बाबरी-अयोध्या आंदोलन की औरतें

उन औरतों की कहानी जो राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान अपने तीखे और भड़काऊ भाषणों के ज़रिए प्रभावी नेता बन कर उभरीं और उनकी भी जिन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद के दंगों में पुरुषों की ही तरह हिस्सा लिया.


यूं तो दूसरे धर्मों की तरह हिंदू धर्म में औरतों को दोयम दर्जा ही हासिल है लेकिन इसमें कोई शक़ नहीं कि पारंपरिक भूमिका में उनके लिए एक ख़ास ढांचा है. त्यागमयी, सहनशील, गृहलक्ष्मी और अन्नपूर्णा.

लेकिन इस ढांचे की एक नई परिभाषा और तेवर तब सामने आया जब 1990 के दशक में राम जन्म भूमि आंदोलन में हिंदू औरतों ने बढ़ के हिस्सा लिया. एक अनुमान के अनुसार 55 हज़ार महिला कारसेवकों ने राम जन्मभूमि कर सेवा में हिस्सा लिया था.

वे घर से बाहर निकलीं, धर्म की राजनीति का हिस्सा बनीं और व़क्त आने पर मर्दों का अधिकार-क्षेत्र माने जाने वाले सभी दायरे तोड़ती गईं.

आंदोलन के प्रमुख चेहरे और आवाज़ बनीं तीन औरतें- साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती और विजयाराजे सिंधिया. मंदिर के लिए ईंटे इकट्ठा करने, रथ यात्रा में जुड़ने, बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद भड़के दंगों में शामिल हुईं आम हिंदू औरतें.

बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद के छह नेताओं समेत साध्वी ऋतंभरा और उमा भारती पर विध्वंस के आपराधिक षडयंत्र रचने और दंगे भड़काने का मुकदमा चला. 30 सिंतबर 2020 को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने सभी 32 अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

विशेष न्यायाधीश ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि इस मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है. न्यायाधीश ने साथ ही कहा कि ये विध्वंस सुनियोजित नहीं था.

विजयराजे सिंधिया की साल 2001 में मौत हो गई.

अब से तीन दशक पहले औरते राजनीति का एक बहुत मामूली हिस्सा ही थीं. उस दौर में इन तीनों ने राम मंदिर आंदोलन के परिवेश में अपने लिए और आम हिंदू औरतों के लिए तैयार की राजनीति और उससे जुड़ी हिंसा की एक नई ज़मीन.

साध्वी ऋतंभरा

आंदोलन की आवाज़

राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान एक आवाज़ जो गली-नुक्कड़, मंदिरों और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सभाओं में गूंजती थी, वो साध्वी ऋतंभरा की थी.

आंदोलन के भड़काऊ संदेश को उकेरते उनके भाषणों के ऑडियो टेप बनाकर एक-एक रुपए में बेचे जाते और बीजेपी-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं के घरों में बांटे जाते.

इनकी लोकप्रियता हिंदुओं में इतनी थी कि इतिहासकार तनिका सरकार अपनी किताब ‘हिंदू वाइफ़, हिंदू नेशन’ में लिखती हैं कि, “अयोध्या के पंडितों ने मंदिरों में अपने रोज़ाना तय पूजा-पाठ को स्थगित कर इनके ऑडियो कैसेट के भाषणों को बजाना शुरू कर दिया.”

हिंदू औरतों के आज्ञाकारी और शांत होने की पारंपरिक छवि को तोड़ते हुए साध्वी ऋतंभरा के भाषणों में आवेग था. बाबरी मस्जिद विध्वंस से एक साल पहले, 1991 में दिल्ली में लाखों लोगों की रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “राम जन्म भूमि पर मंदिर के निर्माण को विश्व की कोई ताकत नहीं रोक सकती”.

उत्साहित भीड़ और उत्तेजित हो गई जब उन्होंने नारा लगाया, “कहो गर्व से हम हिंदू हैं” और जवाब आया, “हिंदुस्तान हमारा है”.

