कश्मीर में तनाव से असम के चाय उद्योग को भारी नुकसान

  • दिलीप कुमार शर्मा
  • गुवाहटी से बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
चाय

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भारत प्रशासित कश्मीर में पिछले कई हफ़्तों से जारी तनाव का असम के चाय कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ा है. इससे ख़ासकर ग्रीन टी के कारोबार को करोड़ों का नुकसान पहुंचा है.

राज्य में कुछ चाय उत्पादकों का कहना है कि अगर हालात आगे भी ऐसे ही बने रहे तो फिर उनको अपने बागान बंद करने पड़ेंगे.

कश्मीर को सबसे ज़्यादा ग्रीन टी की सप्लाई असम से ही होती है और ग्रीन टी का सबसे बड़ा परंपरागत बाज़ार भी जम्मू-कश्मीर ही है.

असम में मोटे तौर पर सालाना क़रीब 50 लाख किलो ग्रीन टी का उत्पादन होता है और इसमें से क़रीब 90 फ़ीसद ग्रीन टी जम्मू-कश्मीर को भेजी जाती है.

लेकिन पिछले क़रीब दो महीने से कश्मीर के हालात की वजह से ग्रीन टी का कारोबार लगभग ठप है.

आर्गेनिक ग्रीन टी बनाने वाले अग्निगढ़ बायो प्लांटेशन चाय कंपनी के मालिक विजय कश्यप ने बीबीसी को बताया कि कश्मीर के हालात की वजह से इस साल क़रीब 150 करोड़ रुपए की ग्रीन टी के कारोबार को बड़ा झटका लगा हैं.

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उन्होंने बताया, "पिछले कई हफ्तों से कश्मीर से ग्रीन टी की कोई डिमांड नही आई है. इसकी वजह से चाय की खेती करने वाले छोटे चाय उत्पादकों को भारी नुकसान हुआ है. छोटे चाय उत्पादकों के सामने हालात ऐसे हो गए हैं कि बाज़ार में उनका बना रहना भी मुश्किल हो गया है और ग्रीन टी बनाने वाली कई छोटी कंपनियां बंद हो चुकी हैं".

उनका कहना है कि जून से लेकर अक्टूबर तक ग्रीन टी के कारोबार का सीज़न रहता है. लेकिन इसी समय कश्मीर में तनाव की वजह से ख़रीददारों ने माल लेने से मना कर दिया है. ऐसे में भुगतान से जुड़ी भी काफ़ी मुश्किलें होने लगी हैं.

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हालात को देखते हुए अब कश्यप अपनी कंपनी में ग्रीन टी के बदले ऑर्थोडॉक्स चाय बनाएगें.

असम के विश्वनाथ चारली में चाय की हरी पत्तियों की खेती करने वाले देबव्रत मेधी का कहना है कि सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन अचानक क़रीब ढाई महीने से कारोबार की हालत ख़राब हो गई.

वो बताते हैं, "फ़ैक्ट्री वालों ने चाय की हरी पत्तियां लेने से मना कर दिया है, क्योंकि उनसे कोई माल नहीं ख़रीद रहा है. फ़ैक्ट्री के मालिक कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर के हालात जब तक ठीक नहीं हो जाते, वो पहले की तरह माल नहीं ले सकते. पेमेंट भी नहीं मिल रही है. पिछले सीजन में 27 रुपए प्रति किलो चाय की हरी पत्तियां बेची थी और अब कैरेज चार्ज के साथ 15 रुपए किलो में देना पड़ रहा है. जबकि इसका पेमेंट भी दो महीने बाद मिलेगा".

उनका कहना है कि ऐसे में चाय बाग़ान में काम करने वाले मज़दूरों को भुगतान करना मुश्किल हो रहा हैं. टी बोर्ड छोटे चाय उत्पादकों की समस्या से पूरी तरह वाकिफ़ है, लेकिन अभी तक कुछ नहीं किया गया है.

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असम में क़रीब 80 हजार पंजीकृत छोटे चाय उत्पादक हैं, जो सालाना 20 हज़ार करोड़ किलो चाय की हरी पत्तियों का उत्पादन करते हैं.

भारत में ग्रीन टी की सबसे ज़्यादा ख़पत कश्मीर में है और इस चाय को बेचने वाले ज़्यादातर डीलर पंजाब के अमृतसर से हैं. पहले ग्रीन टी काफ़ी मात्रा में अमृतसर से ही पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान भेजी जाती थी. पाक अधिकृत कश्मीर के लोग भी असम की मशहूर ग्रीन टी के बड़े शौक़ीन हैं.

अमृतसर में तक़रीबन 85 साल से चाय का पारिवारिक व्यवसाय चला रहे राजेश अरोड़ा का कहना है कि सीजन के समय कश्मीर में समस्या हो जाने से ग्रीन टी के कारोबार से जुड़े सभी लोगों को काफ़ी नुकसान हुआ है.

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वो बताते हैं, "सबसे ज़्यादा ग्रीन टी जम्मू-कश्मीर में ही बेची जाती है. हालांकि 1980 तक ग्रीन टी का सबसे अच्छा बाज़ार अफ़ग़ानिस्तान था. लेकिन बाद में वहां समस्या पैदा हो गई और वहां इस चाय के कारोबार का बाज़ार लगभग ठप हो गया. पाकिस्तान के साथ भी साल 2000 तक ग्रीन टी का व्यापार अच्छा चला, लेकिन जैसे जैसे रिश्ते ख़राब हुए, यह मार्केट भी हाथ से चली गई".

ऐसे में ग्रीन टी का कारोबार करने वाले व्यवसाइयों के लिए अब जम्मू-कश्मीर ही बड़ा मार्केट है.

अरोड़ा मानते है कि कश्मीर में मौजूदा हालात के कारण पिछले साल के मुक़ाबले इस बार असम से काफी कम ग्रीन टी ख़रीदी गई है. उन्हें उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में कश्मीर के हालत फिर सामान्य हो जाएंगे और मार्केट में फिर से मांग बढ़ेगी.

हालांकि इस साल सीज़न में कारोबार नहीं कर पाने से उन्हें नुकसान तो उठाना ही पड़ेगा और आगे इसकी भरपाई भी नहीं हो सकती है.

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