साल 2013 की हिन्दी किताबें, संपादकों की पसंद

  • 31 दिसंबर 2013
हिन्दी में किताबें

ये कहना क़रीब-क़रीब फ़ैशन हो गया है कि हिंदी में अच्छी किताबें नहीं आतीं. वहीं ऑल्टरनेट फ़ैशन स्टेटमेंट है कि अच्छी किताबें तो आती हैं, पर उन्हें पढ़ने वाले सुधी पाठक ही नदारद हैं.

बहुत से लोगों के लिए हिंदी 'कूल' नहीं है. फिर भी हिंदी में जितने 'विषय' हैं, उससे ज़्यादा 'विषय विशेषज्ञ' हैं.

ऐसे में हमने तय किया कि हम हिंदी साहित्य में रचे-बसे लोगों से ही पूछें कि उनके लिहाज से साल 2013 में हिंदी में कौन-कौन सी उल्लेखनीय किताबें आई हैं.

कहना न होगा हम 'बेस्ट' या 'बेस्टसेलर' किताबों की तलाश में नहीं थे. कोशिश बस यह थी कि कुछ चुनिंदा लोग पाठकों को बताएँ कि बीते साल में उन्हें कौन सी किताबें पसंद आईं. शृंखला की पहली कड़ी में संपादकों की पसंदीदा किताबें.

आलोक श्रीवास्तव, संपादक, 'अहा ज़िंदगी'

Image caption पेशे से पत्रकार आलोक 'अहा ज़िंदगी' के संपादक हैं.

अगर हिंदी के मौलिक साहित्य की बात करें तो मुझे नहीं लगता कि हिंदी में कोई उल्लेखनीय चीज़ आई है. जहाँ तक मेरी जानकारी है, इस साल मुख्य रूप से किताबों के अनुवाद बेहतर आए हैं. हिंदी कविता और साहित्य के संग दिक़्क़त यह है कि अच्छी चीज़ें तो हैं, पर उनमें दोहराव बहुत है. विचार और अनुभव के स्तर पर कोई नई चीज़ घटित नहीं हो रही है.

  • पेंगुइन बुक्स इंडिया से हिंदी में आई ओरहान पामुक की किताबें. खासकर उनका उपन्यास स्नो.
  • पेंगुइन से ही आई पैट्रिक फ्रेंच की किताबों के अनुवाद काफ़ी महत्वपूर्ण हैं.

पामुक और फ्रेंच की किताबें हिंदी पाठकों के मानसिक क्षितिज को बढ़ाने में काफी मदद करेंगी.

  • पेंगुइन बुक्स ने ही वीएस नॉयपॉल की कई किताबें छापी हैं. उनमें नॉयपॉल का यात्रा विवरण उल्लेखनीय है.

भारत को देखने के लिए जो नज़रिया नॉयपॉल की पुस्तकों में है, उसकी 1960 और 70 के दशक में काफी आलोचना की गई थी. आज लगता है कि भारत को देखने-जानने के लिए वह काफ़ी उपयोगी हो सकता है.

  • कविताओं में साहित्य अकादमी से प्रकाशित फ्रांसीसी कविताओं का अनुवाद उल्लेखनीय है.
  • नेशनल बुक ट्रस्ट ने हिंदी लेखकों की चुनिंदा कहानियों की शृंखला प्रकाशित की है.

हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से यह शृंखला काफ़ी महत्वपूर्ण है.

  • नेशनल बुक ट्रस्ट ने ही विज्ञान का क्रमिक विकास नामक पुस्तक प्रकाशित की है. इसके लेखक हैं रामदास चौधरी.

इस विषय पर यह एक बहुत महत्वपूर्ण और अच्छी पुस्तक है.

गिरिराज किराडू, संपादक, प्रतिलिपि बुक्स

Image caption गिरिराज प्रतिलिपि बुक्स और द्विभाषी पत्रिका 'प्रतिलिपि' के संपादक हैं.
  • दर दर गंगे: अभय मिश्र, पंकज रामेंदु (पेंगुइन बुक्स)

गंगोत्री से गंगा सागर तक गंगा नाम की सर्रियल नदी के साथ यात्रा करते दो पत्रकार, जो गंगा आंदोलन के भी सुपरिचित चेहरे हैं. एक नायाब सांस्कृतिक डॉक्यूमेंट्री जो आधुनिक विकास के आर-पार देखने वाली आंदोलनकारी नज़र से लेकिन उदास, सपना देखने वाले कवियों के ज़िगर से बनी है; साथ ही एक चौकन्नी 'फ्यूचर स्टडी भी' क्यूंकि इसके लेखक जानते हैं - 'भविष्य को जानने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि उसे खुद लिखा जाए'.

