जंगल और नदी...बहुत कठिन है डगर स्कूल की

  • नीरज सिन्हा
  • रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
सीताडीह स्कूल के बच्चे

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रेल लाइन पर चल कर स्कूल जाते हुए छात्र

झारखंड की राजधानी रांची से क़रीब 50 किलोमीटर दूर सीताडीह मध्य विद्यालय तक पंहुचने का कोई रास्ता नहीं है.

रांची से बंगाल जाने के रास्ते मूरी-बरकाकाना रेल खंड से बिल्कुल सटे, जंगल-झाड़ से घिरे सीताडीह स्कूल की चौथी कक्षा के छात्र श्याम सुंदर लोहरा थोड़े शब्दों में बहुत कुछ बयां कर जाते हैं.

वो कहते हैं, "सरकार के लोग क्या जानें, सांप, नदियों के तेज़ बहाव और रेल का डर."

हम झाड़ियों के बीच से गुज़रते हुए और रेल पटरियों पर चल कर स्कूल पहुंचते हैं. बारिश में भींगा लोहरा अपनी कमीज़ के कोर से चेहरे पोंछते हुए कहते हैं, ''पटरी से हट जाइए सर. दिल्ली तरफ़ से आने वाला रेल एकदम धड़धड़ा कर चलती है.''

भारत सरकार की ओर से जारी डिस्ट्रिकिट इंफार्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन (डीआइसइ) की रिपोर्ट के मुताबिक़, सूबे के 48 फ़ीसद सरकारी स्कूलों तक सभी मौसम में पहुंचने लायक रास्ते नहीं हैं.

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नदी पार कर स्कूल जाते छात्र

झारखंड में 41,000 प्राइमरी और मिडिल स्कूल हैं, लगभग 20,000 स्कूलों तक सभी मौसम में चलने लायक रास्ता नहीं हैं. लिहाज़ा लाखों बच्चे ख़तरों का सामने करते हुए स्कूल पहुंचते हैं. इन्ही परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है सुदूर इलाक़ों में तैनात शिक्षकों को भी.

सीताडीह स्कूल के शिक्षक उमाशंकर ने बीबीसी से कहा, "बच्चों के स्कूल आने और छुट्टी के बाद तक हमारी नज़रें पटरियों पर टिकी होती है. हम ख़ुद भी इन्हीं पटरियों से पार होते हैं. कई दफ़ा ऊपर तक बात पहुंचाई गई, लेकिन रास्ता नहीं निकला."

इसी स्कूल की सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली मालती कहती हैं कि घर से चलने पर मां-बाबा यह ज़रूर कहते हैं रेल पटरी पर ख़ुद को और छोटे बच्चे को संभालना. शिवचरण बेदिया बताते हैं कि "डर तो बना रहता है, पर अब आदत हो गई है."

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खेतों के बीच से स्कूल का रास्ता

बंगाल जाने के रास्ते में हमनें दूसरे कई स्कूलों के बच्चों से बातें की. जिंतूबाड़ी गांव की रहने वाली चौथी कक्षा की छात्र पूजा कुमारी ने कहा कि वे नदी पार कर स्कूल आती-जाती हैं और आने-जाने में उन्हें पूरे डेढ़ घंटे लगते हैं.

सूबे के दूर दराज़ के इलाक़ों में आप जाएं, तो नदी-नाले, जंगल-झाड़ों से गुज़रते और खेतों की पगडंडियों पर चलकर स्कूल पहुंचने के संघर्षों से जूझते बच्चों की कई तस्वीरें मिल जाएंगी.

जनजातीय और पठारी इलाक़ों में मुश्किलें कहीं ज़्यादा हैं. अधिकतर स्कूलों तक पहुंचने के लिए बच्चे जुगाड़ के रास्तों का इस्तेमाल करते हैं.

खूंटी के सुदूर इलाक़े बिंदा के छात्र अमित टोपनो कहते हैं कि बरसात में तो शार्टकट भी काम नहीं आते. बारिश में रास्ता और मुश्किल होता है, लेकिन बच्चे समूह बना कर चलते हैं. लिहाज़ा कई मौक़ों पर गिरते-पड़ते हैं, हंसी-ठिठोली भी हो जाती है.

