'मोदी पर जारी है संघ की छत्रछाया'

  • प्रमोद जोशी
  • राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

सरसंघचालक मोहन भागवत के इस बार के विजयादशमी सम्बोधन से कोई बड़ा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, सिवाय इस बात के कि यह मोदी सरकार पर संघ की मुहर लगाता है.

संघ प्रमुख सेना के 'सर्जिकल स्ट्राइक' से गदगद हैं. उन्होंने देश की जनता से कहा है कि कुछ देश नहीं चाहते कि भारत आगे बढ़े और कुछ स्वार्थी शक्तियाँ देश में उपद्रव फैलाना चाहती हैं.

स्वाभाविक रूप से उनके भाषण में राष्ट्रवाद, स्वाभिमान, आत्मविश्वास और स्वावलम्बन जैसे शब्दों की भरमार है. और यह भी कि 'भारत का स्वार्थ' सर्वोपरि है.

विवादास्पद बात से बचने की सावधानी भी इस वक्तव्य में दिखाई पड़ती है. बहरहाल उन्होंने इतना साफ़ कहा कि शासन पर पूरा विश्वास है. देश धीरे-धीरे आगे जाएगा.

संघ की सबसे बड़ी अपेक्षा है कि भाजपा सरकार जल्द से जल्द पूरे भारत पर अपना असर कायम करे. 'राज्य सरकारों का सहयोग भी चाहिए. देश में संघीय व्यवस्था है, जिसमें केवल केन्द्र के करने से ही सब कुछ नहीं होगा.'

हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ घोषित रूप से सांस्कृतिक संगठन है, पर भाजपा के संरक्षक के रूप में उसकी आक्रामक राजनीतिक छवि साफ़ दिखाई पड़ती है. विजयादशमी सम्बोधनों में राजनीतिक विवेचन क्रमशः बढ़ रहा है.

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कश्मीर में लगभग तीन महीनों से भारी उथल-पथल जारी है

इस साल के सम्बोधन में स्वाभाविक रूप से कश्मीर का प्रकरण हावी रहा. सेना के सर्जिकल स्ट्राइक और पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मोदी की कोशिशों की उन्होंने तारीफ़ की है.

कश्मीर की आंतरिक स्थिति के संदर्भ में उनका कहना है कि केन्द्र और राज्य की नीति में एक दिशा होनी चाहिए. केन्द्र की नीति में दृढ़ता है, जबकि राज्य की नीति उपद्रवियों पर नरम है.

संघ की अपेक्षा है कि घाटी में पंडितों की वापसी हो और सामरिक बल, सीमा रक्षकों और सूचना तंत्र में समन्वय हो. प्रकारांतर से यह पठानकोट और उड़ी की घटनाओं पर टिप्पणी है.

राजनीतिक रूप से वे दलितों के अलगाव पर वे इशारा करना चाहते हैं. उनका कहना था, 'अनजाने में भी समाज में भेद न होने पाए.' गो-रक्षा के नाम पर हुई घटनाओं पर उनका कहना है, 'छोटी बातों को बड़ा बनाया जा रहा है.'

संघ की अपेक्षा है कि गोरक्षा के नाम पर सक्रिय उपद्रवियों से भाजपा खुद को अलग करे. उन्होंने जाति के साथ धर्म के नाम पर प्रताड़ना को रोकने की अपील भी की है. साथ ही कहा है कि देश का 'इमोशनल इंटीग्रेशन' ख़तरे में नहीं पड़ना चाहिए.

संघ प्रमुख सामाजिक सक्रियता पर ज्यादा जोर दे रहे हैं. 'समाज जागरूक हो तो प्रशासन जागता है.' उन्होंने इस कार्य में ख़ासतौर से शिक्षा की भूमिका पर ज़ोर दिया. हिन्दू समाज से घर से बाहर निकल कर सामाजिक रूप से सक्रिय होने की यह अपील है.

हाल के वर्षों में सरकार ने शिक्षा से ख़ुद को अलग करना शुरू कर दिया है. भागवत शिक्षा के व्यापारीकरण के ख़तरे की ओर इशारा कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यापार नहीं है और सरकार को उसमें रहना चाहिए.

इस बार संघ ने नया गणवेश तैयार किया है, जिसकी आज से शुरुआत हुई. इसके पहले 1930 में संघ ने ख़ाकी टोपी को काली टोपी में बदला था और 1940 में ख़ाकी क़मीज़ सफेद हुई थी.

सन 1973 में जूतों की शक्ल बदली थी. सन 2011 में जैन मुनि तरुण सागर ने कहा कि चमड़े की पेटी अहिंसा के विपरीत है. उसके बाद संघ की पेटी चमड़े के बजाय कैनवस की हो गई थी. इस साल पतलून का रंग भी बदला है. क्या यह वैचारिक बदलाव का प्रतीक है?

ऐसा लगता तो नहीं.

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