साध्वी के भाषणों में हिंदुओं की एकजुटता का जितना भाव था उतनी ही मुसलमानों के प्रति नफ़रत भी थी.
1991 में हैदराबाद में दिए एक भाषण में उन्होंने कहा, “सरकार हिंदुओं के दो या तीन बच्चे ही पैदा करने को कहती है, कुछ समय बात कहेगी कि एक भी पैदा ना करो, पर उनका क्या जिनकी छह बीवियां हैं, 35 बच्चे, और जो मच्छर मक्खियों की तरह पनप रहे हैं...”

मुसलमान आबादी का तेज़ी से बढ़कर हिंदुओं को पार कर जाने का ये डर तथ्य से विपरीत है. 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में मुसलमानों की कुल आबादी हिंदुओं का पांचवा हिस्सा ही है.

इतिहासकार तनिका सरकार के मुताबिक -


अपने भाषणों की शुरुआत साध्वी ऋतंभरा अक्सर ‘जय मां सीता’ से करती थीं और अपने संबोधन में ये रेखांकित करती थीं कि लव-कुश के बड़े हो जाने के बाद मां सीता ने अपने पति राम के कहने पर भी उनके पास ना लौटने का फ़ैसला किया और अपने प्राण त्याग दिए.

यानी पति की आज्ञा से भी ऊपर धर्म के लिए अपने मन की बात मानी क्योंकि वही सही था. साध्वी के चित्रण में सीता, केवल पत्नी नहीं, हिंदू धर्म की रखवाली थीं.

माया अज़्रान कोलंबिया जर्नल के लिए लेख ‘सैफ़्रन वुमेन’ में लिखती हैं, “साध्वी की पुकार पर, उन्हें सुननेवाली औरतें, महज़ औरत से ऐतिहासिक रक्षक बन जाती हैं, जिन्हें अयोध्या के पुर्नर्निमाण के लिए बुलाया जा रहा है.”

ऋतंभरा से साध्वी

साध्वी के भाषणों में सभी हिंदुओं को जाति का भेदभाव भूलकर एक होने की बात होती थी क्योंकि वो कहतीं की राम सब हिंदुओं के भगवान हैं.

ये बीजेपी का हिंदू एकता का अजेंडा ही नहीं था, उनके अपने जीवन की सच्चाई भी थी.

ऋतंभरा पंजाब के ग़रीब मंडी दौराहा गांव के वैसे परिवार में पैदा हुई जिन्हें निचली जाति का समझा जाता है.

मनोविश्लेषक सुधीर कक्कड़ अपनी किताब ‘द कलर्स ऑफ़ वायलेंस’ में बताते हैं कि, “16 साल की उम्र में ऋतंभरा को हिंदू पुनरुत्थान के लिए काम कर रहे कई ‘संतों’ में से प्रमुख स्वामी परमानंद के प्रवचन सुनकर एक आत्मिक अनुभव हुआ.”

इसके बाद ही वो हरिद्वार के उनके आश्रम चली गईं और वहीं पर अपनी भाषण देने की कला विकसित की.
वो इतनी पारंगत हो गईं कि विश्व हिंदू परिषद ने उन्हें राम मंदिर आंदोलन के दौरान अपना प्रवक्ता बनाया.
सितंबर 1990 में गुजरात के सोमनाथ से राम मंदिर के लिए रथ यात्रा शुरू हुई. इसे एक महीने में 10,000 किलोमीटर का रास्ता तय कर अयोध्या पहुंचना था.

बीजेपी के अपने अनुमान के मुताबिक दस करोड़ से ज़्यादा लोगों ने रथ यात्रा के अलग-अलग हिस्सों में भाग लिया. इसी दौरान ऋतंभरा ने अपने नाम के साथ ‘साध्वी’ जोड़ लिया.


मुसलमानों से नफ़रत

अपने नाम में साध्वी जोड़ने के पीछे क्या वजह रही होगी? इसमें कोई शक नहीं कि साध्वी के रूप में उनका कद ऊंचा दिखता था. साधुओं की ही तरह ब्रह्मचर्य का पालन और सांसारिक सुखों का त्याग.

वो हिंदुओं के बीच इस छवि को बखूबी बना रही थीं कि वो छल-कपट से ऊपर, राजनीति के खेल से परे, हिंदू धर्म के प्रति पूरे देश के लिए चिंतित साध्वी हैं.

उनके भाषणों में हिंदू धर्म पर मुसलमानों के आक्रमण और मुस्लिम समुदाय के प्रति घृणा साफ झलकती थी .

