महाराष्ट्र में सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं लाखों मराठे

  • 20 सितंबर 2016
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पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र के छोटे शहरों-क़स्बों, ज़िलों और तालुका मुख्यालयों में लाखों लाख प्रदर्शनकारी सड़कों पर निकल रहे हैं. लेकिन अभी तक इस पर मीडिया का बहुत ध्यान नहीं गया है.

सोमवार को लातूर, अकोला और कई अन्य ज़िलों में भी इसी तरह संयमित और अनुशासनबद्ध लाखों लोगों ने प्रदर्शन किया.

रिपोर्टों के मुताबिक़ सिर्फ़ अकोला ज़िले में ही प्रदर्शनकारियों की क़रीब तीन किलोमीटर लंबी क़तार थी. कहा जा रहा है कि प्रदर्शनकारियों में ज़्यादातर मराठा समुदाय के लोग हैं. इन मोर्चों की शुरुआत औरंगाबाद से हुई. इसके बाद उस्मानाबाद, फिर जलगांव और इसके बाद काफ़ी जगहों पर ये मोर्चे निकाले गए और सबसे दिलचस्प बात ये है कि इनका नेतृत्व कोई नहीं कर रहा.

बीबीसी हिंदी के संपादक राजेश जोशी ने मुंबई में वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स से इस बारे में बात की.

प्रदर्शनकारियों कीइतनी भारी संख्या क्यों?

ये सिलसिला पिछले क़रीब डेढ़ महीने से जारी है. मराठा समाज के लोग हर ज़िलों में लाखों की तादाद में मोर्चा निकाल रहे हैं. दरअसल कुछ महीने पहले अहमदनगर ज़िले में कोपर्डी गांव में एक मराठा लड़की के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी. इसका आरोप कुछ दलित लड़कों पर लगा था. कुछ लोग कहते हैं कि इस घटना के कारण ही इतनी भारी संख्या में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, लेकिन ये बात पूरी तरह सच नहीं है.

इसकी शुरुआत औरंगाबाद से हुई, फिर उस्मानाबाद, जलगांव, नांदेड़, लातूर आदि काफ़ी जगहों पर ऐसे प्रदर्शन होने लगे. प्रदर्शनकारियों की पहली माँग है कि कोपर्डी की घटना के दो फ़रार आरोपियों को जल्द पकड़ा जाए और दोषियों को सज़ा दी जाए,

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दूसरा, मराठा समुदाय गुजरात के पटेलों और हरियाणा के जाटों की तरह ही आरक्षण की मांग भी कर रहे हैं. तीसरा मुद्दा है दलित उत्पीड़न रोकथाम क़ानून में बदलाव की मांग. इस क़ानून की एक धारा के अंतर्गत दलित समुदाय के लोगों को जाति के नाम पर गाली देने या अपमानित करने पर गिरफ़्तारी हो जाती है और मुक़दमा चलाया जा सकता है. मराठा समुदाय के लोगों का आरोप है कि इस क़ानून का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है. ये केंद्र का क़ानून है, इसलिए इसमें संशोधन केंद्र सरकार ही कर सकती है.

अपेक्षाकृत संपन्न मराठा समुदाय को आरक्षण की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?

1990 के बाद ग्लोबलाइज़ेशन का दौर आया जिसमें खेती के सवाल बहुत उग्र हो कर सामने आए हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ मराठा समुदाय महाराष्ट्र की जनसंख्या का 30 फ़ीसदी है यानी क़रीब 4 करोड़ लोग. इनमें से 90 से 95 फ़ीसदी लोग हाशिये पर पड़े किसान या फिर भूमिहीन किसान हैं. वे असिंचित भूमि पर खेती करते हैं और उनका दैनिक जीवन बहुत दर्दनाक है और वे भयंकर ग़रीबी से जूझ रहे हैं. ये मोर्चा खेती पर निर्भर लोगों का आंदोलन है.

महाराष्ट्र में जितने किसानों ने ख़ुदकुशी की है उनमें 90 फ़ीसदी मराठा समुदाय से हैं. आत्महत्या की घटनाओं को सभी किसानों की आत्महत्या बताते हैं, कोई ये नहीं कहता कि मराठा किसान आत्महत्या कर रहे हैं. मराठों की शिकायत है कि सत्ता में मराठा हो या ग़ैर मराठा - वे उनके सवालों और समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते. वे शिक्षा से वंचित हैं. वो कहते हैं कि चूंकि वे सामान्य वर्ग में शामिल हैं इसलिए उन्हें नौकरी भी नहीं मिलती. नौकरशाही में आईएएस, आईपीएस की नौकरियों में भी मराठा समुदाय के लोगों की उपस्थिति नगण्य है. न्यायिक सेवा हो या कॉरपोर्ट क्षेत्र मराठा समुदाय का प्रतिनिधित्व नगण्य है.

इसका राजनीतिक असर क्या होगा?