  • मार्केज़ - जादुई यथार्थ का जादूगर: प्रभात रंजन (वाणी प्रकाशन)

लातिन अमेरिकी उपन्यासकार गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ जैसे जीवित लेजेंड के बारे में एक ऐसी किताब जो खुद मार्केज़ के लेखन की तरह हर तरह के पाठक को अपना पाठक मानती है और उस तक पहुँचती है. प्रभात रंजन हमारे सम्मुख मार्केज़ को अपने पूरेपन में लाते हैं. एक 'सचमुच' के 'महान' लेखक के बारे में उसकी 'महानता' के आतंक से बचकर लिखी हुई एक साहसी किताब.

  • बम संकर टन गनेस: राकेश कुमार सिंह (हिंदी युग्म)

बिना प्रिटेंशन के लिखी हुई एक मनचली शै जो कभी नृशास्त्रीय या सबाल्टर्न अध्ययन होने के क़रीब चली जाती है, तो कभी क़िस्सागोई के, तो कभी आत्मकथा के, जो कभी किताब होने के बहुत करीब आ जाती है तो कभी चौपाल होने के.

  • जंक्शन: चन्दन पाण्डेय (भारतीय ज्ञानपीठ)

इस संकलन को जिस कहानी के शीर्षक से नाम मिला है वह कहानी - जंक्शन - युवा कथाकार चन्दन पाण्डेय की अब तक की सबसे अच्छी कहानी ही नहीं है, शायद इधर के सालों में सामने आई युवा-पीढ़ी की भी सबसे अच्छी कहानी है. फिक्शन का एक ख़ास स्वरूप जो ख़ास उत्तर भारतीय लाचारी, क्रूरता, बेचैनी और चालाकी से बनता है.

  • नये युग में शत्रु: मंगलेश डबराल (राधाकृष्ण)

हमारे वरिष्ठ लेखक 1990-92 के बाद का समाज समझने की कोशिश में अक्सर नॉस्टेल्जिक ही नहीं अक्षम और अपराधबोधग्रस्त भी नज़र आते हैं. मंगलेश डबराल का यह संकलन इस नए समाज में कवि होने की मुश्किलों, उसकी ज़रूरत और असमानता की सरंचनाओं को समझने की एक बेचैन कोशिश है. यह संग्रह इस कोशिश की सफलताओं के साथ इसकी असफलताओं के कारण भी एक पठनीय पुस्तक है.

  • हिंदी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवानः पुरुषोत्तम अग्रवाल (राजकमल प्रकाशन)

अपनी आलोचना से हिंदी परिदृश्य में उपनिवेशवाद की समझ और अस्मिता विमर्शों को प्रश्नांकित करने वाले पुरुषोत्तम अग्रवाल के निष्कर्षों और अंततः उसे संचालित करने वैचारिकी या राजनीति से असहमत लोगों के लिए भी उनके गद्य की सहजता और गहराई को नकार पाना मुश्किल रहा है. यह किताब एक बेहद पठनीय यात्रा वृतांत के धोखे में एक जटिल सांस्कृतिक पड़ताल.

लाल सिंह दिल: प्रतिनिधि कविताएँ - अनुवाद एवं संपादन: सत्यपाल सहगल (आधार प्रकाशन)

इस चयन में हिंदी में लिखी किताबें शामिल किया जाना ही अपेक्षित रहा होगा लेकिन इस एक 'अनुवाद' के बिना यह 'मूल' अधूरा रहता. पंजाब के इस मलंग, क्रांतिकारी कवि का हिंदी में एक पक्का ठिकाना हो जाना उसकी याद पर अमल करने की दिशा में बस पहला कदम भर है.

  • सत्यापन: कैलाश वानखेड़े (आधार प्रकाशन)

ये किताब एक बड़ी संभावना की और इशारा करती है- हिंदी अस्मितामूलक लेखन के एक नए दौर में प्रवेश करने की संभावना. शीर्षक कहानी एक मार्मिक रूपक ही नहीं निर्मित करती बल्कि इस बात की खोज करती है कि कैसे एक ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रिया मानवीय अस्तित्व को परिभाषित करने वाली दार्शनिक केटेगरी में बदल जाती है.

  • क़यामत: राही मासूम रज़ा (राजकमल प्रकाशन)

यह उपन्यास देवनागरी में उपलब्ध हो जाने से अब राही मासूम रज़ा के क्लासिक 'आधा गाँव' और बाकी लेखन को एक नये सिलसिले में देखा पढ़ा जा सकता है. एक खामोश उपलब्धि साल की.

