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उम्मीद की किरण बना पहला प्रवासी दिवस

प्रवासी भारतीयों को देश से जोड़ने का मक़सद लेकर राजधानी दिल्ली में नौ से 11 जनवरी 2003 के बीच पहले प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन हुआ था.

विदेश मंत्रालय और फ़िक्की की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में 61 देशों के लगभग 2000 विदेशी प्रतिनिधियों और देश के लगभग 1200 लोगों ने हिस्सा लिया.

इस मौक़े पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय मूल के लोगों को दोहरी नागरिकता देने की बात कही.

इसके अलावा खाड़ी देशों में भारतीय श्रमिकों की स्थिति पर चिंता को देखते हुए बीमा योजना और कल्याण कोष के गठन की भी बात हुई.

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत अवसरों की भूमि के रूप में उभर रहा है. उनका कहना था, “सरकार ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रही है जिससे आप यहाँ भी वैसा ही बेहतरीन काम कर सकें जैसा आप किसी भी दूसरे जगह कर सकते हैं. हम आपका निवेश नहीं आपके विचार चाहते हैं.”

प्रवासी भारतीयों का सहयोग याद करते हुए वाजपेयी ने कहा कि देश कई मौकों पर दिए इस सहयोग की प्रशंसा करता है.

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित मॉरिशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ ने मॉरिशस के निर्माण में भारतीयों की भूमिका याद की.

स्वागत भाषण में विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि प्रवासी भारतीय जिस देश में रह रहे हैं वहाँ उन्होंने पूरी निष्ठा,लगन, परिश्रम और सफलता से काम किया है.

वहीं कार्यक्रम की आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉक्टर एलएम सिंघवी ने नौ जनवरी को एक ऐतिहासिक दिन बताया.

डॉक्टर सिंघवी उस उच्च स्तरीय समिति के अध्यक्ष भी रहे हैं जिसने प्रवासी भारतीयों के बारे में सरकार को लगभग 160 अनुशंसाएँ की हैं.

कार्यक्रम की शुरुआत भारत रत्न पंडित रवि शंकर के सितार और भारत रत्न डॉक्टर उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान की सुरीली शहनाई से हुई. ये कार्यक्रम ‘मिलाप’ नाम से हुआ.