जब एसडी बर्मन की साहिर और लता से बिगड़ी बात

  • 31 अक्तूबर 2017
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एक बार मशहूर कवयित्री अमृता प्रीतम ने अपने प्रेमी इमरोज़ को ख़त लिखकर कहा था, "मेरे कहने से ग्रामोफ़ोन चलाना और बर्मन की आवाज़ में ये गाना सुनना, सुन मेरे बंधु रे... सुन मेरे मितवा रे... और फिर मुझे बताना कि वो लोग कैसे होते हैं, जिन्हें कोई इस तरह आवाज़ देता है.."

अमृता प्रीतम ही नहीं, ऐसे अनगिनत लोग हैं जो सचिनदेव बर्मन के गायन और संगीत के कायल और मुरीद हैं. खगेश देव बर्मन भी सचिनदेव बर्मन की तरह त्रिपुरा के राज घराने से आते हैं और उन्होंने एक किताब लिखी है- एस डी बर्मन- द वर्ल्ड ऑफ़ हिज़ म्यूज़िक.

खगेश बताते हैं, "सचिन देव बर्मन ने अपनी संगीत प्रतिभा से करोड़ों भारतवासियों का दिल जीता. शास्त्रीय और लोक संगीत का जितना सुंदर समिश्रण एसडी के संगीत में मिलता है उतना शायद कहीं नहीं. उन्होंने ही सबसे पहले संगीत पहले और शब्द बाद में की परंपरा शुरू की थी. वो फ़िल्म की सिचुएशन के हिसाब से संगीत बनाते और फिर गीतकार से कहते कि धुन को ध्यान में रख कर गीत लिखे."

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Image caption एसडी-आरडी बर्मन

'वक़्त ने किया, क्या हसीं सितम'

एसडी बर्मन की एक और जीवनी लिखने वाली सत्या सरन बताती हैं कि काग़ज़ के फूल बनने के दौरान दादा बर्मन ने एक धुन बनाई जिसे सबने पसंद किया. लेकिन उसके लिए फ़िल्म में कोई सिचुएशन नहीं निकल रही थी.

वो कहती हैं, "गुरुदत्त इस बात पर अड़े हुए थे कि हर हालत में इस धुन को फ़िल्म में शामिल किया जाना चाहिए. कैफ़ी आज़मी उस धुन पर गीत लिखने लगे. उन्होंने कई गीत लिखे, लेकिन गुरु दत्त को एक भी गीत पसंद नहीं आया. आख़िर गुरुदत्त ने कहा इस धुन को यहीं छोड़ते हैं. इसका इस्तेमाल अगली किसी फ़िल्म में करेंगे."

सत्या के अनुसार कैफ़ी के लिए ये एक तरह से हार मानने जैसा था. कैफ़ी ने एक प्रयास और किया और लिखा, 'वक़्त ने किया, क्या हसीं सितम.' गुरुदत्त इसको सुनते ही उछल पड़े और ये गीत 'काग़ज़ के फूल' का सिग्नेचर गीत हो गया जिसे फ़िल्म में बार-बार दोहराया गया."

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Image caption साहिर लुधियानवी और एसडी बर्मन की तस्वीर.

लता से अनबन

'प्यासा' फ़िल्म के बनने के दौरान एसडी बर्मन की साहिर लुधियानवी से तक़रार हो गई. मुद्दा था कि नग़मे में ज़्यादा रचनात्मकता है या संगीत में.

सत्या सरन कहती हैं, "मामला इस हद तक बढ़ा कि साहिर ने ज़ोर दिया कि उन्हें सचिनदेव बर्मन से एक रुपया ज़्यादा पारिश्रमिक दिया जाए. साहिर का मानना था कि एसडी के संगीत की लोकप्रियता में उनका बराबर का हाथ था. सचिनदेव बर्मन ने साहिर की शर्त को मानने से इंकार कर दिया और फिर दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया."

सचिनदेव बर्मन एक बार लता मंगेशकर से भी इसी तरह नाराज़ हुए थे. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में लता ने ख़ुद बताया था, "जब मैंने 'पग ठुमक चलत' गीत रिकार्ड किया तो दादा बहुत खुश हुए और इसे ओके कर दिया. एक बार जब संगीतकार किसी गीत को ओके कर देता है तो रिकॉर्डिंग दोबारा नहीं की जाती है."

Image caption एसडी बर्मन और गुरूदत्त की जीवनी लिखने वाली सत्या सरन रेहान फ़ज़ल के साथ

लता कहती हैं, "लेकिन बर्मन परफ़ेक्शनिस्ट थे. उन्होंने मुझे फ़ोन किया कि वो इस गीत की दोबारा रिकॉर्डिग करना चाहते हैं.. मैं चूंकि बाहर जा रही थी, इस लिए मैंने रिकॉर्डिंग करने से मना कर दिया. बर्मन इस पर नाराज़ हो गए. लेकिन कलाकारों के बीच इस तरह की नोकझोंक होती रहती है."

खगेश देव बर्मन बताते हैं, "जिस गाने के लिए लता को ड्रॉप किया गया उसे सचिन दा ने बाद में आशा से गवाया. लेकिन वो भी उसे उस तरह नहीं गा पाईं जैसा सचिन चाहते थे. आख़िर में वही गाना फ़िल्म में रखा गया जिसे लता ने गाया था. लेकिन पाँच साल तक लता और सचिनदेव बर्मन में ठनी रही."