उदाहरण के तौर पर अपने भाषणों में वे मुस्लिम आबादी के तेज़ी से बढ़कर हिंदू आबादी को ख़त्म कर देने का दावा करतीं. मुसलमानों को विशेषाधिकार दिए जाने की बात और उसके विपरीत हिंदू समुदाय को उनके धार्मिक त्यौहार भी आज़ादी से नहीं मनाने का ज़िक्र होता.

उनके वक्तव्य में मुसलमानों द्वारा हिंदू औरतों की जांघों पर ‘पाकिस्तान’ लिख दिया जाना, भारत माता की बाहें काट दिया जाना जैसी बिना सबूत के बातों का भी ज़िक्र होता.

ऐसा संभव है कि औरत होते हुए एक सार्वजनिक मंच से ऐसी भाषा और हिंसक लहजा अपनाने में भी ताकत का अहसास होता होगा.

उनके शब्दों के चयन में ठेठ मर्दाना पुट और नज़रिया तो था और औरतों को लुभाने के लिए आंदोलन में उनकी भूमिका पर ज़ोर भी दिया जाता था. फिर चाहे वो भूमिका घर में हो या सड़क पर.

साध्वी के पास हिंदू धर्म पर आक्रमण को निरस्त करने में मर्दों की मदद के लिए एक नुस्खा था - औरतों को मां बनकर हिंदू आबादी बढ़ानी थी और घरों से निकलकर सामने आने का आह्वान भी था.

छह दिसंबर 1992 को जब कारसेवक बाबरी मस्जिद पर चढ़ गए थे, तब साध्वी ऋतंभरा, बीजेपी के शीर्ष नेताओं और कई साधू-संतों के साथ मंच पर थीं.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब "युद्ध में अयोध्या" में उस दिन की आंखोंदेखी लिखा है.
उनके मुताबिक साध्वी ऋतंभरा कारसेवकों को संबोधित करते हुए कह रही थीं कि वो इस शुभ और पवित्र काम में पूरी तरह लगें.

उस दिन मंच पर एक और औरत भी मौजूद थीं. महज़ 30 साल की उम्र में लोकसभा चुनाव जीतकर मध्य प्रदेश के खजुराहो से सांसद, उमा भारती.

उमा भारती

‘सेक्सी सन्यासिन’

छह दिसंबर 1992 की एक बहुचर्चित तस्वीर में विध्वंस के बाद उमा भारती को तब राज्य सभा में बीजेपी के सांसद रहे मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर चढ़ हंसते हुए देखा जा सकता है.

ये महज़ इत्तेफ़ाक नहीं कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान भाषण देने की उमा भारती की तस्वीरें बहुत ढूंढने पर भी नहीं मिलती है. लेकिन इस तस्वीर का बार-बार इस्तेमाल किया गया है.

उस समय कम उम्र की उमा भारती की राजनीति में पैठ बनाने की कोशिशों पर कई खबरें बनती थी. पुरुष नेताओं के साथ उनका खुलापन और उनके कथित रिश्ते अक्सर उन्हें नीचे खींचने और अख़बार-मैगज़ीनों में ख़बर बनाने के लिए इस्तेमाल होते थे. दबे स्वर में उन्हें ‘सेक्सी सन्यासिन’ का तमगा भी ऐसे ही लोगों ने दिया था.

ये तब जब 1989 के लोक सभा चुनाव में 523 में से सिर्फ़ 23 सीटें, यानी 4.4 प्रतिशत, महिलाओं ने जीती थीं जिनमें से एक उमा भारती थीं.

इंदिरा गांधी दो दशक पहले ही देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बन चुकी थीं पर ये राजनीति में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी का सूचक नहीं था.

उमा भारती और पूर्व बीजेपी अध्यक्ष गोविंदाचार्य के साथ उनके ‘अफ़ेयर’ की खबरें जब ज़ोर पकड़ने लगीं तो उमा भारती ने खुद मीडिया को बताया कि वो नींद की गोलियां लेकर आत्महत्या की कोशिश करने पर मजबूर हो गईं.

उस व़क्त इंडियन एक्सप्रेस अख़बार को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “औरतों के मामले में लोग बहुत तंगदिल और रूढ़ीवादी ख़याल रखते हैं.”

