पंजाब में 'आप' की ज़मीन कितनी मजबूत

  • सीमा मुस्तफा
  • वरिष्ठ पत्रकार
अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी

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लोकसभा चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी ने पंजाब में चार सीटों के साथ खाता खोला और उसे लगा कि आने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में इस कामयाबी को भुनाया जा सकता है.

आम आदमी पार्टी को इस कृषि प्रधान राज्य के गांवों में अच्छी प्रतिक्रिया मिली. यह अकाली दल और कांग्रेस जैसी पारंपरिक पंजाबी पार्टियों के लिए भी हैरत की बात थी.

आज पंजाब की राजनीति में 'आप' उस मुकाम पर है जहां उसे एक मजबूत दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है और पार्टी चुनाव जीतने की उम्मीद भी पाले हुए है.

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बड़ी तादाद में ग्रामीण इलाकों के सिखों को आकर्षित किया है.

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 'नोटबंदी' के मामले पर बीबीसी हिंदी से बात की.

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उनके समर्थकों को इस बात का पूरा भरोसा है कि अरविंद केजरीवाल पंजाब के सियासी दंगल में बीजेपी-अकाली दल गठजोड़ को चित करने के साथ-साथ कांग्रेस को भी पटखनी दे पाएंगे. 'आप' समर्थकों को लगता है कि वे राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने जा रहे हैं.

एक रणनीति के तहत 'आप' अकाली दल के दिग्गजों के खिलाफ मजबूत उम्मीदवारों को उतारने की तैयारी कर रही है. ऐसी रिपोर्टें आई हैं कि जरनैल सिंह को पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ चुनावी मैदान में उतारा जा सकता है.

जरनैल सिंह फिलहाल दिल्ली विधानसभा के सदस्य हैं. सिखों के खिलाफ हुई हिंसा के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार मानने वाले जरनैल सिंह ने तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंककर सुर्खियों में आए थे.

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क्रिसमस के ठीक एक दिन बाद वामपंथी गायक और दलित आइकन बंत सिंह झब्बर आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए.

केजरीवाल के लिए झब्बर का आना एक बड़ी कामयाबी है. क्योंकि झब्बर इससे पहले तक आम आदमी पार्टी के नाम पर तैयार नहीं थे. दस साल पहले गांव की अगड़ी जाति के लोगों के एक हमले में उन्होंने एक हाथ और एक पैर गंवा दिया था.

पंजाब की जीत केजरीवाल और उनकी पार्टी दोनों के लिए ही अहम है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का चुनाव जीतने के बाद भी आम आदमी पार्टी अपनी हैसियत में कोई ज्यादा इजाफा नहीं कर पाई. क्योंकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है और इससे हासिल होने वाली ताकत से वह मरहूम है.

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पंजाब वो जगह है, जहां पार्टी के लिए साफ तौर पर एक मौका है. यहां मिलने वाली जीत आम आदमी पार्टी को वो सियासी जमीन मुहैया कराएगी जो केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं को हकीकत में बदल सकते हैं. दूसरे लफ्जों में कहा जाए तो पंजाब फतह करने का मतलब केजरीवाल के लिए राष्ट्रीय फलक पर अवतरण होगा.

आप गोवा में चुनाव लड़ेगी और मुमकिन है कि गुजरात में भी वह मैदान में उतरे. केजरीवाल इन राज्यों का नियमित रूप से दौरा करते रहे हैं और दोनों ही जगहों पर सत्तारूढ़ बीजेपी को निशाने पर लेते रहे हैं.

हालांकि आप के लिए पंजाब की अहमियत सबसे ज्यादा है लेकिन गोवा में भी वह खुद को गंभीर खिलाड़ी के तौर पर पेश करना चाहती है.

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लेकिन गुजरात में केजरीवाल और आप को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में केजरीवाल ने दलितों और पटेलों को आम आदमी पार्टी से जोड़ने की पूरी कोशिश की है.

लेकिन भले ही गुजरात में केजरीवाल के चाहने वाले हों लेकिन उनकी पार्टी के संगठन की कोई असरदार मौजूदगी वहां देखने को नहीं मिलती है.

ये बात समझना दिलचस्प है कि केजरीवाल ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को अपने जनाधार के मुताबिक ही ढाला है. उन्हें इसका एहसास दिल्ली में हुआ और उनकी सियासी जमीन भी यहीं है.

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उन्होंने उन राज्यों पर ध्यान देने का फैसला किया जहां बीजेपी और कांग्रेस का सीधा मुकाबला था और कोई क्षेत्रीय पार्टी वजूद में नहीं थी.

पंजाब में अकाली दल मजबूत है लेकिन उसके साथ बीजेपी है. गुजरात, गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में किसी तीसरी पार्टी का वजूद नहीं है और ये राज्य आप के रेडार पर भी हैं. केजरीवाल को उम्मीद है कि राज्य विधानसभा चुनावों में वे अपने लिए जगह बना सकते हैं.

इससे पहले वे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पैठ बनाना चाहते थे लेकिन फिलहाल उनकी प्राथमिकता वे राज्य हैं जहां कामयाबी पाने की गुंजाइश है. इन सूबों में क्षेत्रीय पार्टियों की सशक्त मौजूदगी भी इसकी एक वजह है.

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साल 2019 के लोकसभा चुनावों में उतरने के लिए केजरीवाल कमर कस चुके हैं. उन्होंने किसी भी विपक्षी पार्टी के साथ किसी तरह कोई राफ्ता नहीं कायम किया है और विपक्षी राजनीति के नाम पर इन दिनों जो कुछ भी हो रहा है, वे सोच समझकर इससे दूरी बरतते हैं.

एक तरह से कहा जा सकता है कि केजरीवाल एकला चलो की नीति पर चल रहे हैं. यहां तक कि बीजेपी से मुकाबले के लिए भी उन्होंने कभी किसी का समर्थन नहीं मांगा है जबकि उनकी सरकार पर बहुत दबाव रहता है.

आम आदमी पार्टी के नेता को ये बात पता है कि सबसे बड़े पद के कई दावेदार होते हैं, भारतीय राजनीति में यह हमेशा से होता आया है. अभी केजरीवाल इन झमेलों से बचकर आगे बढ़ रहे हैं.

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उनका अपना अजेंडा है और इस पर गठबंधन की राजनीति का कोई दबाव नहीं है. वे बीजेपी और कांग्रेस दोनों का ही विरोध करते हैं और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों से भी किसी तरह के समझौते के मूड में नहीं दिखते.

दिल्ली जीतकर उन्होंने 'क्षेत्रीय पार्टी के ठप्पे' से अपनी पार्टी को बचा लिया है. उनका इरादा राष्ट्रीय फलक पर बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरने का है. इसलिए 2017 आम आदमी पार्टी के लिए अहम है.

पंजाब की जीत उन्हें इस राह पर आगे ले जाएगी. हार वो चीज है जिसके बारे में आम आदमी पार्टी इस मोड़ पर कतई नहीं सोच रही होगी.

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