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Image caption लता मंगेशकर और आरडी बर्मन

खगेश बताते हैं, "1962 में जब राहुल देव बर्मन अपनी फ़िल्म 'छोटे नवाब' में संगीत दे रहे थे तो उन्होंने अपने पिता सचिन और लता में पैच अप कराया. उन्होंने अपने पिता से कहा कि संगीत निर्देशक के तौर पर अपनी पहली फ़िल्म में मैं लता दीदी से गाना ज़रूर गवाऊंगा. लता ने न सिर्फ़ छोटे नवाब के लिये गाया बल्कि सचिनदेव बर्मन की फ़िल्म बंदिनी में जब उन्होंने गुलज़ार के शब्दों... मोरा गोरा अंग लइ ले को अपनी आवाज़ दी तो तमाम संगीत प्रेमी मंत्रमुग्ध हो गए."

एसडी बर्मन के बारे में मशहूर था कि वो बहुत कंजूस थे और लोगों को चाय और खाना ऑफ़र नहीं करते थे. सत्या सरन गुरुदत्त से जुड़ा एक वाक़या बताती हैं.

सत्या बताती हैं, "अक्सर जब वो फ़िल्म के संगीत के बारे में चर्चा करने उनके घर जाते थे तो दादा उनसे पूछते थे, 'तुम खाना तो घर से खाकर आए हो न'. इससे पहले कि गुरुदत्त जवाब देते, वो खाना खाने अंदर चले जाते थे."

वो बताती हैं, "एक बार उस्ताद रईस ख़ाँ उनसे मिलने उनके घर गए. जब वो उनसे बात कर रहे थे तो पीछे से पंचम (राहुल देव बर्मन) ने इशारा किया कि दादा से कहो कि चाय पिलाएं. जैसे ही रईस ख़ाँ ने चाय की फ़रमाइश की, दादा ने कहा, 'तुम इतने जवान हो और चाय मांग रहे हो!' फिर उन्होंने कहा बच्चे चाय नहीं पीते और वैसे भी घर में दूध नहीं है. इतने में पंचम चाय का प्याला लिए हुए कमरे में दाख़िल हुए. अब झेंपने की बारी सचिन की थी. उनके मुंह से निकला, 'ये चाय तुम कहाँ से ले आए.' इसी तरह वो अपने पान के लिए भी बहुत पज़ेसिव थे. वो अपना पान किसी को नहीं देते थे. सिवाए लता मंगेशकर के और वो भी तब जब वो बहुत अच्छा गाना गाती थीं."

सेंस ऑफ़ ह्यूमर

एसडी बर्मन का सेंस ऑफ़ ह्यूमर बहुत ग़ज़ब का था. एक बार वो खार के राम कृष्ण मंदिर में गए.

खगेश देव बर्मन बताते हैं, "मंदिर में घुसने से पहले दोनों जूते एक साथ रखने के बजाए उन्होंने एक जूता एक जगह रखा और दूसरा उससे थोड़ी दूर पर जूतों के एक ढेर में. उनके साथी ने कहा आप ये क्या कर रहे हैं? बर्मन ने जवाब दिया, आजकल चोरी की वारदातें बढ़ गई हैं. उनके साथी ने पूछा कि अगर चोर ने जूतों के ढेर में से दूसरा जूता ढूंढ लिया? बर्मन ने जवाब दिया अगर चोर इतनी मेहनत कर सकता है, तब तो वो जूता पाने का हकदार है."

खगेश बताते हैं, "आरडी बर्मन ने बचपन से उनके साथ संगीत सीखना शुरू किया था. उनके देखते-देखते वो संगीत के शिखर पर पहुंच गए थे. कभी-कभी उन्हें उनका काम पसंद नहीं आता था. ख़ासतौर से जब उन्होंने 'हरे राम हरे कृष्ण' में उनका गाना दम मारो दम सुना था तो उन्हें अच्छा नहीं लगा था."

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खगेश आगे बताते हैं, "एक बार जब वो सुबह की सैर पर निकले तो पीछे से किसी ने पुकारा वो देखो आरडी बर्मन के पिता जा रहे हैं. लौटकर उन्होंने अपने बेटे से कहा- आज मैं बहुत खुश हूँ. अभी तक मैं सचिन देव बर्मन के नाम से जाना जाता था. आज मुझे किसी ने पहली बार राहुल के पिता के रूप में पहचाना."

एसडी बर्मन टेनिस के बहुत शौकीन थे. फ़ुटबॉल के लिए तो वो पागल थे.. ईस्ट बंगाल उनका पसंदीदा फ़ुटबॉल क्लब था.

खगेश देव बर्मन बताते हैं, "मिली की रिकीर्डिंग के दौरान उन्हें स्ट्रोक हो गया और वो कोमा में चले गए और अपनी मौत तक छह महीने लगातार कोमा में रहे. उसी दौरान जब उनके क्लब ईस्ट बंगाल ने आईएफ़ शील्ड फ़ाइनल में मोहन बगान को 5-0 से हरा दिया और राहुल ने उनके कान में चिल्लाकर उन्हें ये ख़बर दी, तो ईस्ट बंगाल के इस सबसे बड़े समर्थक ने अपनी आँखे खोल दीं."

संगीत के इस राजकुमार ने इसके बाद कभी आँखें नहीं खोलीं और 31 अक्तूबर, 1975 को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.

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