मानुषी की संपादक मधु किश्वर ने उमा भारती की आत्महत्या की कोशिश के संदर्भ में 1996 के अपने एक लेख में लिखा-


बिना मर्द की औरत

उमा भारती अपने पैरों पर खड़ी थीं. किसी पिता या बेटे पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थी. ना ही उनकी पहचान मां या बेटी की थी.

वो एक सजग, सशक्त और राजनीतिक तौर पर महत्वाकांक्षी औरत थीं.

जब उमा भारती 11 साल की थीं उनके पिता की मौत हो गई. उनकी मां, जिन्हें वो अपनी प्रेरणा का स्रोत बताती हैं, उन्होंने उनको और उनके पांच भाई-बहन को अकेले ही बड़ा किया.

एक साक्षात्कार में उमा भारती ने बताया कि जब उनके परिवारवालों ने पिता द्वारा उनके लिए छोड़ी गई ज़मीन हथियाने की कोशिश की तो उनकी मां एक महीना पैदल चलकर भोपाल गईं और मुख्यमंत्री आवास के गेट के सामने लेट गईं ताकि अपनी फ़रियाद की सुनवाई करवा सकें.

कुछ वैसी ही ज़िद उमा भारती ने तब दिखाया जब अयोध्या में दाख़िल होने के लिए उन्होंने अपना सर मुंडा लिया.

1990 में जयपुर में हुए बीजेपी के अधिवेशन में अपने वक्तव्य में उमा भारती ने बताया कि अक्तूबर में जब अयोध्या में विवादित मस्जिद को आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया था तब उनके पास वहां जाने का एक ही रास्ता था.

उन्होंने कहा -

मर्दों के वर्चस्व वाली राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में गेरुए कपड़े पहने, ब्रह्मचर्य का पालन करती, सर मुंडाई एक औरत की छवि बहुत प्रभावी थी.

पार्टी में जगह बनाना चाहे मुश्किलों भरा ही रहा हो, पर राम जन्मभूमि आंदोलन में वो भी साध्वी ऋतंभरा जैसी ही तेज़-तर्रार और भड़काऊ वक्ता के तौर पर उभरीं. उनके भाषणों के ऑडियो टेप भी ख़ूब बनाए गए.

धार्मिक भावनाएं उग्र करने वाले उन भाषणों पर बीजेपी ने कभी नकेल भी नहीं कसी.


विध्वंस में भूमिका

राम जन्मभूमि आंदोलन पर पत्रकारों द्वारा लिखे गए कई लेख उमा भारती के भाषणों की चर्चा करते हैं, जिनमें उनकी भाषा साध्वी ऋतंभरा से कुछ ख़ास अलग नहीं है.

मसलन उन्होंने कहा, राम मंदिर बनाने के लिए “सरयु का पानी हमारे ख़ून से लाल भी हो जाए तो...” या “मंदिर बनाने के लिए अगर ज़रूरत पड़ी तो हम अपनी हड्डियों को ईंट बना देंगे और लहू को गारा.”
बाबरी मस्जिद विध्वंस के फ़ौरन बाद, दिसंबर 1992 में ही केंद्र सरकार ने रिटायर्ड हाई कोर्ट जस्टिस लिबरहान को इसकी तहक़ीक़त का काम सौंपा.

17 साल बाद लिबरहान कमिशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विजयाराजे सिंधिया समेत 68 लोगों को साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने का दोषी पाया.

उमा भारती ने इसे ग़लत बताते हुए तब ये कहा था कि वो मस्जिद ढहाए जाने की सिर्फ़ “नैतिक ज़िम्मेदारी” लेंगी और उन्हें “राम जन्मभूमि आंदोलन का हिस्सा होने पर गर्व है”.

बाबरी मस्जिद विध्वंस के दिन उमा भारती ने दो नारे दिए थे -

“राम नाम सत्य है, बाबरी मस्जिद ध्वस्त है” और “एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो”.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा के मुताबिक उमा भारती ने मंच से कहा, “अभी काम पूरा नहीं हुआ है, आप तब तक परिसर ना छोड़ें जब तक पूरा इलाका समतल ना हो जाए”.