ये बीजेपी के लिए बुरी ख़बर है क्योंकि महाराष्ट्र में बीजेपी का मुख्यमंत्री ब्राह्मण समाज से है, जिनकी आबादी महाराष्ट्र में तीन से साढ़े तीन फ़ीसदी है. साथ ही स्थापित मराठा नेतृत्व वाली एनसीपी, कांग्रेस जैसी पार्टियां भी घबराई हुई हैं क्योंकि ग़रीब मराठा जाग गया है और बिना किसी नेतृत्व के लाखों की तादाद में सड़कों पर निकल आया है और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात प्रशासन तक पहुंचा रहा है.

नेतृत्वविहीन आंदोलन क्यों?

इस आंदोलन का कोई चेहरा नहीं है. स्कूल और कॉलेज की 5-10 लड़कियां जुलूस के आगे-आगे चलकर कलेक्टर को मांगपत्र देती हैं. इनके पीछे युवतियां, विद्यार्थी, युवक, उनके पीछे सारा समाज और उनके पीछे सारी पार्टियों के नेता रहते हैं और सबसे पीछे सफ़ाई ब्रिगेड होता है जो जुलूस में चल रहे लोगों के फैलाए कचरो को साफ़ करते हैं. इस तरह से चलते हुए ये शहर के सबसे बड़े चौक में जमा होते हैं. रविवार को नांदेड़ में सात से आठ लाख लोग जमा हुए. सोमवार को लातूर में जमा हुए. अब 21 तारीख़ को सोलापुर, फिर पूना, उसके बाद सतारा और फिर कोल्हापुर में मोर्चा निकलेगा. ये पूरा दौर 15 अक्टूबर तक चलेगा.

प्रतिरोध का ये शांतिपूर्ण तरीक़ा किसने दिया? क्या ये एक समाज सुधार आंदोलन बन रहा है?

कोई नाम तो सामने नहीं आया है, लेकिन अमरीका और यूरोप में कंप्यूटर के क्षेत्र में कार्यरत मराठा समुदाय के कुछ युवा लोग हैं. इन्होंने महाराष्ट्र में बीते समय में आए अकाल में भी लोगों की मदद की थी. चूंकि उन्होंने लोगों से बातचीत की थी इसलिए इन समस्याओं से वे वाकिफ़ थे. उसी से ये आंदोलन निकला. अब तो हाल ये है कि एक के बाद दूसरी जगहों में इस आंदोलन को सफल बनाने की लोगों में जैसे स्पर्धा हो रही है. इस आंदोलन में मराठा समुदाय के साथ दूसरे समुदाय के लोग भी शामिल हुए हैं.

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मूल रूप से खेती-किसानी से जुड़ी समस्याओं को लेकर लोग एकजुट हुए हैं. कोपर्डी गांव की घटना से लोग आहत हुए और एक मंच पर आए, लेकिन जो असली कारण है वो है आर्थिक संकट. किसानों के सवालों की लगातार अनदेखी हुई है और कृषि संकट गहराता गया है, उसी के विरोध में लोग एकजुट हो रहे हैं.

गांव में प्याज़ एक रूपए किलो के भाव बिक रहा है, सभी सब्ज़ियों के भाव गिरे हैं, गेहूं और चावल के दाम नहीं मिल रहे हैं. वहीं शहरों में खाने-पीने की चीज़ें तो महंगी हैं ही. साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य भी ऊंचे दाम पर बिक रहे हैं.

आंदोलन की दो मांगें भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. वे हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य का सार्वजनीकरण और सरकारीकरण किया जाए.

क्या ये हिंदू समाज को एकजुट करने का मंसूबा रखने वाले आरएसएस और बीजेपी के लिए बुरी ख़बर नहीं है?

आरएसएस और बीजेपी हिन्दू समाज को जोड़ने की बात करती है, लेकिन समाज के इन खानों में बंटने की बात भी उन्हें पता है. उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद एक मॉडल विकसित किया है कि जहां भी किसानी से जुड़े समुदाय ताक़तवर हैं वहां उन्हें सत्ता की बागडोर नहीं सौंपनी है. इसलिए उन्होंने हरियाणा में ग़ैर जाट को मुख्यमंत्री बनाया है. इसलिए गुजरात में ग़ैर पटेल को मुख्यमंत्री बनाया है और इसलिए महाराष्ट्र में भी एक ग़ैर मराठा को मुख्यमंत्री के पद पर बिठाया है. संख्या में बड़े होने के कारण एकजुट होने पर ये किसी भी नेता को ताक़तवर बना सकते हैं. ये सभी इकट्ठा होकर किस ओर जाएंगे ये कारण अभी पता नहीं चल पाया है.

इस पूरे आंदोलन के पीछे कौन लोग हैं और उनकी रणनीति क्या है ये अभी साफ़ नहीं हो पाई है. ये किसका आयोजन है, कौन इसके पीछे है, किससे बात करनी है या इस आंदोलन को असफल कैसे किया जाए ये नहीं समझ में आने के कारण आरएसएस और बीजेपी सिर्फ़ वेट एंड वॉच की नीति अपनाए हुए हैं और उनकी तरफ से कोई हलचल नहीं हो रही है कि इसका समाधान कैसे ढूंढा जाए. इन जुलूसों के कारण उनपर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है.

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