'मंटो की मंटोयियत को ला रहा हूं खुद में'

  • नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी
  • बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
मंटो

मैं जब नंदिता दास से उनके घर पर मिला तो उन्होंने कहा कि मैं ही उनका मंटो हूं. वह पहले ही मुझे इस क़िरदार में लेने का मन बना चुकी थी.

नंदिता मानती हैं कि मैं ज़िंदगी बहुत ज़्यादा जी और देख चुका हूं . मेरा तो पता नहीं लेकिन मंटो ने ज़िंदगी बहुत जी और वह आज भी पहले जितने ही प्रासंगिक लगते हैं.

मैं खुशकिस्मत हूं कि उनका क़िरदार निभा रहा हूं . बतौर अभिनेता मैंने कई किरदारों को निभाने और स्टेज के लिए साहित्य पढ़ा है लेकिन मंटो को पढ़ने के बाद कह सकता हूं कि वो महान लेखकों में से हैं.

नवाज कहते हैं कि ऐसे महान, उत्कृष्ट लेखक पर फ़िल्म बन रही हो और आपको उस फ़िल्म का हिस्सा बनाया जाए तो खुशी के साथ गर्व भी महसूस होता है.

लेकिन मंटो का किरदार निभाना आसान नहीं है. उनका दायरा बड़ा है.

वो जीनियस आदमी थे और जब उनको परदे पर उतारने की बारी आती है तो बहुत कुछ पढ़ना पड़ता है, खोजना पड़ता है, हालांकि सोचने का ज़्यादा काम नंदिता का है.

वह ये तय करेंगी कि बतौर निर्देशक वो अपने कलाकार और अपने डिज़ाइन किए हुए किरदार से क्या चाहती हैं.

लेकिन बतौर एक एक्टर मुझे उनके मंटो और असल मंटो के सार को आत्मसात करना पड़ेगा. ये वाकई मुश्किल काम है.

वो कमाल के लेखक थे. उन पर फ़िल्म बनाना जटिल काम है. मैं 22 सालों से उन्हें पढ़ता रहा हूं. भले ही उनकी ज़िंदगी से ज़्यादा वाक़िफ़ नहीं लेकिन उनकी कहानियों से राब्ता रहा है मेरा.

मैंने ख़ासकर उनकी छोटी कहानियां पढ़ी हैं . उन पर बनने वाले नाटकों का हिस्सा रहा हूं. वो सिर्फ़ प्रेरक नहीं रोंगटे खड़े देने वाली कहानियां लिखते थे जो सिर्फ़ वही कर सकते थे.

उनकी किसी एक कहानी का नाम लेकर मैं उनके काम को सीमित नहीं करना चाहता क्योंकि उनकी हर कहानी में एक अलग कोशिश, कशिश और कशमकश है.

यह आज के हालातों पर उतनी ही सटीक है जितनी तब थी. ऐसा लगता है जैसे आज ही इस आदमी ने यह लिखा हो.

इस क़िरदार के लिए तैयारी करते हुए एक ख़ास बात महसूस हुई. ये शायद अच्छा है कि मंटो की सिर्फ़ तस्वीरें और कहानियां हैं. ऐसे में मैं जो भी कर दूंगा लोग मान लेंगे कि मंटो ऐसे ही होंगे.

इस किरदार तैयारी के लिए तो सिर्फ़ मुझे उनकी बॉडी लैंग्वेज समझनी है और फिर परदे का काम हो जाएगा. लेकिन चेहरे का वो भाव, तनाव लाने के लिए मुझे उन्हें समझना पड़ेगा.

क्या, कैसे, कब और कितना होगा इसका जवाब नंदिता (फ़िल्म की निर्माता निर्देशक) बेहतर दे सकती हैं.

मैं बस इतना बता सकता हूं कि मंटो की मंटोयियत को ला रहा हूं अब अपने अंदर.

(सुशांत मोहन से हुई बातचीत पर आधारित)

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