पंजाब के सीमावर्ती गाँवों में किसान क़ुदरत से भी परेशान

  • 5 अक्तूबर 2016
Image caption जगरूप सिंह शेखों, प्रोफ़ेसर, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय

पंजाब में पाकिस्तान की सीमा से लगे गाँवों के लोग सिर्फ़ जंग की दहशत के कारण ही घर छोड़कर नहीं जा रहे बल्कि क़ुदरत की मार भी उन्हें परेशान करती है.

ये इलाक़े बाढ़ वाले इलाक़े में आते हैं और सीमावर्ती ज़िलों के कई गाँवों की ज़मीन हर साल आने वाली बाढ़ के कारण बेकार हो चुकी है.

अमृतसर के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर जगरूप सिंह शेखों सीमावर्ती ज़िलों की स्थिति के अच्छे जानकार हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि इन इलाक़ों में 21,000 किसानों की कम से कम 25,000 एकड़ ज़मीन सीमा पर लगे बाड़ की चपेट में आकर बेकार हो चुकी है.

कई इलाक़े ऐसे भी हैं जो बारिश के मौसम में पूरे देश से कट जाते हैं.

प्रोफ़ेसर सैखों ने सीमाई इलाक़ों की बदहाली के लिए आज़ादी के बाद से अब तक की तमाम सरकारों को ज़िम्मेदार ठहराया.

उहोंने कहा, "पूरे इलाक़े में रोज़गार, विकास, दूरसंचार सुविधाएं, शिक्षा और दूसरी चीज़े मुहैया नहीं हैं. इसकी वजह यह है कि किसी सरकार का इलाक़े के विकास की ओर ध्यान ही नहीं गया."

वो कहते हैं सरकारों का सारा ध्यान सीमा को संभाले रहने पर ही रहा.

प्रोफ़ेसर सैखों गाँवों को ख़ाली करवाने को ग़ैरज़रूरी मानते हैं. उनका कहना है कि पाकिस्तान की सीमा पर किसी तरह का तनाव नहीं है और न ही युद्ध की कोई आशंका है.

उन्होंने सवाल किया,"यह सरकार नहीं बता रही है कि ऐसे में बड़ी तादाद में गांव ख़ाली कराने की क्या ज़रूरत है?"

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राजनीति शास्त्र के इस प्रोफ़ेसर का कहना है कि सीमा पर रहने वाले लोग समय से पहले ही स्थिति को भांप जाते हैं और ख़ुद इलाक़ा छोड़ देते हैं.

साल 1965, 1971 और संसद पर हुए हमलों के बाद जो स्थिति बनी थी उस समय लोगों ने गांव ख़ुद ही ख़ाली कर दिए थे.

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यही बात इन सीमावर्ती ज़िलों के कई किसानों ने बीबीसी से बातचीत के दौरान भी कही कि 1971 के युद्ध से पहले सेना ने आकर खंदकें खोदी थीं और स्थानीय लोगों ने उनकी मदद की थी.

पर इस बार लोगों को लग रहा है कि बिना किसी कारण उनसे इलाक़ा ख़ाली करने को कहा गया है.

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