क्या लोगों ने ही बढ़ाई चेन्नई की मुश्क़िल?

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यह तस्वीर मंगलवार सुबह दो बजे चेन्नई के गिन्डी टेक पार्क के पास की है. इसे एक आईटी कंपनी कर्मचारी ने ली है.

यह रोशनी उन कारों की है, जो बारिश के बाद जाम में फंसी थी. इसी सड़क से कोई भी व्यक्ति हवाई अड्डे से चेन्नई शहर की ओर आता है.

जुलियन को क़रीब सौ साथियों के साथ सोमवार रात अपने ऑफ़िस में गुज़ारनी पड़ी क्योंकि बारिश के पानी की वजह से उनको घर तक ले जाने वाली कारें ऑफ़िस तक नहीं पहुंच पाईं.

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अपनी पहचान बताने से मना करते हुए जुलियन ने बीबीसी को बताया, "कंपनी ने सोचा कि हमें ख़तरे में डालने के बजाय यहीं सोने की व्यवस्था कर दें. ऐसा ही टेक पार्क में मौजूद आसपास की कई कंपनियों ने किया".

ट्रैफ़िक जाम में ही एक कार में फंसी दीपा ने बताया कि उन्हें नौ किलोमीटर तय करने में क़रीब पांच घंटे लग गए. उनके मुताबिक़ तब बहुत बारिश नहीं हो रही थी, लेकिन उन्हें संदेह है कि आसपास के किसी तालाब के ऊपर से पानी बह रहा था या वहां से पानी छोड़ा गया था.

स्थानीय मीडिया ने सूत्रों के हवाले से ख़बर दी है कि पिछले दो-तीन दिन में शहर को पीने का पानी मुहैया कराने वाले आसपास के तीन-चार जलाशयों से पानी छोड़ा गया. हालांकि अधिकारी इससे इनकार कर रहे हैं.

कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि स्थानीय प्रशासन की तैयारियां पूरी नहीं थी.

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हालांकि कुछ स्थानीय लोग इसे दूसरे तरीके से देखते हैं. चेन्नई हाईकोर्ट में वकील अनंत कृष्ण कहते हैं, "आप सीधा सरकार पर आरोप नहीं लगा सकते, क्योंकि लोगों ने भी तालाबों की तलहटी पर ऊंचे-ऊंचे मकान बना लिए हैं. इसलिए जब भी बारिश होती है निचले इलाक़े में पानी भर जाता है. यह सब हमारी ही वजह से हुआ है. इसकी ज़िम्मेदारी हमें ख़ुद लेनी होगी."

ग़ैरसरकारी संगठन (एनजीओ) 'अर्थ केयर' की प्रमुख जयश्री वेंकटेशन कहती हैं, "चेन्नई शहर कोयंबटूर की तरह मूल रूप से तटीय शहर है. यहां जो भी विकास हुआ है वो शहर के दक्षिण की तरफ़ हुआ है, जो एक नमी वाली जगह है. वहां से पानी के भाप बनकर उड़ने का कोई रास्ता नहीं बचा है, क्योंकि 70 फ़ीसद ज़मीन पर लोगों ने घर बना लिए हैं."

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