सिवानः 'कमज़ोर कभी ताक़तवर से नहीं लड़ता'

  • 22 सितंबर 2016

सिवान के 'हॉस्पिटल' रोड पर 16 अगस्त 2004 को गहमा-गहमी थी, जब चंद्रकेश्वर प्रसाद की दुकान पर कुछ हथियारबंद लोगों ने धावा बोल दिया था.

मगर भीड़-भाड़ वाली इस सड़क पर कोई भी ऐसा नहीं था, जो उनके बेटों की मदद के लिए आगे आए. इसकी साफ़ वजह थी, हमला करने वाले दबंग लोग थे, जिनसे कोई दुश्मनी मोल लेना नहीं चाहता था.

उसके बाद जो कुछ हुआ उसे सिवान की सबसे क्रूर वारदातों में से एक माना जाता है. चन्द्रकेश्वर प्रसाद के दो बेटों को तेज़ाब में नहला कर उनकी ह्त्या कर दी गई. उस दिन चन्द्रकेश्वर प्रसाद किसी काम से पटना गए हुए थे.

वो बताते हैं, "मैंने ख़बर अख़बार में पढ़ी. ये मेरे बच्चों के बारे में थी. जब पटना से अपने घर फोन किया तो किसी ने नहीं उठाया. पड़ोसियों ने बताया कि मेरे परिवार में किसी का कोई अता पता नहीं."

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चंदा बाबू के नाम से जाने जाने वाले चंद्रकेश्वर प्रसाद परचून की दुकान चलाते थे. इसी बीच उन्होंने हॉस्पिटल रोड पर मकान बनाया और उसमें दो दुकानें भी बनवाईं. उनकी अपनी ग़ल्ले की दुकान बाज़ार में थी, जिसमे वो ख़ुद अपने बड़े बेटे के साथ बैठा करते थे.

मगर उस दिन को याद कर उनका दिल सिहर उठता है जिस दिन से उनके दो बेटे लापता हुए थे.

चन्दा बाबू कहते हैं कि उनके नए मकान पर कुछ लोग आए थे और दो लाख रुपए की मांग की थी.

वो कहते हैं, "उन लोगों का संबंध राजद नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन से था. बेटों ने विरोध किया तो हमला करने वालों ने उनको पीटना शुरू कर दिया. बचाव में हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले उनके एक बेटे ने, वहां रखी तेज़ाब की बोतल फेंक कर अपने भाई को बचाने की कोशिश की.''

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "तेज़ाब की छीटें हमलावरों पर पड़ीं और वो भाग निकले. फिर कुछ देर के बाद बहुत सारे लोगों का हुजूम आया और मेरे तीनों बेटों राजीव, सतीश और गिरीश को जबरन उठाकर ले गए. उन्हें शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर ले जाया गया. वहाँ सतीश और गिरीश को एक कमरे में और राजीव को दूसरे कमरे में बंद किया गया."

इस मामले के संबंध में दर्ज प्राथमिकी में आरोप लगाया गया कि सतीश और गिरीश से तेज़ाब फेंकने का बदला लेने के लिए उन्हें तेज़ाब में नहलाया गया, जिससे उनकी मौत घटनास्थल पर हो गई, जबकि राजीव वहां से भाग निकलने में कामयाब हो गए. वो इस पूरे हत्याकांड के एकमात्र चश्मदीद थे.

यह मामला चल ही रहा था, जब तीन साल के बाद चन्दा बाबू का सबसे बड़े बेटे राजीव सिवान वापस आए तो पूरे मामले का रुख़ ही बदल गया, क्योंकि उन्होंने घटना में शामिल लोगों की पहचान करते हुए मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज करवाया.

मगर कुछ ही दिनों के बाद चन्दा बाबू के तीसरे बेटे राजीव की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई और इस हत्या में मोहम्म्द शहाबुद्दीन को मुख्य साज़िशकर्ता के रूप में नामज़द किया गया.

यह मामला सिवान की निचली अदालत में चलता रहा, जिसने मोहम्मद शहाबुद्दीन को अन्य अभियुक्तों के साथ उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई.

फिर निचली अदालत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ मोहम्मद शहाबुद्दीन ने पटना हाई कोर्ट में अपील की और ज़मानत की अर्ज़ी भी दायर की जो उन्हें मिल गई.

चंद्रकेश्वर प्रसाद के मन में अब ख़ौफ़ है. उन्होंने गाड़ियों के उस क़ाफ़िले को अपने घर की छत से देखा, जब भागलपुर जेल से मोहम्मद शहाबुद्दीन सिवान लौटे.

वो कहते हैं, "हम तो घर में दुबके हुए और डरे हुए थे. गाड़ियों का क़ाफ़िला ऐसा था जैसे चीटियां लाइन से चलती हैं. हमें लगा कि अब हम नहीं जी पाएंगे."

लेकिन उन्हें हैरत है कि जिससे उन्होंने अपनी दुकान का उद्घाटन करवाया, वो अचानक इस तरह उनके बेटों के ख़िलाफ़ कैसे हो गया.

लोगों को इस बात से भी हैरानी है कि कभी शहाबुद्दीन के लिए काम करने वाले उनके बेटे राजीव से अचानक ऐसा क्या हो गया कि दोनों के बीच इस तरह की रंजिश पैदा हो गई और पुलिस की जांच में भी इस रंजिश की वजहों का ख़ुलासा नहीं हो पाया है.

बेटों के हत्यारों को सज़ा दिलाने के लिए चन्दा बाबू को लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी.

वो कहते हैं, "यह लड़ाई नहीं है. कमज़ोर कभी बलवान से नहीं लड़ सकता. हम तो इतने साल से सिर्फ़ इंसाफ़ के लिए फ़रियाद कर रहे हैं. हमारे तीन बेटों की ह्त्या हुई है."

चंदा बाबू की पत्नी कलावती देवी एक कमरे में अपने बिस्तर पर पड़ी-पड़ी शून्य को निहारती और रोती रहती हैं. तीन बेटों की ह्त्या के सदमे की वजह से उन्हें लकवा मार गया है. अब वो चल फिर नहीं सकतीं.

इस बूढ़े दंपत्ति के लिए उनका सबसे छोटा विकलांग बेटा ही सहारा है और चन्दा बाबू को उसकी ज़िंदगी की चिंता खाए जा रही है.

चंदा बाबू का कहना है कि मोहम्मद शहाबुद्दीन को ज़मानत मिलने के बाद कई लोगों ने उन्हें सिवान छोड़कर चले जाने की सलाह दी है.

मगर वो कहते हैं, "अब हम सिवान छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे. इतने साल दर-दर की ठोकरें खाईं. अब यहीं रहेंगे और यहीं मरेंगे. चाहे भगवान मारे या वो लोग....."

वो मोहम्म्द शहाबुद्दीन को हाई कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद काफ़ी निराश हुए. मगर उन्हें सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ़ की उम्मीद है.

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जाने माने वकील प्रशांत भूषण की याचिका पर सुनवाई करते हुए मोहम्म्द शहाबुद्दीन को नोटिस जारी किया है.

याचिका में शहाबुद्दीन को दी गयी ज़मानत को चुनौती दी गई है और अब इस मामले की अगली सुनवाई 26 सितंबर को होनी है.

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