  • जुलाई की एक रात: दुष्यंत (पेंगुइन बुक्स)

ऐसा लोकप्रिय साहित्य जो चेतन भगत या अमीष त्रिपाठी की ख़राब नक़ल न हो और जो बिना दकियानूस दिलचस्पियों को बढ़ावा दिए अपने पाठक को कायल करना चाहे, इस समय हिंदी की सबसे बड़ी ज़रूरतों में है. दुष्यंत की यह किताब प्रायः 'महानता' के न्यूरोसिस के शिकार परिदृश्य में एक अच्छी कॉफी की तरह है.

सत्यानंद निरुपम, संपादकीय निदेशक, राजकमल प्रकाशन समूह

Image caption सत्यानंद राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक हैं.

मैं बतौर संपादक गुणवत्ता और स्तरीयता के स्तर पर अपने 'अगर-मगर' कायम रखते हुए भी इन- साहित्यिक, लोकप्रिय और लोकोपयोगी- किताबों का चयन कर रहा हूँ. मेरी पसंद की कुछ किताबें विधा का मानक आज नहीं भी हो सकतीं, लेकिन मुझे उम्मीद है कि पाठकीयता का विस्तार इनसे ज़रूर संभव है. यह कहना ठीक समझता हूँ कि स्तरीयता का नया उठान ऐसी किताबों के बीच से निकल सके, तो शायद हिंदी पाठक समाज का परिदृश्य वाकई बदल सकता है.

  • ऑस्कर अवार्ड्स: यह कठपुतली कौन नचावे (सिनेमा): रामजी तिवारी (प्रकाशक: द ग्रुप, ए सिनेमा इनिशिएटिव ऑफ़ जन संस्कृति मंच)

लोकप्रिय लगने वाले अछूते विषय की शानदार तैयारी के साथ सुरुचिपूर्ण प्रस्तुति.

  • उपन्यास के रंग (आलोचना) : अरुण प्रकाश (प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन)

आलोचना की तैयारी और प्रस्तुति की रोचकता का मानक सरीखी किताब.

  • 'कविता कितबिया' शृंखला में (क) बेरोजगारी की कविताएँ (ख) डर की कविताएँ (ग) मृत्यु की कविताएँ (काव्य-संकलन): संपादक: गिरिराज किराडू, अशोक कुमार पाण्डेय (प्रकाशक: प्रतिलिपि बुक्स और दखल प्रकाशन)

एक कितबिया का मूल्य केवल 25 रुपये और सुरुचिपूर्ण प्रकाशन! मेरे विचार से इस तरह की सुचिंतित पुस्तक-योजनाओं की हिंदी में अधिक से अधिक ज़रूरत है.

  • दर-दर गंगे (यात्रा वृतांत): अभय मिश्र, पंकज रामेन्दु (प्रकाशक: पेंगुइन हिंदी)

अगर-मगर की गुंजाइश इस किताब के साथ है, लेकिन हिंदी को ऐसी और किताबों की ज़रूरत है.

  • दास्तान मुग़ल महिलाओं की: हाशिए से संवरता समानान्तर इतिहास (इतिहास): हेरम्ब चतुर्वेदी (प्रकाशक: लोकभारती प्रकाशन)

इतिहास की अनसुलझी-अनसुनी-कमसुनी कहानियों को प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत करने वाली रोचक किताब.

  • नमक स्वादानुसार (कहानी) : निखिल सचान (प्रकाशक: हिंदी युग्म)

नए पाठक तैयार करने वाली लोकप्रिय किताब

  • भारत का राष्ट्रीय वृक्ष और राज्यों के राज्य वृक्ष (प्राकृतिक संपदा, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण): परशुराम शुक्ल (राधाकृष्ण प्रकाशन)

लोकोपयोगी किताब जो बहुत तैयारी के साथ लिखी गई है, और भी बेहतर प्रस्तुति की हकदार.

  • मुहम्मद रफ़ी: हमारे अब्बा- कुछ यादें (जीवनी): यास्मीन खालिद रफ़ी (प्रकाशक: यात्रा बुक्स- ट्रेन्केबार)

नए पाठक तैयार कर सकने वाली किताब.

  • तीन सौ रामायणें एवं अन्य निबंध: ए. के. रामानुजन का आलेख: विवाद और विमर्श : संपादक: संजीव कुमार (प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन)

समसामयिक मसले पर एक ऐसी सुसंपादित किताब जो अपनी पूरी प्रस्तुति में एक मानक का दर्जा ले सकती है.

  • शमशेर का संसार (आलोचना): रमण सिन्हा (प्रकाशक: वाणी प्रकाशन)

एक कवि के काव्य-कर्म, गद्य-कर्म और चित्र-कर्म को समानांतर रखकर उसे समझने का अनूठा आलोचकीय उद्यम.

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