'मराठा मोर्चे में कहीं न कहीं दलित विरोधी सुर हैं'

  • संजय रमाकांत तिवारी
  • पुणे से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
पुणे मराठा मोर्चा
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पुणे मराठा मोर्चा

महाराष्ट्र में मराठा समाज के विरोध मार्च का शोर है. अब तक 14 जगहों पर 'मूक मोर्चा' निकाला जा चुका है.

नौ अगस्त से शुरू हुए इस मार्च में प्रदर्शनकारियों की मांग है कि कोपरडी घटना के फ़रार अभियुक्तों को जल्द से जल्द गिरफ़्तार किया जाए, मराठा को आरक्षण मिले और दलित उत्पीड़न रोकथाम क़ानून में बदलाव हो.

मराठा क्रांति मार्च में शामिल लोग यह जरूर कहते रहे हैं कि उनका मूक मार्च दलित समाज के ख़िलाफ़ नहीं है. लेकिन कई दलित कार्यकर्ताओं का मानना है कि मार्च में शामिल लोगों में कहीं न कहीं दलित विरोधी सुर मौजूद है.

दलित विचारकों, कार्यकर्ताओं, लेखकों और पत्रकारों का मराठा र्मोर्चे, मराठा आरक्षण के बारे में क्या कहना है?

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पुणे मराठा मोर्चा में शामिल एक प्रदर्शनकारी

डॉ भाऊ लोखंडे, दलित चिंतक,लेखक और वक्ता

कोपरडी की बलात्कार और हत्या की घटना को उत्पीड़न क़ानून से, या दलितों से जोड़ना ग़लत है. कोपरडी घटना से जुड़े बलात्कारियों का कोई भी समर्थन नहीं कर सकता.

हम चाहते हैं कि कोपरडी घटना के दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले. उत्पीड़न क़ानून का गलत इस्तेमाल करने की ताकत दलितों में नहीं है. यदि ऐसा होता भी है तो वो आपसी जाति में हिसाब चुकता करने के लिए ऊंची जाति के लोग करते हैं.

लेकिन सवाल ये भी है कि मराठा क्रांति मोर्चा के आयोजक दलितों के खिलाफ क्यों है?

मराठा मोर्चा, सरकार के खिलाफ होना चाहिए. मोर्चे में शामिल कार्यकर्ता दलितों के खिलाफ बोल रहे हैं. जबकि दलित चाहते हैं कि मराठा समाज को आरक्षण मिले. हम मराठा आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं.

मराठा समाज के लोग पहले आरक्षण मांगने का मतलब अनुसूचित जाति का होना समझते थे. महाराष्ट्र में अधिकतर उनके मुख्यमंत्री रहे. इन्होंने उनसे इतने सालों तक आरक्षण क्यों नहीं माँगा. उनको इन्हें आरक्षण देने से किसने रोका था? अब वो मांग रहे हैं तो ठीक है.

मराठा आरक्षण की मांग को हमारा समर्थन है. हम यह भी नहीं मानते कि मराठा समाज ने हमारे खिलाफ यह आंदोलन चलाया है.

लेकिन उसमें वैसे कई लोग हो सकते हैं जिनमें दलित विरोधी भावना हो. जो चाहते हों कि दलितों को मराठों से लड़ा दिया जाए. लेकिन इसमें नुकसान दलितों का ही होगा. दलित नेता बाबा आढाव ने हमाल परिषद बनायी थी. उसका लाभ मराठा समाज के उन लोगों को भी मिलता है जो हमाली करते हैं.

संजय जिवने, दलित रंगभूमि से जुड़े लेखक, निर्देशक और कलाकार

मराठा मूक मोर्चे के बाद एक समता मार्च का भी आयोजन किया गया. लेकिन इस मार्च को जब मराठाओं के मार्च की प्रतिक्रिया में पिछडों का मोर्चा समझा जाने लगा तो उसे रद्द कर दिया गया.

अब 9 अक्टूबर को नागपुर में सभी पिछड़ी जातियों के नुमाइंदों की परिषद आयोजित की जा रही है.

