आरएसएस की हाँ, लेकिन 'दलितों की ना'

  • 21 सितंबर 2016
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उना, गुजरात में जिन चार दलितों की कथित तौर पर पिटाई हुई थी उनमें से दो के पिता ने आरएसएस के कुछ ख़ास दावों को खारिज किया है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े दलित समूह, भारतीय बौद्ध संघ ने इन चारों दलित युवकों को अपने 'दलित जागरूकता' अभियान में जोड़ने का दावा किया था.

आरआरएस के वरिष्ठ विचारक राकेश सिन्हा ने बीबीसी से इन लोगों के अपने अभियान में शामिल होने की बात दोहराई है.

लेकिन चार में से जिन दो दलित युवकों, रमेश और वैषराम की पिटाई हुई थी, उनके पिता बालुभाई सेनमा ने इस बात से इनकार कर दिया है.

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उन्होंने कहा, "ये बिल्कुल गलत बात है. मेरे बेटों समेत इन चारों में से कोई भी उत्तर प्रदेश जाकर इस तरह के किसी भी कार्यक्रम में भाग नहीं लेने वाला है".

हालांकि बालुभाई ने अपने बेटों से बात करवाने पर सहमत नहीं हुए लेकिन उन्होंने कहा कि उनके बेटे गुजरात में कहीं रह रहे हैं.

इसी वर्ष गुजरात में वेरावल के उना गांव में कथित तौर पर जानवर का चमड़ा उतारने के मामले में चार दलित युवकों की सामूहिक पिटाई की व्यापक निंदा हुई थी.

एक तरफ़ मामले की जांच गुजरात सीआईडी कर रही है तो दूसरी तरफ़ प्रदेश में इस तरह की कुछ दूसरी घटनाओं पर भाजपा सरकार को सफ़ाई देनी पड़ी है.

इन हमलों के बाद संघ परिवार की तरफ़ से कोशिशें हो रही हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा दलितों को हिंदू धर्म की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके.

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उधर आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक राकेश सिन्हा मानते हैं कि 'ऊना के पीड़ितों को शोकेस बनाकर पूरे देश में दलित बनाम गैर-दलित के संघर्ष को तेज़ किया गया है जिससे हम कतई सहमत नहीं हैं".

उन्होंने कहा, "ऊना के किसी भी दलित का विरोध हमारी विचारधारा में नहीं है. चारों युवक सहज रूप से हमारे साथ आ रहे हैं. वे हमारे थे, हमारे हैं, हमारे रहेंगे".

उत्तर प्रदेश में 2017 में विधान सभा चुनाव होने हैं और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अभी तक दिखी रणनीति में दलित समुदाय पर पहले से ज़्यादा ध्यान देने की बात साफ़ है.

इस बात में भी कोई दोराय नहीं कि ऊना में युवकों के साथ हुई मारपीट से भाजपा की नीतियों की निंदा हुई थी और पार्टी इस को सुधारने को लेकर खासी गम्भीर है.

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