उन्होंने मंच पर एक महिला को भी पेश किया और दावा किया कि वो “ढांचे के गुंबद पर चढ़नेवाली पहली महिला हैं.” उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा का मक़सद हिंदू एकता और राम मंदिर के लिए कारसेवकों को प्रेरित करना था. उनका लक्ष्य एक ही था और उसमें उन्होंने मर्दों के साथ औरतों को भी शामिल किया.

पर दोनों ने ही अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल औरतों के मुद्दे उठाने के लिए नहीं किया. ऐसा करना शायद तब एक कमज़ोरी के रूप में देखा जाता और उसमें वो इतनी प्रभावी भी ना होतीं.

हालांकि उमा भारती को राजनीति में आगे लाने में सबसे अहम् भूमिका एक महिला, विजयाराजे सिंधिया ने ही निभाई.

कई साक्षात्कारों में उमा भारती ने कम उम्र में सिंधिया की छत्र-छाया में आने और उसके बल पर संघ में अपनी जगह बना पाने का ज़िक्र किया है.

विजयाराजे सिंधिया

हिंदू रीत की प्रतीक

युवा नेताओं, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा, से उम्र में बहुत बड़ीं, 70 साल पार कर चुकीं मंझी हुई नेता विजयाराजे सिंधिया, राम जन्मभूमि आंदोलन का तीसरा अहम् महिला चेहरा थीं.

आर्थिक रूप से कमज़ोर और पिछड़ी जाति के मानेजाने वाले परिवारों से आनेवालीं भारती और ऋतंभरा से उनकी पृष्ठभूमि बहुत अलग थी.

समृद्ध और सामंती वर्ग में लोकप्रिय, तथाकथित ऊंची जाति की विजयाराजे, राजसी अमीर घराने से ताल्लुक रखती थीं.

हालांकि ऋतंभरा और भारती की ही तरह वो भी एकल (सिंगल) औरत थीं. विधवा होने की वजह से वो भी ब्रह्मचर्य का जीवन जी रही थीं.

आरएसएस के पुरुष सदस्यों के लिए ब्रह्मचर्य अनिवार्य है. ये सिंधिया को एक ऊंचा दर्जा देता था और राष्ट्र निर्माण के लिए अच्छी सेविका बनाता था.

गेरुआ वस्त्र और बड़े सफ़ेद या लाल टीके वाली ऋतंभरा और भारती से रहन-सहन में काफ़ी अलग, सिंधिया विधवा होने के बाद पुरानी रिवायतों के मुताबिक सफ़ेद साड़ी पहनती थीं. उनके विचार हिंदू धर्म में लोकप्रिय, औरत की रूढ़ीवादी भूमिका को सही मानते थे.

पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कई बार स्पष्ट किया कि उनके मुताबिक औरतों का मुख़्य कर्तव्य पत्नी और मां बनना है और औरतों के सती हो जाने को वो एक गौरवशाली परंपरा का हिस्सा बताती थीं.

अमृता बासु को एक साक्षात्कार में सिंधिया ने कहा कि उनके बचपन में ही उनकी मां की मृत्यु हो गई और ‘हिंदू राष्ट्र’ ने उनकी मां की जगह ली, जिसके लिए उन्होंने काम किया.


उन्होंने माना कि आम परिवारों की ही तरह, बचपन में अपनी बेटी के मुकाबले उन्होंने अपने बेटे को ज़्यादा तरजीह दी.

पर बच्चों के बड़े होने के बाद बेटे माधव राव सिंधिया ने जब विरोधी पार्टी में शामिल होने का फ़ैसला किया तो उनसे रिश्ता ख़राब होता चला गया और बेटी, वसुंधरा राजे सिंधिया (जो तलाक़ के बाद अपनी मां के पास लौट आईं) ही उनकी राजनीतिक उत्तराधिकारी बनीं.



राज परिवार का प्रभुत्व

विजयाराजे सिंधिया के राजनीतिक सफ़र की शुरुआत बीजेपी से नहीं हुई, ना ही वो पति जीवाजीराव सिंधिया की वजह से राजनीति में आईं.

अपनी आत्मकथा, ‘द लास्ट महारानी ऑफ़ ग्वालियर’, में वो लिखती हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के न्यौते पर उन्होंने अचानक राजनीति और कांग्रेस में शामिल होने का फ़ैसला कर लिया.

राजसी परिवार का ख़ूब वर्चस्व था और 1957 में वो जब पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ीं तो आराम से जीत गईं.

