ब्रिक्स सम्मेलनः चीन का भारत के प्रति रवैया?

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चीन और पाकिस्तान की मीडिया में शनिवार से शुरू हुए ब्रिक्स सम्मेलन की ख़ूब चर्चा हो रही है.

ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के राष्ट्राध्यक्षों का सम्मलेन भारत के गोवा में 15-16 अक्तूबर को हो रहा है. इसमें इन देशों के नेता आपसी कारोबार और अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर बातचीत करेंगे.

चीनी अख़बार में चर्चा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव का असर शिखर सम्मेलन पर देखने को मिलेगा. अख़बारों के मुताबिक़ भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी हमले के बाद दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़े हैं.

हालांकि ये भी कहा जा रहा है कि ब्रिक्स देश, ख़ासकर चीन और भारत, कारोबार के लिहाज़ से एक दूसरे पर काफ़ी निर्भर हैं. ऐसे में क्षेत्रीय मुद्दों पर इनका रवैया नरम हो सकता है.

चीनी अख़बार 'द ग्लोबल टाइम्स' ने 13 अक्तूबर को छपे एक लेख में कहा है कि भारत-पाकिस्तान विवाद में ब्रिक्स देश केवल मध्यस्थता कर सकते हैं. अख़बार ने लिखा है, कोई किसी देश के चरमपंथ को सही नहीं ठहरा सकता. अख़बार का इशारा पाकिस्तान के प्रति भारत के हालिया बयान की ओर है. इस बयान में पाकिस्तान को चरमपंथ का हिमायती बताया गया है.

भारत की ओर से ये बयान गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत प्रशासित कश्मीर में उड़ी के सैन्य ठिकाने पर चरमपंथी हमले के बाद दिया था. भारत सरकार ने इस हमले के पीछे पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के चरमपंथियों को ज़िम्मेदार ठहराया था.

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ज़ाहिर है कि ब्रिक्स देशों पर किसी एक देश का पक्ष नहीं लेने या दूसरे की उपेक्षा नहीं करने का दबाव बढ़ गया है.

पाकिस्तान का नाम लिए बिना रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिक्स सम्मेलन में सार्क के कई सदस्य देश शामिल नहीं होंगे, लिहाज़ा इस बैठक में दक्षिण एशियाई क्षेत्र के मुद्दों पर उतनी चर्चा नहीं होगी.

भारत ने ब्रिक्स देशों की बैठक के साथ ही बीमस्टेक (वे ऑफ़ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टरल टेक्नीकल एंड इकॉनामिक कॉपरेशन) की बैठक भी रखी है. इसे पाकिस्तान को अलग थलग रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

बीमस्टेक देशों में बांग्लादेश, भारत, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान और नेपाल शामिल हैं.

ठीक इसी तर्ज़ पर, पाकिस्तान के उर्दू अख़बार डेली एक्सप्रेस ने भारत को सार्क सम्मेलन निलंबित कराने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है.

साक सम्मेलन नवंबर में पाकिस्तान में होना था. अख़बार के मुताबिक़ ऐसा चरमपंथ के नाम पर दुनिया भर में पाकिस्तान को अलग-थलग रखने की नीयत से किया गया.

अख़बार ने 13 अक्तूबर के अपने संपादकीय में लिखा है, "भारत पाकिस्तान को कमज़ोर करने की नीति पर काम कर रहा है. गोवा में आयोजित होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन का इस्तेमाल भी भारत पाकिस्तान के ख़िलाफ़ करेगा. अख़बार ने ये भी लिखा है कि चीन भारत की ऐसी किसी कोशिश को विफल कर देगा.

एक अन्य लेख में 'द ग्लोबल टाइम्स' ने भारत के न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में शामिल होने और भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी हमले के बाद भारत-चीन के बीच एक दूसरे के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है.

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अख़बार के मुताबिक़ चीन और भारत के बीच पाकिस्तान के अलावा सीमा, तिब्बत और कारोबार के मुद्दे पर भी मतभेद है. लेकिन अख़बार ये कहता है कि दोनों देशों को एक दूसरे को ख़तरे के तौर पर नहीं देखना चाहिए. उन्हें आपसी संबंधों को मज़बूत करना चाहिए.

चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ में 10 अक्तूबर को छपे एक लेख में भारत और चीन के आपसी संबंधों को मज़बूत करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है. इस आलेख के मुताबिक़ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए चीन की नीति मेल-जोल बढ़ाने के साथ पारस्परिक हितों को पूरा करने पर होनी चाहिए.

इस लेख में अंतरराष्ट्रीय मीडिया की उन रिर्पोटों का खंडन किया गया है जिसमें कहा जा रहा है कि ब्रिक्स की अहमियत ख़त्म होती जा रही है. लेख में कहा गया है कि दुनिया भर का ध्यान आर्थिक विकास बढ़ाने और आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए ब्रिक्स देशों की ओर है.

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पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अख़बार द न्यूज़ ने कारोबार में पारदर्शिता के मुद्दे पर लिखा है कि असहज संबंधों के बावजूद चीन भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है. अख़बार के मुताबिक़ यही वो पहलू जिसके चलते चीन का रवैया नरमी भरा हो सकता है. हालांकि इसके बावजूद चीन और भारत के बीच बातचीत में मतभेदों की गुंजाइश बनी हुई है.

अख़बार के मुताबिक़ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान के सहयोगी की भूमिका में चीन की ओर से प्रस्ताव आने पर नरम रुख़ नहीं अपनाएंगे. अख़बार ने यह भी कहा है कि ब्रिक्स सम्मेलन में चीन भले भारत के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश करेगा लेकिन साथ ही वह पाकिस्तान जैसे महत्वपूर्ण साझेदार देश से पल्ला नहीं झाड़ सकता.

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