जयवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में भारत हुआ शामिल

  • 2 अक्तूबर 2016
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Image caption गुवहाटी के बाहरी इलाक़े में प्रदूषण

दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों का सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले देशों में से एक भारत भी जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में शामिल हो गया है.

इस समझौते के तहत भारत 2030 तक 40 फ़ीसदी बिजली गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से उत्पादित करने के लिए प्रतिबद्ध होगा.

जलवायु परिवर्तन के पीछे कार्बन उत्सर्जन को बड़ी वजह माना जाता है.

पिछले साल दिसंबर में पेरिस में हुए समझौते में दुनियाभर के देश वैश्विक जलवायु परिवर्तन (तापमान वृद्धि) को सालाना 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने पर राज़ी हुए थे.

पेरिस समझौता पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर विश्व में पहला व्यापक समझौता है.

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Image caption भारत में ऊर्जा ज़रूरतों के लिए अधिकतर बिजली कोयले से बनाई जाती है.

ये समझौता क़ानूनी तौर पर तब ही लागू हो सकेगा जब कम से कम 55 ऐसे देश इसका अनुमोदन कर देंगे जिनकी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 55 फ़ीसदी भागीदारी हो.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों कहा था कि भारत महात्मा गांधी की जयंती पर 2 अक्तूबर को समझौते पर अपनी मुहर लगाएगा.

रविवार को जारी एक बयान में संयुक्त राष्ट्र ने कहा है, "भारत ने पेरिस समझौते में शामिल होने की सहमति का दस्तावेज संयुक्त राष्ट्र को दे दिया है."

इसी महीने अमरीका और चीन भी औपचारिक रूप से पेरिस समझौते में शामिल हुए थे.

वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में इन दोनों देशों की 40 प्रतिशत भागीदारी है.

भारत इस समझौते में शामिल होने वाला 62वां देश बन गया है. वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की भागीदारी 4.5 प्रतिशत है.

उम्मीद है कि जल्द ही यूरोपीय संघ भी इस समझौते में शामिल हो जाएगा जिससे 55 प्रतिशत उत्सर्जन की ज़रूरी सीमा भी पार हो जाएगी.

पेरिस समझौते के मुख्य बिंदू -

  • वैश्विक जलवायु परिवर्तन (तापमान वृद्धि) को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना और इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास करना.
  • जितनी जल्दी हो सके ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की उच्च सीमा हासिल करना और ग्रीन हाउस गैसों को कम करने के लिए इस सदी के दूसरे हिस्से में संतुलन हासिल करना.
  • हर पाँच सालों में प्रगति की समीक्षा करना
  • 2020 तक विकासशील देशों को पर्यावरण के लिए 100 अरब डॉलर की मदद देना और भविष्य में भी वित्तीय मदद के लिए प्रतिबद्ध रहना.
  • समझौते के लागू होने के बाद इसमें शामिल देशों के इससे अलग होने के लिए कम से कम तीन साल तक इंतेज़ार करना.