1961 में पति की मृत्यु के बाद भी सिंधिया राजनीति में सक्रिय रहीं. पर कांग्रेस के अंदरूनी झगड़ों की वजह से पार्टी छोड़ पहले स्वतंत्र पार्टी और फिर 1972 में जन संघ का हिस्सा बनीं.

ग्वालियर, हिंदू महासभा का गढ़ था. विचारधारा में सिंधिया कांग्रेस के मुकाबले हिंदू महासभा की सोच के क़रीब थीं. फिर वो एक सफल राजनेता के अलावा राजसी घराने की आर्थिक मज़बूती भी रखती थीं. ये गठजोड़ दोनों के हित में था.

आपातकाल में अन्य राजनीतिक बंदियों की ही तरह विजयाराजे सिंधिया को भी जेल हुई और जब बाहर आईं तो नई भारतीय जनता पार्टी में उन्हें उपाध्यक्ष का दर्जा दिया गया.

विश्व हिंदू परिषद में भी उन्हें ऊंचा स्थान मिला. 1986 में उनकी अध्यक्षता में विश्व हिंदू परिषद में एक गौ-रक्षा विभाग बनाया गया.

विध्वंस में भूमिका

मां जैसे उनके व्यक्तित्व में सादगी और संयम झलकता था, पर भाषण सीधी बात कहते थे.

सिटिज़न्स ट्राइब्यूनल ऑन अयोध्या’ की 1993 में छपी रिपोर्ट, ‘द कॉन्सपिरेसी ऑफ़ द संघ कम्बाइन’ के मुताबिक नवंबर 1992 में विजयाराजे सिंधिया ने पटना में कहा था, “बाबरी मस्जिद को तोड़ा जाना होगा” और विध्वंस के दिन दिसंबर में उन्होंने अयोध्या में मंच से कारसेवकों को “सर्वश्रेष्ठ बलिदान” के लिए तैयार रहने को भी कहा था.

किताब ‘क्रिएटिंग ए नैश्नेलिटी’ में विध्वंस के दिन की गतिविधियों में उल्लेख है कि विजयाराजे सिंधिया ने कहा-

विजयाराजे के लिए बाबरी विध्वंस उनके राजनीतिक जीवन के ऐसे समय में आया जिसके कुछ ही साल बाद 1998 में उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति छोड़ दी.

हालांकि तब तक उनका रुतबा बना रहा, और वो बीजेपी की उपाध्यक्ष रहीं. तीन साल बाद उनका निधन हो गया.

पर उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा के लिए आंदोलन एक शुरुआत थी. उन्हें इससे ख़ूब लोकप्रियता मिली और वो प्रभावशाली व़क्ता के तौर पर उभरीं.

साध्वी ऋतंभरा अब ‘दीदी मां’ के नाम से जानी जाती हैं, टेलीविज़न के ज़रिए धार्मिक उपदेश देती हैं, देश-विदेश में और ‘क्रूज़ शिप्स’ पर सभाएं करती हैं. 1992 में उन्होंने परमशक्तिपीठ नाम की ग़ैर-सरकारी संस्था बनाई और बाद में औरतों, बच्चों, बुज़ुर्गों के लिए वृंदावन के पास वात्सल्यग्राम नाम का 52 एकड़ का आश्रम बनाया है. पिछले दशकों में वो अलग-अलग राज्यों में अपने स्कूल, हॉस्टल इत्यादि खोलती रही हैं.

राम मंदिर आंदोलन के बाद उमा भारती की पैठ बनी रही, वो 1989 से 2003 तक सांसद चुनकर लोकसभा आईं. कुछ समय के लिए मध्य प्रदेश की मुख़्यमंत्री भी बनीं और एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री पद भी मिला.

पर बीच में बीजेपी छोड़ अपनी पार्टी बनाने का फ़ैसला किया. हालांकि वो बीजेपी में लौट आईं, 2014 में फिर लोक सभा सांसद चुनी गईं और केंद्रीय मंत्री बनीं. 2019 में जब उन्होंने चुनाव ना लड़ने की घोषणा की तो पार्टी ने उन्हें उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया.

