डाउन सिंड्रोम वाले बच्चों के परिवार भी हैं ख़ास

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यह सफ़र भी दूसरी छुट्टियों जैसा ही था. वहां थे समुद्र तट, संगीत और बहुत सारा मज़ा. पर एक चीज़ अलग थी. हमारे बीच डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चे भी थे.

इस तरह छुट्टियां बिताने के लिए गोवा जाने का फ़ैसला बहुत आसान नहीं था. व्हाट्सऐप ग्रुप 'हमसफ़र' के ज़रिए ही मैं लगभग सभी अभिभावकों को जानती थी. हालांकि इस तरह की छुट्टियां पश्चिमी दुनिया में आम हैं, पर अपने यहां बहुत चलन में नहीं हैं.

विकलांग बच्चों के परिवार की मदद करने की सोच भारत में नई है. हम ऐसे बच्चों के परिजनों और उनके भाई बहनों की ज़रूरतों को भूल ही जाते हैं. ख़ास ज़रूरत वाले बच्चों के पालन-पोषण के लिए ख़ास परिवार चाहिए.

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ये छुट्टियां जितनी बच्चों के लिए ख़ास थीं, उनके परिवारों के लिए उससे कहीं ज़्यादा ख़ास थीं. उनके पिता पूल में समय बिता रहे थे, माताएं बातचीत में मशगूल थीं और भाई बहन साथ-साथ खेल रहे थे.

मैंने सोचा था कि मैं अपने बच्चे की तुलना दूसरों से करूंगी और वह उनकी तरह नहीं कर पाएगी तो मुझे बुरा लगेगा. पर इन छुट्टियों में यह साफ़ हो गया कि हर बच्चा अपने आप में अलग है और उसकी तुलना दूसरों से नहीं की जा सकती.

डाउन सिंड्रोम से प्रभावित वयस्क लोगों के माता-पिता इससे प्रभावित छोटे बच्चों के माता-पिता के लिए सहारा बन रहे थे. वे काफ़ी मददगार थे. उनमें अजीब किस्म की शांति थी.

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डाउन सिंड्रोम प्रभावित बच्चों के माता-पिता के मन में क्या चल रहा था, वे अच्छी तरह जानते थे. हमारे डर और हमारी परेशानियां सिर्फ़ हमारी बातें सुन लेने और हाथ पकड़ लेने से ही दूर हो रही थीं. हम अपने मन की बातें कह रहे थे और वे गौर से सुन रहे थे. हम रोते थे तो हमें सांत्वना देते थे.

मुझे अच्छी तरह याद है कि हम किशोरों और वयस्कों को गौर से देखते थे और सोचते थे कि हमारे बच्चे का क्या भविष्य है. डाउन सिंड्रोम से प्रभावित वयस्कों के माता-पिता को रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं था.

हालांकि इस मामले में पहले से कहीं अधिक जागरूकता है, पर अब भी चुनौतियां बरक़रार हैं. विकलांगों से जुड़ी जानकारियां और जागरूकता कम होने की वजह से भारतीय समाज उनके प्रति संवेदनहीन है. डाउन सिंड्रोम सपोर्ट ग्रुप इंडिया का फ़ेसबुक पेज शुरू करने के पीछे यही मकसद था.

डाउन सिंड्रोम का पता चलने के बाद माता-पिता सबसे पहले इसी पेज पर जाते हैं. मैं कोशिश करती हूं कि उन्हें उनके शहर में ही इस रोग से पीड़ित बच्चे के माता-पिता से मिलवा दूं.

मुझे अच्छी तरह याद है कि जब डॉक्टर ने मुझसे कहा था कि आपके बच्चे को डाउन सिंड्रोम है, तो मैं किस तरह सीधे घर गई थी. इस एक वाक्य ने मेरी ज़िंदगी बदल दी थी. मुझे पता ही नहीं था कि इसके क्या मायने हैं और मैं सीधे इंटरनेट खंगालने बैठ गई.

मुझे पूरी तरह याद है कि सर्च इंजन ने सबसे पहले जो तलाशा था, वह एक मां और इस सिंड्रोम से प्रभावित एक बेटी की कहानी थी, जो अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने की थी. उसमें छपी तस्वीर में वे लोग काफ़ी ख़ुश लग रहे थे. परिवार वालों का कहना था कि वे अपनी बेटी से जुड़ी कोई चीज़ नहीं बदलेंगे.

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मैं यह कभी नहीं भूल सकती कि हालांकि मेरी आंखों से आंसू गिर रहे थे, पर मैंने काफ़ी हल्का महसूस किया था.

इसके तीन साल बाद मैं उस बेटी की मां से मिली और अब हम पारिवारिक दोस्तों की तरह हैं. इस तरह के दोस्तों को लेकर ही हम छुट्टियों पर आए हैं. ये दोस्ती ही अब मेरी जीवन रेखा है. कुछ दिन बेहद बुरे होते हैं जब हमें काफ़ी तक़लीफ़ होती है, पर हमें यह अहसास रहता है कि ये दोस्त एक फ़ोन करने से आ जाएंगे.

मैंने यह महसूस किया है कि मैं जब श्रेया के किसी बर्ताव पर फंस जाती हूं, मुझे थेरेपी करने वालों से ज़्यादा मदद इन दोस्तों से मिलती है. मुश्किल हालातों में हम सब एक दूसरे के सलाहकार और थेरेपिस्ट बन जाते हैं.

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ये छुट्टियां भी इसलिए थीं कि हम सब मिल बैठकर आत्ममंथन करें कि हम आख़िर अपने बच्चों के लिए क्या चाहते हैं. मैं उन छुट्टियों के दिनों में बिस्तर पर लेटे हुए यही सोचती रही. मुझे यह समझने में ज़्यादा देर नहीं लगी कि मैं सिर्फ़ यह चाहती हूं कि मेरी बच्ची खुश रहे.

हमें अपने बच्चों के लिए बड़ा लक्ष्य रखना चाहिए, पर यह भी सच है कि हमें यह काम धीरे-धीरे और सोच-समझ कर करना चाहिए. यदि वह अपने रोज़मर्रा का काम कर लें तो मुझे खुशी होगी. विकलांग बच्चों के माता-पिता के रूप में हमें यह सवाल उठाना चाहिए कि हमारे बच्चों के लिए अकादमिक पढ़ाई कितनी महत्वपूर्ण है.

ये बच्चे जब पढ़ाई-लिखाई में अपने स्कूल में पिछड़ने लगें तो हमें गरिमा के साथ इसे स्वीकार कर लेना चाहिए. हर बच्चा अलग होता है और हमारे बच्चों में कुछ समानता भी होती है. हमें इन दोनों बातों को मान लेना चाहिए.

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हमें यह याद रखना चाहिए कि हम सिर्फ़ मां ही नहीं हैं, हम इसके साथ ही थेरेपिस्ट, नर्स, शिक्षक और विदूषक भी हैं. हम ऐसे बच्चों के अधिकारों के वकील भी हैं.

पिता होना भी बहुत आसान नहीं है. ऐसे बच्चे आर्थिक रूप से हमेशा अपने माता-पिता पर निर्भर रहते हैं.

हम अपना उत्साह कम नहीं कर सकते, हमारे पास इसका विकल्प ही नहीं है.

इसलिए हमें कुछ दिनों के लिए डॉक्टरों के अप्वॉइंटमेंट और थेरेपी की बातें भूल कर बच्चों को आराम करने देना चाहिए.

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