनरल प्रेसिडेंसी का कहना है कि मदीना की मस्जिद की लाइब्रेरी 1352 हिजरी में तामीर की गई थी. इसका सुझा मदीना में औक़ाफ़ के निदेशक उबैद मतानी ने दिया था.

यहां रखी कुछ किताबें, जैसे-मकतबा शेख़ मोहम्मद अज़ीज़ अल वज़ीर जो कि मस्जिद नबवी से पहले की हैं, उन्हें लाइब्रेरी बनने के बाद यहां रखा गया. लाइब्रेरी में रीडिंग रूम के अलावा एक ऑडियो लाइब्रेरी डिपार्टमेंट भी है. दीनी किताबों, हदीसों और अरबी में लिखी दुआओं के संग्रह यहां संजो कर रखे जाते हैं.

लाइब्रेरी में एक टेक्निकल सेक्शन भी है जो 22 नंबर दरवाज़े के पास है. इसके पास किताबों पर जिल्द चढ़ाने, किताबों के रख-रखाव और संरक्षण की ज़िम्मेदारी है.

प्रिंटिंग, सजावट, आकार, तस्वीरों वग़ैरह के ऐतबार से यहां दुर्लभ किताबें भी संजोई जाती हैं.

पुस्तकालय में एक अहम हिस्सा

पुस्तकालय में एक अहम हिस्सा

इसके अलावा, मदीना की मस्जिद की लाइब्रेरी के अन्य दर्जों में पांडुलिपियां सेक्शन, डिजिटल लाइब्रेरी, रिसर्च एंड ट्रांसलेशन सेक्शन, सुरक्षा सेक्शन आदि भी हैं. लाइब्रेरी का रीडिंग रूम मस्जिद के अंदर है जहां मर्दों, औरतों और बच्चों के बैठने का इंतज़ाम है, जो उस्मानी फाटक के पास ही है.

The Prophet's pulpit
The Mihrab where call to prayers are made
The Green Dome
A library manuscript

पुरानी लाइब्रेरी

नई लाइब्रेरी

पुरानी लाइब्रेरी

नई लाइब्रेरी

मस्जिद-ए- नबवी दुनिया की सबसे विशाल मस्जिद है. इसकी सुंदरता और इंतज़ाम देखते ही बनते हैं.

मस्जिद के विस्तार और सौदर्यीकरण पर लाखों सऊदी रियाल ख़र्च किए जा रहे हैं. सऊदी अरब हर साल खास तौर से रमज़ान और हज के समय लाखों मुसलमानों की मेज़बानी करता है.

चूंकि ख़ाना काबा और मस्जिद-ए- नबवी की देखरेख की ज़िम्मेदारी सऊदी अरब के सुल्तान की है, लिहाजा उनका ज़ोर मस्जिद को तीर्थयात्रियों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा आरामदेह और आकर्षक बनाने पर रहता है.

मस्जिद-ए-नबवी में लोग सिर्फ़ हज या उमरा के लिए ही नहीं जाते हैं. बल्कि बहुत सारे मुसलमान अपने प्यारे नबी पैग़म्बर मुहम्मद को सलाम पेश करने के लिए भी आते हैं. 

आलेख - सैगिरू सलेह

प्रोड्यूसर: हालिमा उमर

निर्माता: एनकेची ऑगबोन्ना

तस्वीरें - बीबीसी, गेटी, मस्जिद हरम