इन नेताओं की अपनी राह जैसे भी रही हो, तीन दशक पहले उन्होंने आम हिंदू औरतों के लिए नई ज़मीन ज़रूर खड़ी की. उनके भाषणों ने एक चिंगारी का काम किया और पहली बार तैयार की कारसेवक औरतें.




कारसेवक औरतें

राजनीतिक चेतना

आंदोलन के दौरान हिंदू औरतों के अपने घरों से निकलकर बाहर आने के पीछे भी एक इतिहास था. इसकी नींव कुछ दशक पहले डाली गई थी.

साल 1936 में आरएसएस का महिला धड़ा, राष्ट्रसेविका समिति काम करने लगा था.

आरएसएस शाखाओ में पुरुषों को पार्को में, शारीरिक व्यायाम और हिंदू धर्म के इतिहास, संस्कृति का अध्ययन कराया जाता था. अब ऐसी शाखाएं औरतों के लिए भी आयोजित होने लगीं.

कुछ दशकों बाद ये औरतें तब सामने आईं, जब 1960 के दशक में भारतीय जन संघ (तत्कालीन बीजेपी) ने गौ हत्या के विरोध को एक राजनीतिक मुद्दा बनाया.

साल 1980 में पार्टी ने अपना महिला धड़ा, भारतीय महिला मोर्चा शुरू किया.

इन सभी इकाइयों ने औरतों का काडर बनाया और इसमें उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और व्यापारी वर्ग की औरतों को शामिल किया.

इन संगठनों में कार्यरत औरतें, या संघ परिवार के मर्दों के परिवारों की औरतें कई और तरीकों से अपना संदेश आम औरतों तक लेकर गईं.

ड्यूक विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर सुचेता मज़ूमदार के मुताबिक औरतों को अनौपचारिक तरीके से संगठित करने और विचारधारा फैलाने का एक तरीका था एक-दूसरे की मदद करना फिर वो नई बहू हो, नई मां या पड़ोस की औरतें. इसके ज़रिए संघ का संदेश फैलाया जाता था.

अपने लेख, ‘वुमेन ऑन द मार्च’, में सुचेता लिखती हैं कि -



बजरंग दल की ही तर्ज़ पर औरतों को संगठित करने के लिए 1984 में विश्व हिंदू परिषद के महिला विंग, दुर्गा वाहिनी, की स्थापना हुई.

इसमें ख़ास तौर पर आर्थिक रूप से कमज़ोर और पिछड़ी जातियों की महिलाओं को शामिल किया जाने लगा.

‘फूल नहीं चिंगारी’

दुर्गा वाहिनी की वेबसाइट के मुताबिक राम जन्मभूमि आंदोलन में वाहिनी की औरतों ने बेहद सक्रिय भूमिका निभाई.

आगे लिखा है, “अयोध्या के रक्त-रंजित माहौल में, उन्हें अपने साधारण कोमल रूप को त्याग कर एक प्रभावशाली मुद्रा अपनाते हुए जीती-जागती औरतों की एक ज़िंदा दीवार बनाई ताकि उनके भाई, जिन पर सुरक्षा बल लाठियों और गोलियों से वार कर रहे थे, उनको बचाया जा सके.”

साध्वी ऋतंभरा दुर्गा वाहिनी की राष्ट्रीय संयोजिका यानी अध्यक्ष हैं.

शाखा या दुर्गावाहिनी के शिविर में जानेवाली औरतें, साड़ी नहीं सलवार-कमीज़ पहनती थीं. दुर्गा वाहिनी की वेबसाइट के मुताबिक युनीफ़ॉर्म में, ‘सफ़ेद सलवार, सफ़ेद कुर्ता, भगवा चुनरी, सफ़ेद कपड़े का जूता, जुराबें और दुर्गा वाहिनी के नाम से चिन्हित बेल्ट’ ज़रूरी है.

ये उन औरतों को मर्दों की सार्वजनिक दुनिया में एक नई पहचान देती थी. साध्वी ऋतंभरा और उमा भारती के ऑडियो टेप्स ने घर में रहनेवाली औरतों के निजी जीवन में राजनीति को दाख़िल करने का अहम् काम किया.