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ख़तरनाक पुल से गुजरता है स्कूल का रास्ता

इसी इलाक़े के रहने वाले रिटायर्ड शिक्षक पीटर मुंडू कहते हैं कि आदिवासी इलाक़ों के बच्चे और शिक्षक पढ़ाई के प्रति सचेत हैं, लिहाज़ा वे हर परेशानी का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं. लेकिन शिक्षा के स्तर सुधारे जा सकें, इसके लिए आधारभूत संरचना दुरूस्त की जानी चाहिए.

हाल ही में खूंटी के सुदूर जामडा गांव में स्कूली शिक्षकों ने सड़क पर लकड़ी के एक पुल की मरम्मत की गई. तोयोन टोपनो बंदगाव के एक स्कूल में प्रधानाध्यापक हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''दो साल पहले बनाई गई इस पुल की कई लकड़ियां सड़ गई थीं, जिससे उसके धंसने की आशंका बढ़ गई थी. लिहाज़ा, आस पास के गांवों के शिक्षकों ने अपने पैसे और मेहनत से इसकी मरम्मत की. "

वे आगे कहती है्, "यह पुल खूंटी से चाईबासा के कई इलाक़ों को जोड़ता है और सैकड़ों स्कूली बच्चों के भी स्कूल आने-जाने में मदद करता है. लकड़ी का यह पुल नहीं होता तो कई गांवों का प्रखंड और ज़िला मुख्यालय से संपर्क ही टूट जाता.''

स्कूली शिक्षा पर पैनी नज़र रखते रहे पत्रकार सुनील झा बताते हैं कि इन हालातों में शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है. बरसात में बच्चों की हाज़िरी कम हो जाती है.

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शिक्षा के अधिकार पर काम करने वाले ए के सिंह ने कहा कि इन्हीं आधारभूत संरचना की कमी के कारण सरकारी स्कूलों में अब तक औसत 58-60 फ़ीसद ही बच्चों की उपस्थिति सुनिश्चत कराई जा सकी है.

वे बताते हैं कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुरूप साल 2013 के मार्च तक सभी सुविधाएं उपलब्ध करानी थी, लेकिन यह अब तक नहीं हो सका है. शिक्षकों के खाली पद भरने और उन्हें ट्रेनिंग देने में भी झारखंड पिछड़ रहा है.

स्कूलों तक जाने के लिए सड़क के अलावा झारखंड के लगभग 29 हज़ार सरकारी प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में खेल के मैदान नहीं हैं.

रांची की नया टोली बस्ती, बरियातू, के स्कूल की छात्रा रोशनी कुमारी ने बीबीसी से कहा कि स्कूल में खेल के मैदान नहीं होने के कारण कमरे और बरामदे में ही खेलना पड़ता है.

मनीषा बताती हैं कि टिफ़िन या खेल कूद की घंटियां बजते ही बरामदे और कमरे का कोना दख़ल करने की बच्चों में होड़ मच जाती है. जिसे जगह मिली वह गदगद, बाक़ी चुप चाप इधर उधर देखते रहते हैं.

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नीरा यादव, मानव संसाधन मंत्री, झारखंड

दूसरी ओर, राज्य की शिक्षा मंत्री डॉ नीरा यादव कहती हैं, ''राज्य में प्रति एक किलोमीटर पर प्राइमरी और दो किलोमीटर पर मिडिल स्कूल खोले गए हैं. यह देश के कई राज्यों की तुलना में बेहतर है. हालांकि उन जगहों पर भी स्कूल खुले, जहां सड़कें थीं ही नहीं. इसके अलावा राज्य की भौगोलिक स्थित पहले से कठिन है. बच्चों की तकलीफें दूर हो, इसके लिए हम ग्रामीण सड़क विभाग तथा विधायक फंड से यह काम कराने की पहल करेंगे.''

वे कहती हैं कि फ़िलहाल उनकी प्राथमिकता शिक्षकों की कमी दूर करने की है.

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