सेना पर हमलों को रोक पाना मुश्किल

  • 3 अक्तूबर 2016
बंदूक ताने भारतीय सेना का जवान इमेज कॉपीरइट FAROOQ KHAN

भारत प्रशासित कश्मीर के उरी पर हमले में 19 भारतीय जवानों के मारे जाने और पिछले हफ़्ते सेना के नियंत्रण रेखा के पास 'सर्जिकल स्ट्राइक' के दावे के बाद एक बार फिर रविवार रात बारामूला में हमला हुआ है.

भारतीय सेना की उत्तरी कमान ने ट्वीट कर बताया कि "बारामूला में हमला हुआ, हालात काबू में हैं", और वहां पहुंचे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी बयान दिया कि "सेना के जवान ऐसी घटनाओं का मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं".

लेकिन रविवार रात बारामूला में सेना के 46 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कैंप के पास इस हमले में अर्ध सैनिक बल के एक जवान की मौत हो गई, जबकि दो जवान घायल हुए हैं. सेना के भी दो जवान घायल हुए हैं.

बीबीसी से बातचीत में भारतीय सेना के पूर्व जनरल बताते हैं कि ऐसे हमलों को रोक पाना मुश्किल है.

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पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता के मुताबिक नियंत्रण रेखा पर हर व़क्त चौक़सी बहुत मुश्किल है.

उन्होंने कहा, "अनिश्चितकालीन समय तक सेना की तैनाती नहीं होनी चाहिए, उससे एक थकान ठहरने लगती है, पिछले कई दशकों से वहां तैनात सेना और सुरक्षा बल 100 प्रतिशत मुस्तैद नहीं हो सकते."

नियंत्रण रेखा पर 13 साल पहले 'बार्ब्ड वायर' लगाई गई थी जो जनरल मेहता के मुताबिक अब उतनी सुरक्षित नहीं रही. हालांकि उसपर सेंसर और रडार लगे हुए हैं.

साल 1999 में करगिल युद्ध के दौरान सेनाध्यक्ष रहे जनरल वेद प्रकाश मलिक के मुताबिक सैंकड़ों किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा में से घुसपैठ को पूरे तरीके से रोकना बहुत मुश्किल है.

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बीबीसी से बातचीत में जनरल मलिक ने कहा, "कोई भी देश पूरे तरीके से तैनाती नहीं कर सकता, इसलिए जहां ख़तरा ज़्यादा होता है वहां सेना की पोस्ट थोड़ी नज़दीक और बाक़ी जगह थोड़ी दूर बनाई जाती हैं."

इसके बावजूद, जनरल मलिक बताते हैं कि जम्मू के मैदानी इलाकों से लेकर 17-18,000 फ़ीट की ऊंचाई पर जानेवाली नियंत्रण रेखा की सुरक्षा के लिए जवानों के साथ ही तकनीक भी अहम् भूमिका रखती है.

पाकिस्तान से लगने वाली भारत की 3,000 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सीमा का 1,225 भारत प्रशासित कश्मीर, 1,037 राजस्थान, 553 पंजाब और 508 किलोमीटर गुजरात से गुज़रता है.

2015 में गुरदासपुर और इसी साल पठानकोट में भी हमले हुए थे पर पंजाब से सटी सीमा पर नियंत्रण रेखा जैसी 'बार्ब्ड वायर' तक उप्लब्ध नहीं है.

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पठानकोट हमले के बाद सीमा सुरक्षा और भारत-पाक़िस्तान वाली सीमा में घुसपैठ के हालात समझने के लिए अप्रैल 2016 में सरकार ने एक समिति बनाई और अगस्त में उसकी रिपोर्ट आई.

पूर्व गृह सचिव मधुकर गुप्ता की अध्यक्षता वाली इस समिति की रिपोर्ट में सुझाव दिए गए कि पंजाब से गुज़रने वाली भारत-पाक़िस्तान सीमा पर लेज़र और सेंसर लगाने के अलावा वहां निगरानी भी और मुस्तैद करने की ज़रूरत है.

भारत, पाकिस्तान और सीमापार चरमपंथ से निपटने के लिए स्ट्रैटेजिक रिस्ट्रेंट यानि संयम की नीति अपनाता रहा है.

1999 में करगिल, 2001 में संसद हमला और 2008 में मुंबई हमले के व़क्त भारत ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन नहीं किया.

जनरल अशोक मेहता के मुताबिक इसका असर फ़ौज के मनोबल पर पड़ता है.

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इसके अलावा फ़ौज को भारत प्रशासित कश्मीर में स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल नहीं है.

जनरल मेहता ने कहा, "वहां हालात जैसे बना दिए गए हैं, लोग आतंकवादियों को हीरो मानते हैं, फ़ौज को बैरक्स में रहना पड़ता है क्योंकि बाहर आने से माहौल में तनाव बढ़ सकता है, तो ऐसे में वो ख़ुफ़िया जानकारी कैसे जुटाएंगी और आतंकवादियों से निपटने का काम कैसे करेंगी?"

भारत प्रशासित कश्मीर में आंतरिक अस्थिरता का उल्लेख देते हुए जेनरल मेहता कहते हैं कि इसका असर सुरक्षा बलों पर भी पड़ता है. वहीं द्विपक्षीय स्तर पर बातचीत को लेकर कोई अनुरूपता नहीं है.

एक ओर प्रधानमंत्री मोदी प्रधानमंत्री शरीफ़ को शपथ ग्रहण के लिए न्योता देते हैं और ख़ुद वहां पाकिस्तान जाते हैं.

दूसरी ओर हुर्रियत का हवाला देकर बातचीत रद्द होती है और पठानकोट हमले के बाद आईएसआई को आने दिया जाता है.

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जनरल वी पी मलिक के मुताबिक दोनों देशों के बीच बातचीत पाकिस्तानी सेना के हक़ में नहीं है क्योंकि ये उनके देश में उनके रसूख़ को कम करेगा.

पर वो दावा करते हैं कि पाकिस्तान के मुकाबले भारतीय सेना के पास बेहतर तकनीक और हथियार हैं. फिर भी चरमपंथी गुटों की चुनौती अलग ही है.

वो कहते हैं, "इन गुटों को ना सिर्फ़ पाकिस्तानी सेना से मदद मिलती है, बल्कि उनके पास देश-विदेश से बहुत पैसा मिलता है जिससे हथियार और बाक़ि असला आराम से ख़रीदा जा सकता है."

जनरल मेहता के मुताबिक 'सर्जिकल स्ट्राइक' एक सही कदम था पर अभी सेना के पास निय़ंत्रण रेखा के पार जाकर कार्रवाई करने की क्षमता नहीं है और जब तक वो नहीं बनती तब तक भारत निय़ंत्रण रेखा से दो-तीन किलोमीटर की दूरी तक ही कार्रवाई करना बहुत सफलता नहीं दिला पाएगा.

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