राजनीति और जेंडर पर शोधकर्ता, अमृता बासु अपने लेख ‘फ़ेमिनिज़म इनवर्टिड’ में लिखती हैं, “ये लगभग वैसा ही था जैसा महात्मा गांधी ने किया जब उन्होंने स्वदेशी आंदोलन में औरतों को चरखा कातने के ज़रिए जोड़ा और ब्रितानी शासन का विरोध दिखाने के ऐसे ही अन्य तरीके अपनाए जिनसे घर बैठे औरतों को लड़ाई का हिस्सा होने का अहसास मिले.”


इन भाषणों में मुसलमान समुदाय के प्रति बैर की भावना को भड़काया. मसलन साध्वी ऋतंभरा ने अपने एक भाषण में कहा था कि -

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देशभर में फैले दंगों में दो हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए.
नारीवादी लेखक ऊर्वशी बुटालिया के मुताबिक, कई हिंदू औरतों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा, लूटपाट और उनकी औरतें के साथ दुर्व्यवहार पर कोई अफ़सोस नहीं ज़ाहिर किया क्योंकि उनके मुताबिक मुसलमान समुदाय ‘पीड़ित’ नहीं हो सकता था.

आंदोलन के दौरान औरतों में एक नारा बुलंद हुआ, “हम भारत की नारी हैं, फूल नहीं चिंगारी हैं”.
1993 में मानुषी पत्रिका में मधु किश्वर लिखती हैं कि, “औरतों ने दंगाईयों के टोलों की अगुवाई की, मुसलमान औरतों और बच्चों को खींच कर सड़कों पर निकाला, उनके सामूहिक बलात्कार के लिए उकसाया और मुसलमान औरतों को पत्थर मारने और आग लगाने में मर्दों के साथ शामिल हुईं.”

समय के साथ मज़बूत हो रहे औरतों के काडर में उतनी ही नफ़रत घुल चुकी थी जितनी मर्दों में.

विध्वंस के बाद हुए दंगों के बारे में मधु किश्वर लिखती हैं, “दक्षिण-पंथी संगठन शिव सेना की औरतें सड़कों पर बैठ जातीं, ताकि ट्रकों में लदा राहत का सामान दंगा-पीड़ित मुस्लिम इलाकों तक ना पहुंचे, और कर्फ़्यू के दौरान अगर शिव सेना का कोई नेता गाड़ी में हथियार ले जाते हुए पकड़ा जाए तो सड़कों पर लेट जातीं ताकि उसे पुलिस ना ले जा सके.”



धर्म की राजनीति

उस व़क्त में हिंदू औरतों की पहचान सिर्फ़ औरत के नाते नहीं थी बल्कि धर्म के प्रति उनकी निष्ठा और कर्तव्य से जुड़ी थी.

प्रोफ़ेसर मनीषा सेठी अपने लेख ‘एवेन्जिंग एन्जल्स ऐंड नरचरिंग मदर्स’ में कहती हैं कि, “संकट के व़क्त में औरतों को प्रतिशोध लेनेवाले फरिश्ते का रूप लेने की इजाज़त दे दी जाती है और जब वो क्षण बीत जाते हैं, तो वो वापस परवरिश करनेवाली मां और आज्ञाकारी पत्नी की भूमिका में लौट जाती हैं.”

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि परिवारों को औरतों के ‘धार्मिक’ काम के लिए बाहर निकलने में परेशानी नहीं थी और ज़्यादातर औरतें निकली भी अपने पति या रिश्तेदारों के साथ, पर ये समझना ज़रूरी है कि ये आंदोलन दरअसल ‘राजनीतिक’ था.

1984 के लोकसभा चुनाव में दो सीटें जीतने के बाद, 1989 के अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राम मंदिर को अपना मुख्य मुद्दा बनाया और 89 सीटें जीतीं. सितंबर 1990 में एल.के.आडवाणी ने राम रथ यात्रा निकाली.

प्रोफ़ेसर सेठी ने कहा -

उनके मुताबिक आंदोलन के बाद संघ की राजनीति में महिलाएं लंबे समय तक, राष्ट्रीय सेविका समिति, दुर्गा वाहिनी और महिला मोर्चा जैसे धड़ों तक ही सीमित रहीं, और संगठनों की मुख्य धारा में उनके प्रतिनिधित्व में बहुत बढ़ोत्तरी नहीं आई.


Report: Divya Arya
Illustrations: Puneet Barnala
Images: Getty
Production: Shadab Nazmi
Published on: 29 September 2020