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मराठा मूक मोर्चा में शामिल प्रदर्शनकारी मौन रहते हैं.

दलित, आदिवासी और पिछड़ों को जो अलग अलग रखना चाहते हैं, ताकि वे नियंत्रण में रहें, उन्होंने यह झूठा गुब्बारा खड़ा किया है. लेकिन उनके कारण हम सबको एक होने का मौक़ा मिला.

असल में जो वंचित हैं, ऐसे दलित, अनुसूचित जाति और जनजाति, सभी वर्गों के लोगों को एक जगह बुलाकर हम समता मार्च आयोजित करेंगे.

यह सब राजनीति है. मराठा आरक्षण के नाम पर एक झूठा बवंडर खड़ा किया जा रहा है. अनुसूचित जाति के नाम पर, कुनबी नाम से आरक्षण मिल रहा है. मराठा यह जात है ही नहीं.

नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेस की रिपोर्ट में 261 जातियों की सूची दी गई है. इसमें मराठा जाति का कोई उल्लेख ही नहीं है. हां, कुनबी जाति का उल्लेख जरूर है. मराठाओं में जो सबसे पिछड़े हुए हैं उन्हें कुनबी पुकारा जाता है.

जो अनुसूचित जाति में खुद को अपर कास्ट समझते हैं, जो जमींदार हैं, उन्होंने बाकियों को दलित अवस्था में रखा हुआ है.

जिनके शक्कर के कारखाने हैं, जिनके बड़े बड़े निजी स्कूल और कॉलेज हैं, क्या इन संस्थाओं में गरीबों, अनुसूचित जाति के लोगों को प्रवेश मिलता है?

उत्पीड़न कानून के बारे में जो सवाल उठाए जा रहे हैं वो तब से उठाए जा रहे हैं जब से यह क़ानून बना है. इस क़ानून को अधिक व्यापक और कठोर बनाना चाहिए.

जो समाज डॉ बाबा साहब अंबेडकर की चेतना की वजह से जागरूक है, वह आवाज उठाता है, लेकिन आदिवासी पुरुष और महिलाएं याचर्मकार समाज जैसे लोगों की आवाजें नहीं सुनाई देती.

उत्पीड़न कानून का इस्तेमाल दलित नहीं करते. जो लोग गलत इस्तेमाल करते हैं, गलत मामले बनाते हैं उन पर कार्रवाई हो.

जहां तक मराठा अस्मिता की बात है, तो हम इसका स्वागत करते हैं. लेकिन मराठा आरक्षण की बात बिलकुल असंवैधानिक है. यह नहीं हो सकता.

जोगेंद्र सरदारे, दलित पत्रकार और कार्यकर्ता

उत्पीड़न कानून रद्द करने की मांग ही गलत है. ऐसा नहीं कह सकते कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है.

खैरलांजी जैसे गंभीर मामले में भी 'प्रिवेंशन ऑफ़ अट्रोसिटी एक्ट' की धारा नहीं लगाई गई थी. मतलब ये कि अक्सर देखा गया है कि जहाँ जरूरी होता है वहां भी इस क़ानून का उपयोग दलित समाज में नहीं होता.

उत्पीड़न की धाराएं जहां आवश्यक हैं, वहां लगनी चाहिए और उस क़ानून की खामियां दूर कर उसे और कठोर क़ानून की शक्ल देनी चाहिए.

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मराठा मूक मोर्चा में शामिल शुभांगी साकोरे और सुप्रिया साकोरे

जहां तक मराठा आरक्षण की बात है तो हम उसके खिलाफ नहीं हैं. लेकिन अब यह सरकार तय करे कि उन्हें किस तरह देना है.

क़ानून ने जो 50 फीसदी की सीमा तय की है वो देखते हुए अदालत में ये मामला टिकना चाहिए.

पिछली सरकार ने जैसे सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए हड़बड़ी में 16 फीसदी मराठा आरक्षण की घोषणा की थी, वैसे ना हो. क्योंकि वो अदालत में टिका ही नहीं.

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